धीरा चालिहा हज़ारिका: 60 साल बाद फिर उड़ी ‘असम की उड़नपरी’
असम की पहली महिला पायलट धीरा चालिहा हज़ारिका ने 85 साल की उम्र में फिर टाइगर मॉथ में उड़ान भरी. जानें उनके साहस, संघर्ष और जीवन की प्रेरक कहानी, जिसने महिलाओं और युवा पायलटों के लिए मिसाल कायम की.
कुछ लोग उम्र के आगे झुकते नहीं, बल्कि उसे अपनी उड़ान का हिस्सा बना लेते हैं. असम की पहली महिला पायलट (first female pilot from Assam) धीरा चालिहा हज़ारिका (Dhira Chaliha Hazarika) ऐसी ही एक मिसाल हैं. 85 साल की उम्र में उन्होंने फिर से आसमान में उड़ान भरी और दुनिया को दिखा दिया कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती.
हाल ही में महिंद्रा एंड महिंद्रा के चेयरपर्सन आनंद महिंद्रा (Anand Mahindra) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर धीरा की उड़ान का वीडियो साझा किया और लिखा, “यह हैं धीरा चालिहा हजारिका, असम की पहली महिला पायलट. साल 1961 में, जब वह सिर्फ 21 साल की थीं, उन्होंने पायलट का "A लाइसेंस" हासिल किया था. और सितंबर 2025 में, 85 साल की उम्र में, उन्होंने फिर से आसमान में उड़ान भरी — इंग्लैंड के खूबसूरत देहात के ऊपर एक ऐतिहासिक टाइगर मॉथ बाइप्लेन उड़ाते हुए.”
उन्होंने आगे लिखा, “सच कहूँ तो, मैं उनकी यह प्रेरक कहानी नहीं जानता था, और शायद बहुत से लोग भी नहीं जानते होंगे. वह भारत के एविएशन हॉल ऑफ फेम में जगह पाने की हकदार हैं. लेकिन 85 साल की उम्र में दोबारा उड़ान भरकर उन्होंने साहस, दृढ़ता और जीवन के जज़्बे की मिसाल कामय की है, और दुनिया के हॉल ऑफ फेम में भी उनकी जगह बनती है.”
बचपन से ही था आसमान से रिश्ता
धीरा का जन्म 1940 में असम के जोरहाट में हुआ था. बचपन से ही उन्हें आसमान से खास लगाव था. वह अक्सर पेड़ों पर चढ़कर युद्ध के समय बर्मा फ्रंट की ओर उड़ते विमानों को निहारा करती थीं. तभी उनके मन में उड़ान का सपना जन्मा.
उनके पिता कमलेश्वर चालिहा खुले विचारों वाले व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी बेटी को समाज की सीमाओं में बाँधने के बजाय उसके सपनों को उड़ान दी.
कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1959 में धीरा ने गुवाहाटी के हैंडिक कॉलेज से स्नातक किया. Diversity Assam की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उसी दौरान उनके पिता ने अखबार में एक विज्ञापन देखा. इस विज्ञापन में असम फ्लाइंग क्लब की ओर से छह पूरी तरह से प्रायोजित (फुली-फंडेड) पायलट ट्रेनिंग स्कॉलरशिप की घोषणा की गई थी.
धीरा ने बिना देर किए आवेदन किया और चयनित भी हो गईं. यहीं से शुरू हुआ उनका असली सफर.
21 साल की उम्र में मिला पायलट का लाइसेंस
धीरा ने शुरुआत में टाइगर मॉथ और पुष्पक जैसे छोटे दो-सीटर विमान उड़ाना सीखा. हर हफ्ते दो बार प्रशिक्षण होता था. उस समय कोई आधुनिक नेविगेशन सिस्टम या रेडियो संपर्क नहीं होता था. सब कुछ साहस, धैर्य और सटीकता पर निर्भर था.
अप्रैल 1961 में, सिर्फ 21 साल की उम्र में धीरा चालिहा ने पायलट का “A लाइसेंस” हासिल किया और असम की पहली महिला पायलट बनीं. उनका पहला सोलो फ्लाइट बोरझार से तेजपुर तक था.
जब वह गुवाहाटी, तेजपुर, जोरहाट और शिलांग के बीच उड़ान भरती थीं, तो आज़ारा के लोग उनके विमान के उतरने का इंतजार करते थे.
उन्होंने अपने निडर स्वभाव का सबूत तब दिया, जब उन्होंने निर्माणाधीन साराइघाट ब्रिज के खंभों के पास से साहसपूर्वक विमान उड़ाया.
सपनों से बड़ा परिवार
धीरा एक कमर्शियल पायलट बनना चाहती थीं, लेकिन विवाह के बाद उनकी प्राथमिकताएँ बदल गईं. उन्होंने कमल हज़ारिका से शादी की और लंदन चली गईं. परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों ने उन्हें करियर से दूर कर दिया.
फिर भी, उन्होंने अपने उड़ान के जुनून को कभी नहीं छोड़ा. वह लंदन के फ्लाइंग क्लबों में जातीं, पायलटों से बातें करतीं और अपनी कहानियाँ साझा करतीं.
60 साल बाद फिर उड़ान
समय बीत गया, लेकिन आसमान के लिए उनका प्यार कभी कम नहीं हुआ. और आखिरकार, 60 साल बाद, उन्होंने फिर से उड़ान भरी. इस बार इंग्लैंड के ऊपर, टाइगर मॉथ विमान में, 85 साल की उम्र में.
उन्होंने बर्कशायर और रिवर थेम्स के ऊपर उड़ान भरी. उनके साथ कॉकपिट में थे कैप्टन जॉन टोवेल.
यह वही ऐतिहासिक विमान था जो हॉलीवुड फिल्मों जैसे Thunderbirds और The King’s Speech में इस्तेमाल हुआ था.
अब लिख रहीं हैं अपनी कहानी
धीरा चालिहा हजारिका की कहानी सिर्फ उड़ान भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी सामाजिक उपलब्धि का प्रतीक है. उन्होंने लंबे समय से चली आ रही लिंग आधारित धारणाओं को तोड़ा और उम्र को लेकर बने मिथकों को चुनौती दी. अपने संकल्प, साहस और गरिमा के जरिए उन्होंने सबको प्रेरित किया.
2017 में उन्हें PRAG Prerona Award से सम्मानित किया गया, और वह असम और पूर्वोत्तर भारत के इतिहास में एक जीवित लेजेंड के रूप में जानी जाती हैं.
धीरा अब अपनी आत्मकथा (autobiography) लिख रही हैं. इसमें वे अपने अनुभव, संघर्ष और उड़ानों की कहानियाँ साझा करेंगी. उनकी कहानी सिर्फ एक महिला पायलट की नहीं, बल्कि उस जज़्बे की कहानी है जो उम्र या हालात से नहीं रुकता. 21 साल की उम्र में उन्होंने आसमान जीता, और 85 साल की उम्र में दुनिया का दिल.
वह आज भी इस बात की प्रतीक हैं कि अगर मन में कुछ करने का जज्बा है, तो उम्र महज एक संख्या है.
(feature image credits: (Left) East India Story, (Right) DD Assam)



