विरासत से आगे: कैसे हरदोई की हैंडलूम अर्थव्यवस्था को संबल देती है
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में हैंडलूम उद्योग आज भी रोज़मर्रा के जीवन और आजीविका से जुड़ा है। मल्लावां में तौलिए, लुंगी, चादर और शॉल जैसे वस्त्र बुने जाते हैं, जिन्हें ODOP पहल के जरिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहचान मिल रही है।
उत्तर प्रदेश के हरदोई जनपद में हैंडलूम केवल परंपरा नहीं, बल्कि आज भी दैनिक जीवन का हिस्सा है। तौलिए, लुंगी, चादर, शॉल और रज़ाई कवर जैसे वस्त्र मल्लावां और आसपास के क्षेत्रों में तैयार किए जाते हैं, जो अनेक परिवारों की आजीविका का आधार हैं।
यह तंत्र बुनकरों, धागा आपूर्तिकर्ताओं, व्यापारियों और खुदरा विक्रेताओं को जोड़ता है। कई बुनकर घर से काम करते हैं—धागा लेकर तैयार कपड़ा लौटाते हैं।
हाफिज़ुद्दीन अंसारी ऐसे ही एक उद्यमी हैं। बुनकर परिवार से आने वाले अंसारी ने शुरुआत कपड़े की दुकान से की, लेकिन बाद में स्थानीय उत्पादन को प्राथमिकता दी ताकि गुणवत्ता बेहतर हो और रोजगार स्थानीय स्तर पर बना रहे। 2020 में उन्होंने मशीनरी और कच्चे माल में निवेश कर निर्माण कार्य को विस्तार दिया।
मल्लावां की पहचान
उत्पादन प्रक्रिया धागे की वार्पिंग से शुरू होती है। धागा बीम पर चढ़ाकर हथकरघे पर बुना जाता है। हैंडलूम कपड़ा पावरलूम से अलग अपनी बनावट, मुलायमपन और टिकाऊपन के कारण पहचाना जाता है।
ODOP पहल के माध्यम से प्रदर्शनी और बाज़ार तक पहुँच में सुधार हुआ है। आज हरदोई का हैंडलूम कपड़ा दिल्ली, लखनऊ, कानपुर और मेरठ सहित कई शहरों में पहुँच रहा है, तथा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी तक निर्यात हो रहा है।
चुनौतियों के बावजूद, हरदोई की हैंडलूम आज भी एक सशक्त और जीवंत अर्थव्यवस्था का आधार बनी हुई है।
Edited by Ravi Pareek


