बिना बैंक-कागज़ के 1 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था! बिहार की 1.35 करोड़ जीविका दीदियों का कमाल
बिहार की 1.35 करोड़ जीविका दीदियां चला रही हैं 1 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था — और वो भी 99.5% रीपेमेंट रेट के साथ! 'जीविका' योजना की शुरुआत 2006 में एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर हुई थी, वर्ल्ड बैंक के सहयोग से. यह योजना अब बिहार के 534 ब्लॉक और हर पंचायत में पहुंच चुकी है.
बिहार में एक शांत क्रांति चल रही है. यह देश के सबसे सफल ग्रामीण विकास मॉडलों में से एक बन चुकी है. इसकी कमान संभाली है 1.35 करोड़ महिलाओं ने — जिनमें से ज़्यादातर ने कभी नौकरी नहीं की थी. यह बदलाव हो रहा है राज्य के सबसे छोटे पंचायतों से, बिहार सरकार की प्रमुख योजना जीविका (JEEViKA) के ज़रिए.
इस योजना को चलाने और विस्तार देने का जिम्मा संभाला है हिमांशु शर्मा (IAS), CEO – BRLPS (Bihar Rural Livelihoods Promotion Society) ने. YourStory की फाउंडर और CEO श्रद्धा शर्मा से बातचीत में उन्होंने बताया कि कैसे यह योजना एक प्रयोग से शुरू होकर आज 1 लाख करोड़ रुपये की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बन गई है — और वो भी महिलाओं के नेतृत्व में. हिमांशु शर्मा कहते हैं, “यह कोई राहत योजना नहीं है. यह आत्म-सम्मान, आर्थिक शक्ति और सामूहिक भरोसे की कहानी है.”
संकट से जन्मी, समय के साथ बनी ताकत
जीविका की शुरुआत 2006 में एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर हुई थी, वर्ल्ड बैंक के सहयोग से. उस समय बिहार में ग़रीबी, आर्थिक बहिष्करण और महिलाओं की भागीदारी बेहद कम थी. 2011 में इसे राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत पूरे राज्य में फैलाया गया. यह योजना अब बिहार के 534 ब्लॉक और हर पंचायत में पहुंच चुकी है.
इस योजना की खास बात है इसका तीन-स्तरीय ढांचा. स्वयं सहायता समूह (SHG) में 10 से 15 महिलाएं मिलकर एक समूह बनाती हैं. फिर ये SHG मिलकर ग्राम संगठन (VO) बनाती हैं, और इनसे मिलकर क्लस्टर लेवल फेडरेशन (CLF) तैयार होता है. अब तक 10.6 लाख SHGs बनाए जा चुके हैं, और योजना 1.35 करोड़ महिलाओं तक पहुंच चुकी है. अब तक 78,000 करोड़ रुपये से अधिक का लोन इन समूहों को दिया जा चुका है.
बैंकिंग बिना बैंक, कागज़ या गारंटी के
जीविका की सबसे अनोखी बात है इसका भरोसे पर आधारित लोन सिस्टम. यहां न कोई कागज़ी काम होता है, न गारंटी लगती है, न क्रेडिट स्कोर की जरूरत होती है. “एक महिला SHG की बैठक में आती है, 5,000 रुपये मांगती है, और उसे तुरंत मंज़ूरी मिल जाती है—क्योंकि समूह को उस पर भरोसा है,” हिमांशु शर्मा बताते हैं.
यह कर्ज़ महिलाओं की बैठक में, उनके घर में ही दिया जाता है, पूरी पारदर्शिता और आपसी सहमति से. और सबसे हैरानी की बात? 99.5% ऋण पुनर्भुगतान दर! यह दिखाता है कि महिलाएं इसे सरकार का पैसा नहीं, अपने समूह की पूंजी मानती हैं, और उसे बचाती हैं.
जीरो से क्रेडिट हिस्ट्री बना रहीं महिलाएं
जीविका अब महिलाओं को औपचारिक बैंकिंग सिस्टम से भी जोड़ रही है. “जिन महिलाओं ने 5 साल पहले कभी बैंक नहीं देखा था, आज वो औपचारिक कर्ज़ ले रही हैं,” हिमांशु बताते हैं. सरकार अब आधार और बैंक खातों से लिंक क्रेडिट प्रोफाइल भी बना रही है.
अब जीविका ने 70 से अधिक महिला-नेतृत्व वाली प्रोड्यूसर कंपनियां खड़ी की हैं — खेती, डेयरी, हस्तकला, फूड सर्विस जैसे क्षेत्रों में. इनमें से कई कंपनियां पेशेवर तरीके से चलाई जा रही हैं, और महिलाएं खुद बोर्ड में हैं.
‘दीदी की रसोई’ और ‘बैंक सखी’ जैसी पहलें
'दीदी की रसोई' जीविका दीदियों द्वारा चलाई जा रही कैंटीन हैं जो अस्पतालों और सरकारी संस्थानों में सस्ती और पोषणयुक्त खाना परोसती हैं. वहीं 'बैंक सखी' गांवों में जाकर लोगों को बैंकिंग सेवाएं देती हैं. कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान बैंक सखियों ने 300 करोड़ रुपये के लेन-देन किए थे.
बड़ी अर्थव्यवस्था
जीविका का अनुमान है कि SHGs की कुल आर्थिक गतिविधि अब 1 लाख करोड़ रुपये को पार कर चुकी है. गया की पार्वती देवी 2014 में जीविका से जुड़ीं. अब वो खुद का बिजनेस चला रही हैं. “पहले मेरे पति 3,000 रुपये कमाते थे, अब हम 30,000 रुपये कमाते हैं,” वो कहती हैं.
भागलपुर की एक दीदी, जिनके पति SHG मीटिंग को समय की बर्बादी कहते थे, अब 5 सिलाई मशीनों की यूनिट चला रही हैं और 2 महिलाओं को रोजगार दे रही हैं.
महिलाओं की अगुवाई वाला सबसे बड़ा गवर्नेंस मॉडल
जीविका शायद भारत का सबसे बड़ा महिला-नेतृत्व वाला विकेंद्रीकृत मॉडल है. हर SHG अपनी नेता चुनती है. ग्राम संगठन समन्वय करता है. CLF ट्रेनिंग, खरीदारी और समस्याओं का समाधान करती है.
महिलाएं अब बाल विवाह, दहेज और हिंसा जैसे मुद्दों पर अभियान भी चला रही हैं. कई महिलाएं पंचायत चुनाव जीतकर सरपंच और वार्ड मेंबर भी बन रही हैं. “जब महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती हैं, तो वे आवाज़ उठाना भी सीखती हैं,” शर्मा कहते हैं.
आगे की राह: जेंडर, डिजिटल और मार्केट एक्सेस
बिहार का गिरता बाल लिंगानुपात चिंता का विषय है. जीविका अब महिला अधिकार, डिजिटल साक्षरता और ई-कॉमर्स से जोड़ने पर काम कर रही है. SHG सदस्यों की बेटियों को ट्रेनिंग देकर उन्हें नई पीढ़ी की उद्यमी बनाया जा रहा है.
हिमांशु शर्मा कहते हैं, “यह कोई सब्सिडी या CSR पर निर्भर मॉडल नहीं है. महिलाएं फ्रीबीज़ नहीं मांग रही हैं — वो लोन मांग रही हैं और गर्व से चुका रही हैं. यही असली सशक्तिकरण है.”
Edited by Ravi Pareek



