'Aindra Systems', भारतीय उद्योगों को बेहतर बनाने की कोशिश का नाम...

By Pooja Goel
July 01, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
'Aindra Systems', भारतीय उद्योगों को बेहतर बनाने की कोशिश का नाम...
आईआईएम बैंगलोर और एनआईटी जालंधर से स्नातक आदर्श नटराजन और अभिषेक मिश्रा के दिमाग की उपज है यह स्टार्टअपसबसे पहले कर्नाटक सरकार के लिये मिड डे मील में होने वाली अनियमितता को रोकने में मदद करने के लिये किया प्रौद्योगिकी का प्रयोगइसके बाद स्वास्थ्य सेवा से संबंधित उद्योगों के लिये एआई उत्पादों का किया निर्माणआने वाले दिनों में टेलीमेडिसन और कपड़े से संबंधित दो भावी तकनीकों पर कर रहे हैं काम
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वर्ष 2012 में आईआईएम बैंगलोर के स्नातक आदर्श नटराजन और एनआईटी जांलधर के स्नातक अभिषेक मिश्रा ने बड़े उद्योगों के लिये एआई उत्पाद तैयार करने वाले एक स्टार्टअप 'Aindra Systems' की शुरुआत की। कर्नाटक सरकार के साथ अपने परामर्श के दौर के बाद नटराजन और मिश्रा ने इसकी नींव रखी। सरकार के सामने एक कड़ी चुनौती थी कि सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिये जाने वाले मध्यान्ह भोजन योजना जिसे मिड डे मील के नाम से जाना जाता है में दिये जाने वाले अनुदान में फर्जीवाड़ा किया जा रही था जिसके फलस्वरूप यह अनुदान अपने अपेक्षित लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पा रहा था। नटराजन कहते हैं, ‘‘हमनें उन्हें कहा कि फिंगरप्रिंटिंग समाधान उनके किसी काम का नहीं और उन्हें एक ‘टचलैस’ साधन की आवश्यकता है। हमनें उन्हें उपस्थिति दर्ज करने के लिये फेस रिकाॅगनेशन तकनीक (चेहरा पहचानने की तकनीक) अपनाने की सलाह दी और उनके लिये एक स्मार्ट उपस्थिति उत्पाद बनाया। इस प्रकार मूल रूप से 'Aindra Systems' की उत्पत्ति हुई।’’

हालांकि अपने सफर के प्रारंभ में ही विलग्रो समर्थित यह स्टार्टअप शिक्षा के क्षेत्र को अपना केंद्र बिंदु बनाने के लक्ष्य से दूर चला गया। नटराजन कहते हैं, ‘‘हमने भी किसी अन्य स्टार्टअप की तहर ही कई सामान्य समस्याओं का सामना किया।’’ हालांकि सरकारी विभागों के साथ काम करने में आने वाली लगातार बढ़ती दिक्कतों के मद्देनजर इन्होंने सार्वजनिक शिक्षा के क्षेत्र से दूर जाने का फैसला किया। वे आगे कहते हैं, ‘‘वास्तव में उनके साथ काम करना बिल्कुल भी स्थायी नहीं था। हमने इसके स्थान पर अपना ध्यान सूक्ष्म वित्त संस्थानों, स्वास्थ्य सेवाओं और व्यवसायिक प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में केंद्रित किया। भारतीय बाजार के साथ सबसे दिक्कत यह है कि यह कुछ भी नई चीज या संकल्पना को अपनाने को तैयार ही नहीं होता। हम एक बेहद पिछड़ी हुई मुख्यधारा का बाजार हैं। ई-काॅमर्स से संबंधित क्षेत्र को छोड़ दें तो प्रत्येक स्टार्टअप को इस चुनौती का सामना करना पड़ता है।’’

आदर्श नटराजन और अभिषेक मिश्रा

आदर्श नटराजन और अभिषेक मिश्रा


नटराजन की टीम अब भी मझोले शैक्षणिक संस्थानों के साथ संपर्क में रहती है। वे उन्हें मूलतः दृश्य निगरानी के माध्यम से कक्षा का उपस्थिति रिकाॅर्ड करने की अपनी स्मार्ट उपस्थिति तकनीक प्रदान करते हैं।इनके अधिकतर उत्पाद मशीनी शिक्षा और सूक्ष्म-दृष्टि का एक मिश्रण हैं।

इनका मुख्य उद्देश्य उन बढ़े चुनिंदा उद्योगों के साथ काम करने का है जो बड़े पैमाने पर प्रभाव डालने में सक्षम हैं। नटराजन कहते हैं, ‘‘हम अपनी विशेषताएं उन समस्याओं को हम करने में प्रयोग करते हैं जिनका हम एक व्यवहार्य तरीके से समाधान दे सकते हैं।’’ ऐसी ही एक विकट समस्या थी स्वास्थ्यसेवा के उद्योग के लिये एआई उत्पादों का निर्माण करना। हालांकि स्वास्थ्यसेवा के पेशेवरों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श के बाद नटराजन इस नतीजे पर पहुंचे कि इस उद्योग को अभी तक बहुत कम प्रतिनिधित्व मिल पाया है। वे कहते हैं, ‘‘हम अपने लगभग 70 फीसदी उपकरण विदेशों से आयात करते हैं। हालांकि इन उत्पादों की मांग तो बहुत है लेकिन दुर्भाग्य से अभी तक पारंपरिक व्यवसाइयों या स्टार्टअप्स की नजर इस ओर नहीं पड़ी है।’’ स्वास्थ्यसेवा उद्योग के लिये उत्पादों का निर्माण करते समय मुख्यतः एक विशेष अंतःविषयी दृष्टिकोंण की आवश्यकता होती है जहां विभिन्न विशेज्ञताएं आपस में मिलकर काम करती हैं। आप चाहे जिस भी उत्पाद का निर्माण कर रहे हों आपके पास हार्ड इंजीनियरिंग, वैज्ञानिक और चिकित्सा के क्षेत्र की विशेषज्ञता होना एक जरूरी शर्त है। ‘‘यही एक मुख्य वजह है कि आप इस क्षेत्र में काम करने को तत्पर अधिक स्टार्टअप्स देखने में सफल नहीं होते हैं। भारत में किसी भी क्षेत्र में प्रारंभिक दौर में आने वाली बाधाओं की बहुतायत है। या किसी भी स्टार्टअप के लिये आदर्श स्थान नहीं है। लेकिन एक बार आप कुछ अलग करने में सफल रहे तो फिर आपके लिये संभावनाओं के असीद द्वार खुल जाते हैं।’’

इन्हें भी एक ऐसा ही अवसर मिला जब ये सर्वाइकल कैंसर का पता लगाने में मदद करने वाली एक तकनीक को खोजने में सफल हुए। ‘‘भारत में इस बीमारी से ग्रसित लोगों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है। हमें लगता है कि भारत में अधिकतर लोगों विशेषकर महिलाओं की पहुंच उच्च स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं तक नहीं है और हम ऐसे लोगों को एक ही केंद्र बिंदु पर उनकी समस्या का निदान प्रदान कर सकते हैं। हमें विश्वास है कि इस तरह से हम भारत के स्वास्थ्यसेवा के ढांचे को बदलने में कामयाब होंगे।’’

इसके अलावा यह स्टार्टअप गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों (एनबीएफआई) को भी अपनी सेवाएं प्रदान करता है। ‘‘हमारी तकनीक के द्वारा वे मैदान में कार्यरत अपने कर्मचारियों पर नजर रखने का काम कम कीमत वाले स्मार्टफोन के जरिये कर सकते हैं। इसके अलावा हम संस्थानों को हजारों की संख्या में आने वाले व्यवसासिक प्रशिक्षुओं के प्रबंधन के लिये भी तकनीक उपलब्ध करवाते हैं।’’

इसके बावजूद सरकार के बारे में बात किये बिना इस प्रकार बड़े पैमाने पर प्रभाव डालने के बारे में बताना बेहद मुश्किल है। नटराजन कहते हैं ‘‘सरकार का चीजों को, चाहे वे उत्पाद को या सेवाएं, खरीदने का तरीका एक स्टार्टअप के बिल्कुल अनुकूल नहीं है। उनके व्यापार से संबंधित अपने तय मानक हें जैसे परिचालन इतिहास और वार्षिक लाभप्रदता का इतिहास। इसके अलावा नौकरशाही से संबंधित मुद्दों के चलते समय पर भुगतान मिलना एक बहुत बड़ी चुनौती है। मेरे ख्याल से सरकार को अपने कामकाज के तरीकों में आमूलचूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।’’

इस दौरान यी टीम टेलीमेडिसन और कपड़े से संबंधित दो भावी तकनीकों पर काम कर रहे हैं। नटराजन कहते हैं, ‘‘हम मरीजों को स्वाभाविक रूप से डाॅक्टरों तक पहुंचने में मदद करने के लिये एक दो कारकों पर आधारित प्रमाणीकरण प्रणाली विकसित कर रहे हैं। एक मरीज को कैसे पता चले कि उसका इलाज रह बार उसी डाॅक्टर के द्वारा हो रहा है जिससे इलाज करवाने के लिये वी भुगतान कर रहा है?’’ ऐसे में इनकी दृश्य आधारित तकनीक काम में आती है जिसमें कोई भी रिपोर्ट तैयार करने से पहले या मरीज को छोड़ने से पहले उसका चेहरा कैप्चर हो जाता है।

कपड़ा क्षेत्र के बारे में बताते हुए नटराजन कहते हैं, ‘‘हम अनुकूलित रोबोटिक्स तैयार करने के लिये बैंगलोर के कई कपड़ा निर्माताओं के संपर्क में हैं।’’ इसका सीधा मतलब यह है कि विभिन्न इनपुट को स्वीकरते हुए उनके अनुसार जवाब देने के लिये एक मशीन के प्रोग्रम को तैयार करना।

तकनीकों की देर से स्वीकार्यता के अलावा नटराजन के सामने और भी कई चुनौतियां मौजूद हैं और उनमें से मुख्य है कि एआई तकनीक को अभी भी समूचे भारत में मान्यता नहीं मिल पाई है। ‘‘यह कई विभिन्न मुद्दों के चलते कई उद्योगों के लिये माकूल साबित नहीं हो पा रहा है। बहरहाल हम एक ऐसे दिलचस्प समय में काम कर रहे हैं जब कंप्यूटिंग बेहद सस्ती होने के अलावा अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में लगातार इजाफा देखने के मिल रहा है जिसके चलते एआई और मशीनी शिक्षा लोगों के लिये अधिक व्यवहारिक हो गई है।’’

अंत में नटराजन कहते हैं, ‘‘हालांकि अभी एआई तकनीक आम लोगों की पहुंच से दूर है लेकिन हम इस धारणा को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। हो सकता हे कि यह अभी प्रारंभिक चरण में हो लेकिन लंबे समय में होने वाले इसके प्रभाव एक बुनियादी बदलाव लाने में सफल होंगे।’’

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