इटावा की बुनाई परंपरा: रोज़मर्रा के कपड़ों की निरंतर चलती कारीगरी
वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) कार्यक्रम के अंतर्गत इटावा के बुनकरों को वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है, जिससे उन्हें मशीनें जोड़ने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिली है।
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में वस्त्र बुनाई का काम दैनिक उपयोग के कपड़ों की मांग पर आधारित है। यहाँ गमछा, अंगोछा, लुंगी, चादर, शॉल और सूटिंग कपड़े जैसे उत्पाद नियमित रूप से तैयार किए जाते हैं, जिनकी मांग सजावटी उपयोग से अधिक उनके उपयोगी गुणों—जैसे टिकाऊपन, शोषण क्षमता और किफ़ायती कीमत—पर निर्भर करती है। इस क्षेत्र में उत्पादन की निरंतरता इस बात पर निर्भर करती है कि बुनकर परिचित डिज़ाइन और रंगों में उत्पादों की उपलब्धता बनाए रख सकें।
इस कारीगरी की प्रक्रिया सूत की तैयारी से शुरू होकर रंगाई, ताना सेटिंग, करघे पर बुनाई और अंततः तैयार माल की आपूर्ति तक जाती है। इटावा में हैंडलूम और पावरलूम दोनों ही उत्पादन का हिस्सा हैं, जहाँ कई परिवार आधारित इकाइयाँ आज भी बुनाई के विभिन्न चरणों को स्वयं संचालित करती हैं। यहाँ का व्यापार किसी एक विशेष उत्पाद पर नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के उपयोग में आने वाले वस्त्रों की विविधता पर आधारित है।
वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) कार्यक्रम के अंतर्गत इटावा के बुनकरों को वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है, जिससे उन्हें मशीनें जोड़ने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिली है।
इटावा के बुनकर सरताज अहमद बताते हैं कि यह काम उनके परिवार में तीन पीढ़ियों से चला आ रहा है। उन्होंने यह हुनर अपने पिता से सीखा और बचपन से ही इसी काम से जुड़े हुए हैं। आज भी वे उसी पारंपरिक बुनाई प्रणाली के साथ कार्य कर रहे हैं जिसने उनके परिवार को पहले भी सहारा दिया।
उनके उत्पादों में गमछा विशेष महत्व रखता है। इसकी प्रक्रिया सूती धागे से शुरू होती है। यदि रंगीन उत्पाद बनाना हो तो पहले सूत को रंगा जाता है, अन्यथा सफेद उत्पाद के लिए यह चरण छोड़ दिया जाता है। रंगाई के बाद धागे को सुखाकर रोल बनाया जाता है और फिर ताना मशीन पर सेट कर बीम तैयार किया जाता है। इसके बाद बीम को करघे पर लगाकर गमछे की बुनाई की जाती है।
यही प्रक्रिया अन्य उत्पादों—जैसे शॉल, सूटिंग कपड़े, लुंगी, चादर और अंगोछा—पर भी लागू होती है। इस प्रकार उत्पादन एक ही श्रेणी तक सीमित न होकर विभिन्न उपयोगी वस्त्रों में विभाजित रहता है।
सरताज अहमद बताते हैं कि उनका व्यापार इटावा के अलावा आगरा, मथुरा, अलीगढ़, राजस्थान और जलेसर जैसे क्षेत्रों तक फैला हुआ है। हालांकि, यह व्यापार मुख्यतः घरेलू बाजारों तक ही सीमित है।
ODOP कार्यक्रम के तहत मिली सहायता से उन्होंने दो नई मशीनें जोड़ीं और कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाई। ऐसे सुधार उत्पादन की निरंतरता बनाए रखने और विभिन्न बाजारों में आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद करते हैं।
इटावा की बुनाई में काम की गति इस बात पर निर्भर करती है कि सूत की रंगाई, सुखाने, ताना सेटिंग और करघे पर बुनाई की प्रक्रिया कितनी सुचारु रूप से चलती है। जब ये सभी चरण संतुलित रहते हैं, तो परिवार आधारित इकाइयाँ लगातार बाजार में रोज़मर्रा के उपयोग के वस्त्र उपलब्ध कराती रहती हैं।
Edited by Ravi Pareek


