AKVO: हवा से रोज 3,00,000 लीटर पानी बनाने वाला स्टार्टअप
हवा से पानी बनाने वाला कोलकाता का स्टार्टअप AKVO अब तक 15 देशों में 2,000 से अधिक मशीनें लगा चुका है. नवकरण सिंह बग्गा इसके फाउंडर और CEO हैं. जानिए कैसे 3 करोड़ रुपये से शुरू हुई कंपनी रोज 3 लाख लीटर पानी बनाती है और अब इसका लक्ष्य है 100 करोड़ रुपये रेवेन्यू हासिल करना.
हाइलाइट्स
AKVO रोज हवा से करीब 3 लाख लीटर पानी बनाता है.
कंपनी ने ₹3 करोड़ से शुरुआत की और कोई बाहरी फंडिंग नहीं ली.
Water on Want मॉडल में ग्राहक इस्तेमाल के हिसाब से भुगतान करते हैं.
AKVO का लक्ष्य तीन साल में ₹100 करोड़ रेवेन्यू हासिल करना है.
भारत में पानी की समस्या को आमतौर पर सूखते तालाबों, गिरते भूजल स्तर और कमजोर पाइपलाइन व्यवस्था से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन क्या हो अगर पीने का पानी जमीन के नीचे या किसी नदी में नहीं, बल्कि हमारे आसपास की हवा में मौजूद नमी से बनाया जा सके?
कोलकाता से शुरू हुई कंपनी AKVO Atmospheric इसी कॉन्सेप्ट पर काम करती है. कंपनी ऐसी मशीनें बनाती है जो हवा में मौजूद नमी को पानी में बदलती हैं. AKVO ने अब तक 15 देशों में 2,000 से अधिक मशीनें लगाई हैं, जो हर रोज करीब 3 लाख लीटर पानी तैयार करती हैं.
यह कहानी किसी बड़ी लैब या भारी फंडिंग से शुरू नहीं हुई. कंपनी के फाउंडर और CEO नवकरण सिंह बग्गा (Navkaran Singh Bagga) कारोबारी परिवार से आते हैं. होटल और स्टील कारोबार में काम करने के बाद उन्होंने 2016 के आसपास नए कारोबार की दिशा तलाशनी शुरू की. पानी की समस्या पर ध्यान गया और 2018 में AKVO की शुरुआत हुई.
YourStory ने हाल ही में नवकरण सिंह बग्गा से बात की. उन्होंने कंपनी की शुरुआत, हवा से पानी बनाने की तकनीक, कारोबार के मॉडल और आगे की योजनाओं के बारे में बताया.
फैमिली बिजनेस से अलग राह
नवकरण सिंह बग्गा का परिवार तीन पीढ़ियों से कोलकाता में है. उनके परदादा 1938 में कलकत्ता आए थे. उनका फैमिली बिजनेस मर्चेंट एक्सपोर्ट से जुड़ा रहा है और इंजीनियरिंग सामान, साइकिल और स्टील का अंतरराष्ट्रीय व्यापार करता रहा है.
उन्होंने ब्रिटेन की University of Kent at Canterbury से फाइनेंस की पढ़ाई की. 2007 में उन्होंने अपने पिता के होटल कारोबार को संभाला और 2009 में स्टील कारोबार में आए.
2016 में एक रणनीतिक निवेशक के आने के बाद वह रोजमर्रा के कारोबार से हटकर बोर्ड की भूमिका में आ गए. इसी दौरान उन्होंने अगले कारोबार के बारे में सोचना शुरू किया.
उनका ध्यान सस्टेनेबिलिटी की तरफ गया. ऊर्जा, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और बैटरी पर बढ़ती चर्चा के बीच उन्हें लगा कि पानी पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जा रहा है.
नवकरण कहते हैं, “मैंने कारोबार किताबों से नहीं, बल्कि चीजें चलाकर सीखा. जब मुझे रोजमर्रा के काम से थोड़ा वक्त मिला तो मैं सोचने लगा कि अगले कुछ दशक किस दिशा में जाएंगे. पानी की तरफ बहुत कम ध्यान था.”

नवकरण सिंह बग्गा ने 2018 में AKVO की शुरुआत की थी.
हवा से पानी बनाने की टेक्नोलॉजी
हवा से पानी बनाना कोई नई टेक्नोलॉजी नहीं है. इसका सिद्धांत उसी तरह है जैसे ठंडे गिलास की बाहरी सतह पर पानी की बूंदें जमा होती हैं. हवा में मौजूद नमी ठंडी सतह के संपर्क में आकर पानी में बदल जाती है.
AKVO की मशीनें हवा को अंदर खींचती हैं और उसे एक कॉइल के ऊपर उसके ड्यू पॉइंट (dew point) से नीचे तक ठंडा करती हैं. इससे नमी पानी में बदल जाती है. इसके बाद पानी को फिल्टर किया जाता है और जरूरी मिनरल वापस मिलाए जाते हैं.
बता दें कि ड्यू पॉइंट वह तापमान है, जिस तक हवा को ठंडा करने पर उसमें मौजूद जलवाष्प पानी की बूंदों में बदलने लगती है.
बग्गा के मुताबिक, कंपनी के लिए चुनौती टेक्नोलॉजी का आविष्कार करना नहीं, बल्कि उसे अलग-अलग जलवायु में भरोसेमंद तरीके से चलाना था.
शुरुआती मशीनों को खाड़ी क्षेत्र में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं मिला. इसके बाद कंपनी ने करीब छह महीने डिजाइन में बदलाव करने में लगाए. इसी प्रक्रिया के दौरान उसने गर्म और कम नमी वाले वातावरण के लिए अपने सिस्टम को तैयार किया.
कंपनी ने मशीनों की निगरानी के लिए Nimbus OS नाम का IoT (Internet of things) प्लेटफॉर्म भी डैवलप किया है. बग्गा के मुताबिक, मशीनों की इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग भारत में होती है.
15 देशों में 2000+ मशीनें, रोज बनता है 3 लाख लीटर पानी
AKVO दो तरह के बिजनेस मॉडल पर काम करती है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कंपनी मुख्य रूप से मशीनों की बिक्री और इंस्टॉलेशन करती है.
भारत में इसका Water on Want मॉडल अलग है. इसमें ग्राहक को मशीन खरीदने के लिए बड़ा शुरुआती निवेश नहीं करना पड़ता. कंपनी मशीन लगाती है और उसके संचालन की जिम्मेदारी लेती है. ग्राहक इस्तेमाल किए गए पानी की मात्रा के आधार पर भुगतान करता है.
यह मॉडल फैक्ट्रियों, रिफाइनरी, कॉरपोरेट कैंपस, सरकारी संस्थानों और दूरदराज के औद्योगिक इलाकों जैसे स्थानों के लिए तैयार किया गया है, जहां लगातार पीने के पानी की जरूरत होती है.
कंपनी के मुताबिक, उसकी मशीनें अब तक 15 से ज्यादा देशों में 2,000 से अधिक जगहों पर लगाई जा चुकी हैं. इनकी कुल क्षमता करीब 3 लाख लीटर पानी प्रतिदिन बनाने की है. कंपनी 150, 300 और 500 लीटर प्रतिदिन क्षमता वाले सिस्टम के अलावा सोलर थर्मल टेक्नोलॉजी पर आधारित Helios भी बनाती है.

AKVO ने अब तक 15 देशों में 2,000 से अधिक मशीनें लगाई हैं, जो हर रोज करीब 3 लाख लीटर पानी तैयार करती हैं.
असफलताओं से बदली रणनीति
AKVO के शुरुआती सालों में सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि कंपनी के पास समाधान था, लेकिन हर जगह उसके लिए स्पष्ट ग्राहक नहीं था.
2018 में बग्गा पानी के संकट से जूझ रहे केपटाउन गए. वहां Day Zero की चर्चा थी और उन्हें लगा कि पानी बनाने वाली मशीनों की मांग होगी. लेकिन बिक्री नहीं हुई. कुछ ही हफ्तों बाद बारिश शुरू हो गई.
इस अनुभव ने कंपनी को यह समझने में मदद की कि किसी समस्या का सुर्खियों में होना और उसका लगातार कारोबार का अवसर होना अलग बातें हैं.
इसके बाद कंपनी ने ऐसे ग्राहकों पर ध्यान देना शुरू किया जिन्हें रोजाना पानी की जरूरत होती है, न कि केवल उन इलाकों पर जहां अचानक पानी का संकट पैदा हुआ हो.
खाड़ी देशों में मशीनों के शुरुआती प्रदर्शन ने भी कंपनी को अपनी टेक्नोलॉजी में बदलाव करने के लिए मजबूर किया.
बिना बाहरी फंडिंग के खड़ा किया बिजनेस
AKVO को बग्गा फैमिली के Trishan Group के तहत बूटस्ट्रैप किया गया है. यानि कंपनी ने अभी तक किसी भी बाहरी निवेशक से फंडिंग नहीं जुटाई है. शुरुआती निवेश करीब 3 करोड़ रुपये था. कंपनी के मुताबिक, उसकी मौजूदा सालाना इनकम करीब 10 करोड़ रुपये है.
बग्गा के लिए बाहरी फंडिंग न लेना कंपनी की रणनीति का हिस्सा रहा है. उनका मानना है कि किसी बिजनेस के लिए केवल फंडिंग जुटाना ही सफलता का पैमाना नहीं होना चाहिए.
वह कहते हैं, “Valuation के बजाय value पर ध्यान दें. यह देखना ज्यादा जरूरी है कि आपका समाधान जमीन पर चल रहा है या नहीं और लोग उसके लिए भुगतान कर रहे हैं या नहीं.”

AKVO Atmospheric की टीम
चुनौतियां और भविष्य की योजनाएं
बग्गा मानते हैं कि Atmospheric Water Generation (AWG) पानी की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है. इससे खेती के लिए बड़े पैमाने पर पानी उपलब्ध कराना संभव नहीं है. लेकिन उन जगहों पर यह एक विकल्प हो सकता है जहां साफ पीने का पानी पहुंचाना मुश्किल है.
ऐसे औद्योगिक या दूरदराज के इलाकों में, जहां भूजल दूषित है या पाइपलाइन और टैंकर पर निर्भरता मुश्किल है, स्थानीय स्तर पर पानी तैयार करने का मॉडल उपयोगी हो सकता है.
अब कंपनी GCC (Global Capability Center) बाजार में विस्तार और भारत में Water on Want मॉडल को बढ़ाने पर ध्यान दे रही है. उसका लक्ष्य रोजाना पानी उत्पादन को करीब 3 लाख लीटर से बढ़ाकर 10 लाख लीटर करना और अगले तीन साल में 100 करोड़ रुपये का रेवेन्यू हासिल करना है.
AKVO के लिए आगे की असली चुनौती टेक्नोलॉजी से ज्यादा उसकी अर्थव्यवस्था और उपयोगिता की होगी. हवा से पानी बनाने का सिद्धांत पुराना है. सवाल यह है कि इसे कितनी जगहों पर लगातार, भरोसेमंद और आर्थिक रूप से व्यवहार्य तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है.
कोलकाता हेडक्वार्टर और चेन्नई में मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशन वाली AKVO की अब तक की यात्रा इसी सवाल का एक कारोबारी प्रयोग है.



