महोबा का धातु शिल्प: परंपरा से रोज़मर्रा तक
महोबा, उत्तर प्रदेश का धातु शिल्प ODOP के अंतर्गत अधिसूचित उत्पाद है, जहाँ पीतल से बनी प्रतिमाएँ, सजावटी वस्तुएँ और पारंपरिक शिल्प स्थानीय कारीगरों की आजीविका का आधार हैं। सुमित्रा जैसे शिल्पकार इस कला को परंपरा और बाजार से जोड़कर नई पहचान दे रहे हैं।
Mahoba, उत्तर प्रदेश, में धातु शिल्प (मेटल क्राफ्ट) ODOP के अंतर्गत अधिसूचित उत्पादों में से एक है। यहाँ का पीतल शिल्प घरों, पूजा स्थलों और विवाह उपहारों में विशेष स्थान रखता है।
प्रतिमाएँ, हाथी-घोड़े की मूर्तियाँ, कमल आकृतियाँ, कैंची, बोतलें और सजावटी वस्तुएँ स्थानीय कार्यशालाओं में बनती हैं और प्रदर्शनियों व शहरों के बाज़ारों तक पहुँचती हैं।
परिवार से जुड़ी आजीविका
कुलपाड़ा निवासी सुमित्रा इस शिल्प से वर्षों से जुड़ी हैं। उनके ससुर पीतल शिल्प का कार्य करते थे और वहीं से उन्होंने यह कला सीखी। समय के साथ यह परिवार की सामूहिक आजीविका बन गई।
सुमित्रा मानती हैं कि पीतल केवल धातु नहीं, बल्कि परंपरा और मूल्य का प्रतीक है। विवाह उपहारों और धार्मिक उपयोग में इसकी विशेष भूमिका रही है। आज भी यह अपनी स्थायी उपयोगिता और पुनर्विक्रय मूल्य के कारण सम्मानित है।
गुणवत्ता और बाज़ार
सुमित्रा के अनुसार, किसी भी उत्पाद की पहचान उसकी फिनिशिंग से होती है। साफ़ पॉलिश, संतुलित आकार और बारीकी खरीदारों को आकर्षित करती है। छोटे हाथी-घोड़े, कमल और सजावटी वस्तुएँ प्रदर्शनियों में तेजी से बिकती हैं।
उन्होंने दिल्ली, हैदराबाद, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों की प्रदर्शनियों में भाग लिया है। ODOP के माध्यम से पहचान और मंच मिलने से महोबा के धातु शिल्प को नई दृश्यता मिली है। उनका मानना है — “जो कारीगरी समझते हैं, वे कीमत पर विवाद नहीं करते।”
महोबा में धातु शिल्प आज भी परंपरा, सम्मान और आजीविका का सशक्त माध्यम बना हुआ है।
Edited by Ravi Pareek


