फर्रुखाबाद की वस्त्र छपाई: लकड़ी के ब्लॉक से कपड़े तक की परंपरा
फर्रुखाबाद की वस्त्र छपाई ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) के अंतर्गत अधिसूचित पारंपरिक उद्योग है। यहाँ लकड़ी के नक्काशीदार ब्लॉकों से कपड़ों पर आकर्षक डिज़ाइन छापे जाते हैं। ये ब्लॉक और प्रिंटेड वस्त्र जयपुर, दिल्ली और अन्य प्रिंटिंग केंद्रों के साथ देश-विदेश के बाजारों तक पहुँचते हैं।
उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जनपद में वस्त्र छपाई की एक समृद्ध परंपरा है, जहाँ कपड़े पर उभरने वाले डिज़ाइनों के पीछे लकड़ी के नक्काशीदार ब्लॉकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जनपद का प्रसिद्ध “वस्त्र छपाई” (Vastra Chhapai) उत्पाद राज्य सरकार की वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) कार्यक्रम के तहत अधिसूचित है।
फर्रुखाबाद की पहचान केवल छपे हुए कपड़ों से नहीं, बल्कि उन लकड़ी के ब्लॉकों से भी जुड़ी है जिनसे यह कला संभव होती है। महीन नक्काशी से तैयार किए गए ये ब्लॉक भारत के विभिन्न प्रिंटिंग केंद्रों में उपयोग किए जाते हैं। एक अच्छी गुणवत्ता वाला ब्लॉक लंबे समय तक अपनी धार बनाए रखता है, जिससे प्रिंटर एक ही डिज़ाइन को बार-बार सटीकता से छाप पाते हैं और काम की निरंतरता बनी रहती है।
यह उद्योग एक ही कार्यशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि कई चरणों में संचालित होता है। लकड़ी की खरीद और उसे सुखाने की प्रक्रिया से शुरुआत होती है, फिर डिज़ाइन बनाना, ब्लॉक की नक्काशी, उसकी फिनिशिंग, कपड़ों की छपाई और अंततः तैयार उत्पाद की आपूर्ति तक की श्रृंखला बनती है। हर चरण में अलग-अलग कारीगरों की विशेषज्ञता जुड़ी होती है, जिससे यह पारंपरिक उद्योग आगे बढ़ता है।
उत्तर प्रदेश सरकार की ODOP कार्यक्रम के तहत फर्रुखाबाद के वस्त्र छपाई उद्योग को नई पहचान और प्रोत्साहन मिला है। स्थानीय इकाइयों के अनुसार, आसान ऋण सुविधा, सब्सिडी और प्रदर्शनियों में भागीदारी जैसे अवसरों ने व्यापार के विस्तार और बाज़ार तक पहुँच बढ़ाने में मदद की है।
भिकमपुर गाँव के अजय सिंह चौहान इस परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कारीगरों में से एक हैं। उनके परिवार में ब्लॉक बनाने का काम उनके दादा और पिता के समय से चला आ रहा है। समय के साथ उन्होंने पारंपरिक ब्लॉक सप्लाई के साथ-साथ कपड़ों की छपाई और सजावटी नक्काशीदार ब्लॉकों का काम भी शुरू किया।
चौहान के अनुसार, ब्लॉक बनाने की प्रक्रिया अच्छी तरह से सुखाई गई लकड़ी के चयन से शुरू होती है। लकड़ी को लंबे समय तक सुखाया जाता है, फिर उसे काटकर समतल किया जाता है। इसके बाद उस पर डिज़ाइन की रूपरेखा बनाई जाती है और हाथ से नक्काशी करके पैटर्न तैयार किया जाता है। अंत में ब्लॉक की फिनिशिंग और हैंडल लगाकर उसे उपयोग के लिए तैयार किया जाता है।
वे कहते हैं, “अगर ब्लॉक बनाने का काम न हो तो ब्लॉक प्रिंटिंग की कल्पना भी नहीं की जा सकती।”
फर्रुखाबाद में बने ब्लॉक केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं हैं। वे जयपुर, दिल्ली और गुजरात जैसे प्रमुख प्रिंटिंग केंद्रों तक पहुँचते हैं। चौहान की इकाई में छपाई का काम भी अधिकतर दिल्ली और जयपुर से जुड़े खरीदारों के माध्यम से आता है। सोशल मीडिया के माध्यम से नए ग्राहक मिलने लगे हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुँच अक्सर बड़े व्यापारिक केंद्रों के जरिए होती है।
इस उद्योग में उत्पादन की गुणवत्ता दो प्रमुख बातों पर निर्भर करती है—पहली, लकड़ी का सही चयन और उसका पर्याप्त सुखाना; और दूसरी, तैयार ब्लॉकों की सुरक्षित पैकिंग और परिवहन। विशेष रूप से कस्टम डिज़ाइन वाले ब्लॉकों के लिए यह आवश्यक है कि वे खरीदार तक सुरक्षित और सही आकार में पहुँचें।
फर्रुखाबाद की वस्त्र छपाई परंपरा में लकड़ी के ब्लॉक की यात्रा उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि कपड़े पर छपने वाला डिज़ाइन। जब लकड़ी की तैयारी, नक्काशी की सटीकता और बाज़ार तक पहुँच का संतुलन बना रहता है, तब यह पारंपरिक उद्योग लगातार आगे बढ़ता रहता है।
Edited by Ravi Pareek


