इस दिल के दरीदां दामन को देखो तो सही, सोचो तो सही

By जय प्रकाश जय
June 15, 2017, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:16:30 GMT+0000
इस दिल के दरीदां दामन को देखो तो सही, सोचो तो सही
इब्ने इंशा के शब्दों से जिसका भी साबका पड़ा है, उन्हें बार-बार पढ़ते हुए उनकी सर्जनाओं में डूब जाना चाहता है...
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"ये कैसा गोरखधंधा है, ये कैसा तानाबाना है, ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं, तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं? ये शब्द और सवाल हैं 'उर्दू की आख़िरी किताब' के व्यंग्य लेखक एवं कवि इब्ने इंशा के, जिनका आज जन्मदिन है..."

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जालंधर (पंजाब) में जन्मे इंशा उर्दू के नामवर शायर और व्यंग्यकार होने के साथ ही यात्रा लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं।

इब्ने इंशा के शब्दों से जिसका भी साबका पड़ा है, उन्हें बार-बार पढ़ते हुए उनकी सर्जनाओं में डूब जाना चाहता है। उनकी शायरी में ज़बान का अलग चटख़ारापन है। अदभुत सा अल्हड़पन, जैसे कोई मासूम गलियों में उछलता कूदता, समाज से बेपरवाह, हाथ में स्कूल का बैग झुलाते हुए हर आते-जाते को छेड़ता चल रहा हो। जालंधर (पंजाब) में जन्मे इंशा उर्दू के नामवर शायर और व्यंग्यकार होने के साथ ही यात्रा लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। देश के विभाजन के बाद वह करांची (पाकिस्तान) चले गए थे। उनके बचपन का नाम शेर मोहम्मद खाँ है।

किशोर वय होने पर उन्होंने खुद ही अपना नाम बदलकर इब्ने इंशा रख लिया और इसी नाम से लेखन करने लगे। उन्हें जितनी महारत उर्दू में, उतनी ही हिंदी में भी हासिल थी। उर्दू की आख़िरी किताब, चाँदनगर, इस बस्ती इस कूचे में, दुनिया गोल है, आवारागर्द की डॉयरी आदि उनकी प्रमुख कृतियां हैं।

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मनुष्य की स्वाधीनता और स्वाभिमान के प्रबल पक्षधर इब्ने इंशा की साहित्यिक लहज़े में मीर की खस्तगी और नज़ीर की फ़कीरी झलकती है। वह जितनी बारीकी से अपने वक्त को देखते हैं, उतनी ही खूबसूरती से उसकी एक-एक पदचाप को शब्दों के लाख शोर मचाने के बावजूद अपने आईने में सहेज-संभालकर रखते चले जाते हैं। इब्ने इंशा की नज़्मों और कविताओं की सादगी अपना अलग आकर्षण रखती है। जो कोई भी उन्हे एक बार पढ़ता है, उनकी ओर खिंचा चला जाता है। आज तक बच्चों पर न जाने कितनी कविताएं लिखी-पढ़ी जा चुकी होंगी, लेकिन सीधे-सादे शब्दों में इथोपिया के अकाल पीड़ित एक बच्चे पर उकेरी गईं मानवता की अमूल्य धरोहर जैसी उनकी पंक्तियां किसी को भी अंदर तक मसोस देती हैं। इस रचना से वह एक बड़ा संदेश देते हैं, कि दुनिया का हर बच्चा हमारा अपना है और उसकी जरूरतों को पूरा करना पूरी मनुष्यता का पहला दायित्व है -

"यह बच्चा कैसा बच्चा है।

यह बच्चा काला-काला-सा,

यह काला-सा मटियाला-सा,

यह बच्चा भूखा भूखा-सा,

यह बच्चा सूखा सूखा-सा,

जो रेत पे तन्हा बैठा है,

ना इसके पेट में रोटी है,

ना इसके तन पर कपड़ा है,

ना इसके सर पर टोपी है,

ना इसके पैर में जूता है,

ना इसके पास खिलौनों में,

कोई भालू है कोई घोड़ा है,

ना इसका जी बहलाने को,

कोई लोरी है, कोई झूला है,

ना इसकी जेब में धेला है,

ना इसके हाथ में पैसा है,

ना इसके अम्मी-अब्बू हैं,

ना इसकी आपा-ख़ाला है,

यह सारे जग में तन्हा है,

यह बच्चा कैसा बच्चा है।"

इंशा की उर्दू रचनाओं में हिंदी शब्दों की भरमार उनके सृजन-फलक को अलग तरह का विस्तार और भाषाई सहोदरता का संदेश देती है। उनके तेवर सूफियाना से लगते हैं, जब वह कहते हैं- 'सब माया है, सब ढलती-फिरती छाया है, इस इश्क़ में हमने जो खोया या पाया है, जो तुमने कहा है, 'फ़ैज़' ने जो फ़रमाया है, सब माया है।' उनकी लेखनी की एक और पहचान शब्दों की तीक्ष्णता रही है। देखिए कि शिक्षा पर किस तरह सधे-सधे तंज कसते हैं- 'इल्म बड़ी दौलत है। तू भी स्कूल खोल, इल्म पढ़ा, फीस लगा, दौलत कमा, फीस ही फीस, पढ़ाई के बीस, बस के तीस, यूनिफार्म के चालीस, खेलों के अलग, वेरायटी प्रोग्राम के अलग, पिकनिक के अलग, लोगों के चीखने पर न जा, दौलत कमा, उससे और स्कूल खोल, उनसे और दौलत कमा, कमाए जा, कमाए जा....।' अपने शब्दों से वह जीवन भर मनुष्यता की अलख लगाते रहे, लोगों को जगाते, ललकारते और सामाजिक जनजीवन के प्रति सजग करते रहे-

"इंशा जी उठो, अब कूच करो, इस शहर में जी को लगाना क्या।

वहशी को सुकूं से क्या मतलब, जोगी का नगर में ठिकाना क्या।

इस दिल के दरीदां दामन को देखो तो सही, सोचो तो सही,

जिस झोली में सौ छेद हुए, उस झोली का फैलाना क्या।

शब बीती, चाँद भी डूब चला, जंज़ीर पड़ी दरवाजे में,

क्यों देर गये घर आए हो, सजनी से करोगे बहाना क्या।

उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सके पर छू न सके

जिसे देख सकें पर छू न सकें, वह दौलत क्या, वो ख़ज़ाना क्या।"

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