10 वीं पास कश्मीरी युवक की बनाई अखरोट तोड़ने वाली मशीन, कारोबार में लगे पंख

    By Harish Bisht
    November 17, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:19:24 GMT+0000
    10 वीं पास कश्मीरी युवक की बनाई अखरोट तोड़ने वाली मशीन, कारोबार में लगे पंख
    • +0
      Clap Icon
    Share on
    close
    • +0
      Clap Icon
    Share on
    close
    Share on
    close

    दसवीं पास हैं मुश्ताक अहमद डार....

    अनंतनाग में रहते हैं मुश्ताक...

    1 घंटे में 150 किलो अखरोट तोड़ती है मशीन...

    ‘पोर्टेबल क्लाइम्बर’ के जरिये पेड़ और पोल पर चढ़ना हुआ आसान...


    अपनी सोच को हकीकत में कैसे बदला जाता है इस बात को मुश्ताक अहमद डार से बेहतर कौन समझ सकता है। वो एक कश्मीरी युवा हैं लेकिन दसवीं पास होने के बावजूद उन्होने वो कर दिखाया जो काम इंजीनियरिंग के क्षेत्र से जुड़ा व्यक्ति ही कर सकता है। कश्मीर के अनंतनाग इलाके में रहने वाले मुश्ताक अहमद डार ने ऐसी मशीन को ईजाद किया है जो अखरोट तोड़ने का काम करती है। इतना ही उन्होने एक ऐसे ‘पोर्टेबल क्लाइम्बर’ का डिजाइन तैयार किया है जिसके जरिये आसानी से ना सिर्फ ऊंचे पोल में चढ़ा जा सकता है बल्कि पेड़ पर चढ़ने के लिए भी ये काफी मददगार है।

    image


    मुश्ताक को बचपन से लड़की के खिलौने बनाने का शौक था। जिनका इस्तेमाल वो अपने घर को सजाने में करते थे। एक बार उनके एक टीचर की नजर उन खिलौनों पर गई तो उन्होने मुश्ताक से एक खिलौना मांग लिया। टीचर की इस डिमांड से मुश्ताक के अंदर आत्मविश्वास पैदा हुआ जिसके बाद उन्होने खिलौनों के अलावा दूसरी चीजों पर भी हाथ अजमाना शुरू किया। मुश्ताक का परिवार अखरोट तोड़ने के कारोबार से जुड़ा हुआ था। जब वो दसवीं क्लास में थे तो उनके पिता का निधन हो गया इस कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई और मजबूरन उनके कंधों पर अपने परिवार का कारोबार चलाने की जिम्मेदारी आ गई।

    मुश्ताक ने देखा कि अखरोट तोड़ने में काफी परिश्रम लगता था और ये मुश्किल काम भी था। इतना ही नहीं एक घंटे में केवल दस किलो अखरोट ही तोड़े जा सकते थे। तब उनके मन में विचार आया कि क्यों ना एक ऐसी मशीन तैयार की जाये जो 5-6 आदमियों का काम अकेले कर सके और किसी को चोट भी ना पहुंचे। मुश्ताक का कहना है कि “अखरोट को तोड़ने में काफी वक्त बर्बाद होता था और कई बार अखरोट तोड़ने वाले के हाथ में चोट भी लग जाती थी। इसलिए मैंने मशीन बनाने का काम शुरू किया और इसे बनाने में लोगों की राय भी ली।” मुश्ताक के साथियों ने उनका उत्साह बढ़ाया तो वो रात दिन इस मशीन को बनाने में जुट गये। मुश्ताक बताते हैं कि उनको मशीन में कई बार बड़े परिवर्तन भी करने पड़े लेकिन तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद वो अखरोट तोड़ने वाली मशीन को बनाने में कामयाब हो सके।

    मुश्ताक का कहना है कि “ये काम मुश्किल था क्योंकि मुझे ऐसी मशीन बनानी थी जो ना सिर्फ अखरोट को तोड़े बल्कि उसकी गिरी को भी साबुत रखे।” आज ये मशीन अलग अलग अकार, आकृति और कठोर अखरोट को ना सिर्फ आसानी से तोड़ती है बल्कि उसके अंदर की गिरी को भी सही सलामत रखती है। इस मशीन में लकड़ी का रोलर, मोटर और पुल्ली का इस्तेमाल किया गया। खास बात ये है कि ये मशीन बिजली और बिना बिजली दोनों तरीके से चलती है। अगर इस मशीन को बिजली से चलाया जाये तो ये एक घंटे में करीब डेढ़ सौ किलो अखरोट तोड़ देती है जबकि बिना बिजली के ये करीब सौ किलो अखरोट तोड़ देती है। मशीन को एक जगह से दूसरी जगह लाने ले जाने के लिए इसके नीचे पहिए लगे हुए हैं। अखरोट कश्मीर में एक बड़ा उद्योग है। एक अनुमान के मुताबिक यहां पर हर साल 1 लाख मिट्रिक टन अखरोट पैदा होता है जो देश में ही नहीं विदेशों में भी निर्यात किया जाता है। मुश्ताक की इस खोज के बाद जाहिर है कि इस उद्योग में पंख लगेंगे। आज मुश्ताक की बनाई इस मशीन का इस्तेमाल कश्मीर के अलावा हैदराबाद और नेपाल में भी हो रहा है। इसकी कीमत के बारे में उनका कहना है कि ये सिर्फ 30 हजार रुपये में खरीदी जा सकती है।

    image


    मुश्ताक के नाम ये यही एक उपलब्धि दर्ज नहीं है उन्होने एक ऐसे ‘पोर्टेबल क्लाइम्बर’ का डिजाइन तैयार किया है जिसके जरिये आसानी से ना सिर्फ ऊंचे पोल में चढ़ा जा सकता है बल्कि पेड़ पर चढ़ने के लिए भी ये काफी मददगार साबित होता है। मुश्ताक बताते हैं कि “मैं अपने आसपास देखता था कि बिजली के ऊंचे खंभों पर चढ़ने के लिए लोग सीढियों का इस्तेमाल करते थे जो ना सिर्फ काफी भारी होती थीं बल्कि उसको उठाने के लिए दो लोगों को जरूरत भी होती थी इसलिए मैंने सोचा कि क्यों ना कोई ऐसी चीज बनाई जाये जिससे ये दिक्कत दूर हो सके।” आज मुश्ताक के डिजाइन किया हुआ ‘पोर्टेबल क्लाइम्बर’ को आसानी से कोई भी व्यक्ति इस्तेमाल कर कितने भी ऊंचे पोल या पेड़ पर सुरक्षित चढ़ सकता है। खास बात ये है कि ये मशीन वजन में भी काफी हल्की है। करीब चार किलो वाली इस मशीन को एक बैग में रखकर इधर से उधर लाया ले जाया जा सकता है। मुश्ताक के डिजाइन किये ‘पोर्टेबल क्लाइम्बर’ की डिमांड मलेशिया में काफी ज्यादा है। जबकि देश में जल्द ही इसके बाजार में आने की उम्मीद है। इसका निर्माण अहमदाबाद की एक कंपनी कर रही है।

    मुश्ताक भले ही ज्यादा पढ़ाई ना कर पाएं हों लेकिन उन्होने अपने इनोवेशन से साबित कर दिया कि अगर मौके मिले तो अपनी सोच को हकीकत में बदलने से कोई नहीं रोक सकता।

    Clap Icon0 Shares
    • +0
      Clap Icon
    Share on
    close
    Clap Icon0 Shares
    • +0
      Clap Icon
    Share on
    close
    Share on
    close