GAON: बिहारी ब्रांड जिसे Shark Tank के Sharks ने किया सलाम!
GAON की कहानी पढ़िए—कैसे बिहार के चंपारण से निकला एक युवा, लिट्टी-चोखा और चंपारण मीट को राष्ट्रीय गौरव बना रहा है. GAON सिर्फ एक फूड ब्रांड नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की पहचान और गर्व का प्रतीक बन चुका है. जानिए गांव से Shark Tank India के मंच तक, अलोक रंजन की प्रेरणादायक यात्रा.
हाइलाइट्स
आलोक रंजन ने ₹40 लाख की नौकरी छोड़ शुरू किया GAON
Shark Tank India में मिली ₹80 लाख की फंडिंग, ₹6 करोड़ रेवेन्यू
अनुपम मित्तल और विनीता सिंह को भाया GAON का लिट्टी-चोखा
GAON बना रहा लिट्टी को अगला समोसा, मीट को बिरयानी
जब किसी महानगर की किसी कॉर्पोरेट बिल्डिंग में लंच के समय कोई युवक गरमा-गरम लिट्टी-चोखा (Litti-Chokha) निकालता है, तो लोग चौंकते हैं. कोई पूछता है, “ये क्या है?”, कोई मुस्कराकर कहता है, “बिहारी होगा!” लेकिन जब वही युवक गर्व से जवाब देता है, “हां, मैं बिहारी हूं, और ये मेरा खाना है”—तो वहीं से शुरू होती है एक क्रांति.
यह कहानी है उसी आत्मगौरव की—जो स्वाद से शुरू होकर एक पूरे राज्य की पहचान बन गया. यह कहानी है '' ब्रांड की, जिसने लिट्टी-चोखा को सिर्फ व्यंजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन बना दिया.
इसका श्रेय जाता है अलोक रंजन (Alok Ranjan) को. किसान परिवार में जन्मे आलोक ने बिहार के चंपारण की मिट्टी से अपनी पहचान गढ़ी. उन्होंने अपनी आँखों के सामने देखा कि कैसे उनके पिता ने गांव की ज़मीन से उठकर पूरे समाज को बदला. लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी महसूस किया कि देश की राजधानी में "बिहारी" होना एक ताना बन चुका है. उनका पहनावा, बोलचाल, और खाना—हर चीज़ मज़ाक बन जाती थी.
इन्हीं अपमानों, असफलताओं और संघर्षों से उपजा था एक सपना — GAON. एक ऐसा सपना जो सिर्फ एक रेस्तरां नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन जाए. एक ऐसा ब्रांड जो गांव की रसोई से उठकर शहर की थालियों तक पहुंचे. जहां लिट्टी-चोखा को पिज़्ज़ा और पास्ता जितना गर्व से खाया जाए, और जहां चंपारण मीट को बिरयानी जितना सम्मान मिले.
2017 में शरू हुए GAON की कहानी एक युवा की है जो 10वीं में फेल हुआ, पर जीवन की परीक्षा में टॉपर निकला. जिसने लाखों के पैकेज की नौकरी छोड़ी, कर्ज़ में डूबा, बार-बार फेल हुआ, लेकिन कभी हार नहीं मानी. क्योंकि उसके भीतर सिर्फ भूख नहीं थी—उसके भीतर एक जुनून था. अपने गांव, अपनी मां, अपने पिता, अपने खेत, अपनी मिट्टी और अपनी पहचान के लिए.
GAON सिर्फ एक ब्रांड नहीं—एक बेटे का प्रण है. एक जवाब है उस हर सवाल का, जो यह पूछता है, “गांव से कोई बड़ा बिजनेस आइडिया कैसे निकल सकता है?”

GAON के फाउंडर आलोक रंजन लिट्टी-चोखा और चंपारण मीट को पिज़्ज़ा और पास्ता जितना सम्मान दिलाने के मिशन पर हैं.
'GAON' का गांव से शुरू हुआ सफर
GAON के फाउंडर अलोक रंजन का जन्म बिहार के चंपारण जिले में हुआ. एक ऐसे गांव में जहां उनके पिता ने किसान के बेटे से गांव के नायक बनने तक का सफर तय किया. गरीबी, 10वीं में फेल होना, और समाज के ताने—ये सब अलोक की जिंदगी का हिस्सा रहे. लेकिन इन्हीं चुनौतियों ने उन्हें एक ज़िद दी: कुछ कर दिखाने की.
दिल्ली आकर उन्होंने इंजीनियरिंग में दाखिला लिया, लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ आ गया कि उनका असली जुनून बिजनेस में है. उन्होंने BBA किया और 19 साल की उम्र में 'BookingArena' नाम से अपनी पहली कंपनी शुरू की. यह स्टार्टअप फेल हुआ, पर उन्हें टीमवर्क और एग्जीक्यूशन का असली मतलब समझ में आया.
आगे चलकर MBA के दौरान उन्होंने , , NDTV, , Shaadisaga, और जैसी कंपनियों में काम किया. Hungerbox में उन्होंने फूडटेक इंडस्ट्री की गहराई से समझ हासिल की.
GAON की शुरुआत: आत्मसम्मान और स्वाद की लड़ाई
दिल्ली जैसे शहर में जब उन्होंने "बिहारी" शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल होते देखा, तो अंदर एक चिंगारी सुलगी. उन्हें महसूस हुआ कि बिहार का खाना, संस्कृति और पहचान या तो मज़ाक बन चुकी है या फिर अनदेखी.
यहीं से जन्म हुआ GAON का. यह सिर्फ एक फूड ब्रांड नहीं, बल्कि एक आंदोलन बना—जहां लिट्टी-चोखा और चंपारण मीट जैसे पारंपरिक व्यंजन गर्व का प्रतीक बने. उन्होंने ₹40 लाख सालाना की नौकरी छोड़ी और खुद की बचत, लोन, एफडी और दोस्तों से उधारी लेकर इस सपने को जिंदा रखा.

Shark Tank India के मंच पर GAON के फाउंडर आलोक रंजन
चंपारण और लिट्टी ही क्यों?
चंपारण सिर्फ आलोक का गांव नहीं था, बल्कि महात्मा गांधी की पहली सत्याग्रह भूमि थी—आंदोलन और आत्मसम्मान का प्रतीक. और लिट्टी? वो सिर्फ खाना नहीं, पूरे बिहार की आत्मा है. सादा, पौष्टिक और सांस्कृतिक—एक सुपरफूड जिसे आज के हेल्थ-कॉन्शस इंडिया में फिर से पहचान मिलनी चाहिए.
आज के युवा अपनी जड़ों को फिर से खोज रहे हैं. यही सही वक्त था GAON जैसे ब्रांड के लिए, जो खाने के ज़रिए संस्कृति को वापस ला सके.

GAON की टीम
चुनौतियां
YourStory हिंदी से बात करते हुए आलोक बताते हैं, “लिट्टी को ‘गरीबों का खाना’ कहकर नजरअंदाज किया जाता रहा है. सबसे पहली चुनौती यही थी—इसे गर्व और स्वाद का ब्रांड बनाना. शहरी उपभोक्ताओं के लिए इसे दोबारा पोजिशन करना पड़ा—हाइजीन, पैकेजिंग और कहानी के साथ.”
इसके बाद सप्लाई चेन की चुनौती आई. उन्होंने सारा माल—सत्तू, गेहूं, मसाले—सीधे किसानों से खरीदना शुरू किया, बिचौलियों को हटाया. मिट्टी के तंदूर से लेकर सस्टेनेबल पैकेजिंग तक, हर स्टेप में परंपरा और तकनीक का मेल किया गया.
शार्क टैंक की पिच: सिर्फ पैसा नहीं, पहचान की लड़ाई
जब GAON ने में कदम रखा, तो अलोक का मकसद सिर्फ फंडिंग पाना नहीं था. वो चाहते थे कि देशभर में लोग समझें कि लिट्टी-चोखा और चंपारण मीट सिर्फ क्षेत्रीय व्यंजन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गर्व हैं.
उन्होंने अपनी कहानी, संघर्ष और विज़न साझा किया. GAON को उन्होंने एक कल्चरल स्टार्टअप के रूप में प्रस्तुत किया—जो गांव की खुशबू को शहरों में ले जा रहा है. अनुपम मित्तल (Anupam Mittal, Founder & CEO, ) और विनीता सिंह (Vineeta Singh, CEO, ) ने उनके मिशन को समझा और निवेश किया. अनुपम और विनीता से 8 फीसदी (दोनों की 4-4%) इक्विटी के बदले ₹20 करोड़ की वैल्यूएशन पर GAON को ₹80 लाख की फंडिंग मिली. साथ ही मिली आलोक को मेंटरशिप और एक नई पहचान भी मिली.
इस अनुभव ने अलोक को सिखाया कि सिर्फ जज़्बा ही काफी नहीं, डाटा, स्केलेबिलिटी और ब्रांड बिल्डिंग भी उतनी ही जरूरी है. निवेश सिर्फ पैसा नहीं देता—वो दिशा और सहारा भी देता है.

(L-R) Shark Tank India के मंच पर विनीता सिंह (CEO, SUGAR Cosmetics), आलोक रंजन (Founder, GAON) और अनुपम मित्तल (Founder & CEO, People Group). Sharks अनुपम और विनीता ने GAON को ₹80 लाख की फंडिंग दी है.
रेवेन्यू और भविष्य की योजनाएं
GAON आज ₹6 करोड़ की सालाना आमदनी कर रहा है. इस साल के अंत तक ₹15–19 करोड़ और अगले दो सालों में ₹69 करोड़ का लक्ष्य है. इसका बिजनेस मॉडल मल्टी-चैनल है — , Eternal (पहले ), वेबसाइट, डायरेक्ट ऑर्डर, फूड फेस्टिवल और B2B (बिजनेस-टू-बिजनेस) ऑर्डर.
जल्द ही GAON स्नैक्स ब्रांड भी लॉन्च करेगा, जो हेल्दी और देसी ऑप्शन देगा—मॉमोज और समोसे की जगह सत्तू-पकवान. Thekua, खुरमा, सत्तू पराठा, और रेडी-टू-ईट लिट्टी-चोखा जैसे D2C (डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर) प्रोडक्ट्स भी जल्द आ रहे हैं.
GAON की स्केलिंग स्ट्रैटेजी में दो पिलर हैं—क्लाउड किचन और फ्रेंचाइज़. क्लाउड किचन से कम लागत में शहरी मार्केट में विस्तार किया जा रहा है. फ्रेंचाइज़ से स्थानीय उद्यमियों को जोड़ा जा रहा है—जो GAON के विज़न से जुड़ना चाहते हैं.
इसके अलावा, रिटेल में D2C प्रोडक्ट्स और सुपरमार्केट उपलब्धता बढ़ाई जा रही है. GAON का सपना है कि हर शहर में एक कोना ऐसा हो जहां गांव की खुशबू मिले.
आलोक कहते हैं, “लिट्टी को समोसा, चंपारण मीट को बिरयानी बनाना है.”
GAON का मिशन सिर्फ स्वाद बेचने का नहीं है—बल्कि परंपरा को गर्व में बदलने का है. लिट्टी-चोखा और चंपारण मीट को वही दर्जा दिलाना है जो समोसा और बिरयानी को मिला है.
स्मार्ट मार्केटिंग, इमोशनल ब्रांडिंग और सुलभ दामों के साथ GAON इन्हें हर घर तक पहुंचाना चाहता है. ताकि एक दिन, जब लोग ऑफिस जाते हुए लिट्टी खाते दिखें, तो वो गर्व से कह सकें—“ये मेरा खाना है, मेरे GAON का खाना है.”
GAON की कहानी सिर्फ बिजनेस की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की है. यह उस युवा की कहानी है जिसने चंपारण की मिट्टी से उठकर शार्क टैंक तक का सफर तय किया—और भारत के गांवों की खुशबू को ग्लोबल फूड मार्केट तक पहुंचा दिया.
अलोक रंजन की यह यात्रा बताती है कि असली उद्यमिता डिग्री या भाषा से नहीं, इरादों से होती है. और GAON की यह आग, अब सिर्फ चूल्हे तक सीमित नहीं, बल्कि एक पूरे देश के दिल में धधक रही है.



