श्रावस्ती का जनजातीय शिल्प: घर, परंपरा और मौसम से जुड़ा शिल्प
वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) कार्यक्रम के अंतर्गत, श्रावस्ती की थारू कढ़ाई को प्रशिक्षण, संस्थागत सहयोग और बाज़ार से जोड़ने के माध्यम से नई पहचान मिली है।
उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जनपद में थारू कढ़ाई और उससे जुड़े शिल्प कार्य घरेलू उपयोग, पारंपरिक अवसरों और मौसमी समय-चक्र के अनुसार संचालित होते हैं। यह कार्य निरंतर उत्पादन की बजाय एक ऐसे चक्र में चलता है, जो दैनिक जरूरतों और विवाह जैसे विशेष अवसरों से जुड़ा होता है।
डेलवा, मऊनी, डालिया, बिरदरी और अन्य सजावटी उपयोगी वस्तुएँ न केवल घरेलू कार्यों में उपयोग होती हैं, बल्कि विवाह समारोहों में भी विशेष महत्व रखती हैं। इस शिल्प में मूल्य केवल उपयोगिता से नहीं, बल्कि रंग संयोजन, पैचवर्क और फिनिशिंग की सटीकता से निर्धारित होता है।
यह पूरा कार्य मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा घरों में किया जाता है, जहाँ कौशल पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता है। सर्दियों के मौसम में, जब महिलाएँ धूप में बैठकर काम कर सकती हैं, तब उत्पादन अधिक होता है। इस शिल्प में उपयोग होने वाला कच्चा माल भी स्थानीय परिवेश से प्राप्त होता है, जैसे घास जैसी सामग्री और मूंज, जो आसपास के वन एवं पहाड़ी क्षेत्रों से लाई जाती है।
वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) कार्यक्रम के अंतर्गत, श्रावस्ती की थारू कढ़ाई को प्रशिक्षण, संस्थागत सहयोग और बाज़ार से जोड़ने के माध्यम से नई पहचान मिली है।
भिनगा तहसील के भास्कही गाँव के निवासी सितार प्रसाद राणा बताते हैं कि उन्होंने बचपन से इस शिल्प को अपने समुदाय में होते देखा है। उनका मुख्य व्यवसाय खेती है, लेकिन कढ़ाई और पैचवर्क का कार्य विशेष रूप से महिलाओं के बीच सहायक आय का स्रोत रहा है। वे इस तकनीक को स्थानीय भाषा में "कटोटी" कहते हैं, जिसमें कपड़े की परतों को जोड़कर सूई-धागे से सजावटी डिज़ाइन बनाए जाते हैं।
इस शिल्प में डेलवा सबसे प्रमुख उत्पाद है। यह एक बड़ा सजावटी टोकरीनुमा पात्र होता है, जिसका उपयोग विवाह में दूल्हे के कपड़े, जूते और अन्य सामान ले जाने के लिए किया जाता है। महिलाएँ इसे रंगीन कपड़ों और बारीक कढ़ाई से सजाती हैं, जिससे हर डेलवा अलग और आकर्षक दिखाई देता है। इसके अलावा मऊनी, डालिया, बिरदरी और सुपा जैसे उत्पाद दैनिक उपयोग के लिए बनाए जाते हैं।
निर्माण प्रक्रिया कच्चे माल के संग्रह और तैयारी से शुरू होती है। "रड़ा" नामक घास को सुखाकर संग्रहित किया जाता है, जबकि मूंज अलग से लाया जाता है। इसके बाद आधार संरचना तैयार कर उस पर रंगीन कपड़ों को पैटर्न के अनुसार लगाकर हाथ से सिलाई की जाती है। तैयार उत्पाद की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि कारीगर कितनी सटीकता और संतुलन के साथ काम करता है।
यह कार्य प्रायः 20 से 40 महिलाओं के समूहों में किया जाता है, जो रोज़ाना कुछ घंटे इस कार्य को घरेलू जिम्मेदारियों के साथ संतुलित करते हुए करती हैं। इस प्रकार यह शिल्प परंपरा को बनाए रखते हुए आय का एक अतिरिक्त स्रोत भी बनता है।
श्रावस्ती में थारू कढ़ाई आज भी परंपरा, स्थानीय संसाधनों और सामुदायिक ज्ञान का संगम है—जहाँ महिलाएँ इस शिल्प को जीवित रखते हुए आजीविका का साधन भी बना रही हैं।
Edited by Ravi Pareek


