बचपन में पिता को जूते बनाते देखा, बड़े होकर ज़ेबा रानी ने खड़ा किया फुटवियर ब्रांड
आगरा के शमसाबाद की ज़ेबा रानी ने ODOP ट्रेनिंग और यूपी सरकार की CM YUVA Yojana के तहत मिली मदद से अपना फुटवियर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट शुरू किया. यह कहानी दिखाती है कि पारिवारिक अनुभव और सरकारी सहयोग से महिलाएं कैसे स्थिर व्यवसाय खड़ा कर सकती हैं.
आगरा जिले के शमसाबाद की रहने वाली ज़ेबा रानी का बचपन जूते चप्पल के काम के बीच बीता. उनके पिता पिछले करीब पच्चीस साल से फुटवियर के काम से जुड़े हैं. कभी फैक्ट्री में उत्पादन तो कभी व्यापार. चमड़े की कटिंग, सिलाई, फिटिंग, फिनिशिंग और पैकिंग. यह सब ज़ेबा ने किसी बिजनेस योजना की तरह नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के काम की तरह देखा.
बचपन में जो चीजें सामान्य लगती थीं, वही आगे चलकर उनके काम आईं. बाद में ज़ेबा ने ODOP (एक जनपद एक उत्पाद) सेंटर से फुटवियर और लेदर से जुड़ी ट्रेनिंग ली. यहां उन्हें चमड़े की अलग अलग किस्मों की जानकारी मिली. यह भी समझ आया कि जूता बनने की प्रक्रिया किस क्रम में होती है. कौन सी मशीन किस काम के लिए होती है और उन्हें कैसे चलाया और संभाला जाता है.
इस ट्रेनिंग ने उनके अनुभव को दिशा दी. जो बातें पहले अधूरी समझ में आती थीं, अब साफ होने लगीं. उन्हें यह भी समझ आया कि अगर खुद का यूनिट शुरू करना है तो किन चीजों की जरूरत पड़ेगी.
ट्रेनिंग के बाद ज़ेबा ने अपना काम शुरू करने के बारे में सोचना शुरू किया. यह फैसला अचानक नहीं था. पिता का पहले से चल रहा काम उनके लिए सहारा था. मशीनों, कच्चे माल और उत्पादन की बुनियादी समझ उन्हें पहले से थी. लेकिन छोटे स्तर से आगे बढ़ने के लिए आर्थिक मदद जरूरी थी.
उन्होंने ODOP के माध्यम से यूपी सरकार की ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान’ योजना (CM YUVA Yojana) के तहत आवेदन किया. लोन मंजूर हुआ. इसी मदद से उन्होंने अपना फुटवियर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट खड़ा किया.
पहले काम सीमित था और ज्यादातर व्यापार तक ही था. नए यूनिट के साथ उत्पादन बढ़ा. अब जूते बड़ी संख्या में बनने लगे. धीरे धीरे ऑर्डर स्थानीय बाजार से बाहर भी जाने लगे. उनके बनाए जूते आसपास के इलाकों से आगे पहुंचने लगे.
मैन्युफैक्चरिंग शुरू होने से काम के साथ साथ घर की स्थिति में भी बदलाव आया. आमदनी पहले से ज्यादा नियमित हो गई. यूनिट में चार से पांच लोग लगातार काम करने लगे.
काम को चरणों में बांटा गया. कोई कटिंग करता है. कोई फिटिंग संभालता है. कोई बॉटम का काम करता है. फिनिशिंग, पासिंग और पैकिंग के लिए अलग जिम्मेदारियां हैं. ज़ेबा काम का बंटवारा देखती हैं. फिनिशिंग की जांच करती हैं. यह भी देखती हैं कि तैयार माल तय गुणवत्ता पर खरा उतरे.
आज उनका काम ज्यादा तर मैनेजमेंट और निगरानी से जुड़ा है. पूरी प्रक्रिया को सही तरीके से चलाना उनकी जिम्मेदारी है. परिवार का साथ अब भी अहम है. पिता अपने अनुभव से सलाह देते हैं. भाई काम में हाथ बंटाते हैं. इस तरह यह यूनिट व्यवहार में एक पारिवारिक उद्यम बन गई है.
आगे चलकर ज़ेबा चाहती हैं कि उनके जूते आगरा से बाहर और ज्यादा बाजारों तक पहुंचें. वह धीरे धीरे अपने काम को एक पहचान देने का सपना देखती हैं. फिलहाल उनका ध्यान स्थिर उत्पादन, भरोसेमंद गुणवत्ता और संतुलित बढ़त पर है. इसमें सीएम युवा योजना का सहयोग उन्हें लगातार सहारा देता है.
अपने सफर को याद करते हुए ज़ेबा कहती हैं कि पहले वह सिर्फ काम को देखा करती थीं. आज वह उसे खुद संभाल रही हैं. देखने से जिम्मेदारी तक का यह सफर उन्हें स्थिरता और आत्मविश्वास देता है. बिना जल्दबाजी के आगे बढ़ने का भरोसा देता है.
Edited by रविकांत पारीक



