एक-एक कोल्हू के साथ: लखीमपुर खीरी का गुड़ उद्योग
लखीमपुर खीरी में गुड़ गन्ने पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। कोल्हू से मंडी तक की प्रक्रिया में गुणवत्ता, रंग और स्वाद इसकी पहचान बनाते हैं। ODOP पहल के अंतर्गत मिले प्रशिक्षण और प्रदर्शनी मंच से इस पारंपरिक उत्पाद को नई दृश्यता मिली है।
Lakhimpur Kheri, उत्तर प्रदेश, में गुड़ केवल मिठास नहीं, बल्कि गन्ने पर आधारित एक संगठित ग्रामीण अर्थव्यवस्था है। गाँवों के कोल्हू से निकलकर गुड़ मंडियों तक पहुँचता है, जहाँ उसकी पहचान रंग, स्वाद और एकरूपता से होती है।
ODOP के अंतर्गत गुड़ को जिले की पहचान मिली है, जिससे इस उत्पाद को प्रदर्शनी मंच, योजनाओं और प्रशिक्षण के माध्यम से नई दृश्यता मिली है।
बेहजम निवासी शिवम गुप्ता अपने परिवार के कोल्हू यूनिट का संचालन करते हैं। लगभग नौ वर्ष पहले उनके पिता ने यह इकाई स्थापित की थी, जिसे अब वे और उनके बड़े भाई अंकुल गुप्ता संभालते हैं।
गन्ने से मंडी तक
गुड़ बनाने की प्रक्रिया गन्ना खरीद से शुरू होती है। स्थानीय किसान अपना गन्ना सीधे कोल्हू पर लाते हैं। गन्ने को कुचलकर उसका रस निकाला जाता है, जिसे बड़े कढ़ाह में उबाला जाता है।
उबालते समय झाग और अशुद्धियाँ हटाई जाती हैं। रस गाढ़ा होने पर उसे साँचे में डालकर जमाया जाता है। तैयार गुड़ को मंडी में भेजा जाता है, जहाँ व्यापारी उसकी गुणवत्ता के आधार पर खरीद करते हैं।
शिवम गुप्ता के अनुसार, प्रतिदिन 18-20 क्विंटल तक उत्पादन हो सकता है। इकाई सुबह से शाम तक संचालित होती है और अलग-अलग चरणों में श्रमिक कार्य करते हैं।
वे मानते हैं कि ODOP के प्रशिक्षण और सहयोग से काम अधिक व्यवस्थित हुआ है और गुणवत्ता बनाए रखने में सहायता मिली है। उनके लिए सफलता का अर्थ है — वही ग्राहक फिर से उसी गुणवत्ता के लिए लौटे।
लखीमपुर खीरी में गुड़ की पहचान गन्ने की प्रचुरता से ही नहीं, बल्कि लगातार गुणवत्ता और भरोसे से बनी हुई है।
Edited by Ravi Pareek


