बस्ती के वीरेंद्र कुमार मिश्रा ने शुरू किया दोना पत्तल मैटेरियल का कारोबार
बस्ती के वीरेंद्र कुमार मिश्रा की प्रेरक कहानी, जिन्होंने दोना पत्तल के कच्चे माल का यूनिट खड़ा किया. यूपी सरकार की CM YUVA Yojana से मिले लोन ने मशीनें, उत्पादन और रोज़गार बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. पढ़िए गांव से आत्मनिर्भर बनने का सफर.
बस्ती ज़िले के बरवानिया गांव के रहने वाले वीरेंद्र कुमार मिश्रा ने ज़िंदगी में कई तरह के काम किए. कभी इलेक्ट्रिकल वायरिंग की. कभी वेल्डिंग सीखी. कभी राजमिस्त्री बने. तो कभी दूध सप्लाई और छोटे मोटे मार्केटिंग के काम किए. इन सभी कामों ने उन्हें एक बात सिखाई. गांव और कस्बों के बाज़ार कैसे चलते हैं और असली खर्च कहां बढ़ जाता है.
साल 2019 में पहली बार उन्होंने दोना के कच्चे माल के कारोबार के बारे में सोचा. शुरुआत छोटी थी. अनुभव अच्छा रहा, लेकिन काम सीमित था. फिर कोरोना का लॉकडाउन आया. काम ठप हो गया. लॉकडाउन के बाद जब हालात संभले, तो वीरेंद्र ने इस काम को दोबारा शुरू करने का मन बनाया. इस बार पूरी तैयारी और साफ सोच के साथ.
उस समय इलाके के ज़्यादातर दोना बनाने वाले लोग कच्चा माल लगभग पचास किलोमीटर दूर से लाते थे. छोटी मात्रा में खरीद और बार बार ढुलाई से लागत बढ़ जाती थी. यही वह समस्या थी, जिसे वीरेंद्र ने हल करने का फैसला किया.
आज उनका यूनिट दोना और पत्तल बनाने के लिए काग़ज़ आधारित कच्चा माल सप्लाई करता है. यह काग़ज़ थर्माकोल से महंगा जरूर है, लेकिन साफ सफाई और पर्यावरण को लेकर लोगों की सोच बदल रही है. नियम भी सख्त हो रहे हैं. वीरेंद्र को लगा कि आने वाला समय इसी का है.
लेकिन एक दिक्कत हमेशा बनी रही. मशीनों की कमी. जब तक कच्चे माल को बड़ी मात्रा में प्रोसेस करने की क्षमता नहीं होगी, तब तक लागत कम नहीं होगी. उनका साफ कहना है कि अगर थोक में खरीद नहीं कर पाएंगे, तो दाम कभी नीचे नहीं आएंगे. समस्या जानकारी की नहीं थी. समस्या पैसे और मशीनों की थी.
वीरेंद्र ने अपनी जमा पूंजी से छोटा सा वर्कस्पेस बनाया. बिजली का कनेक्शन निजी तौर पर कराया. शुरुआत एक सेकंड हैंड दोना मशीन से की. जैसे जैसे ऑर्डर बढ़े, कच्चे माल पर दबाव बढ़ने लगा. बाहर से मंगवाना महंगा पड़ रहा था. तब उन्होंने तय किया कि अब प्रोसेसिंग खुद ही करेंगे.
दिसंबर में बस्ती में हुए एक उद्योग कार्यक्रम के दौरान उन्हें यूपी सरकार की ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान’ योजना (CM YUVA Yojana) के बारे में पता चला. उन्होंने ज़िला उद्योग केंद्र और अपने बैंक के ज़रिए आवेदन किया. कुछ ही हफ्तों में लोन मंजूर हो गया.
इस मदद से उन्होंने नई मशीनें खरीदीं. पावर बैकअप लगाया. काम चलाने के लिए वर्किंग कैपिटल (पूंजी) मिला. इसका असर तुरंत दिखा. अब कच्चा माल अपने यहां प्रोसेस होने लगा. थोक में खरीद संभव हुई. लागत स्थिर हो गई.
आज आसपास के कई छोटे दोना मशीन मालिक कच्चा माल लेने के लिए वीरेंद्र के यहां आते हैं. उन्हें अब दूर शहरों में भटकना नहीं पड़ता.
इस यूनिट से अब सिर्फ वीरेंद्र का घर नहीं चलता. बाहर के लोगों को भी काम मिलता है. परिवार के सदस्य रोज़मर्रा के काम में साथ देते हैं. उनके बच्चे तकनीकी शिक्षा ले रहे हैं, ताकि आगे चलकर इस काम को और बेहतर बना सकें.
वीरेंद्र की दिनचर्या बहुत साधारण है. सुबह ऑर्डर लेते हैं. दिन में उत्पादन चलता है. शाम तक माल पहुंचा दिया जाता है.
वे कहते हैं कि व्यापार में मुश्किलें हमेशा रहेंगी. लेकिन अगर आदमी लगातार डटा रहे, तो रास्ता अपने आप निकल आता है.
वीरेंद्र के लिए मशीनें सिर्फ लोहे के औज़ार नहीं थीं. वे उस कड़ी की तरह थीं, जो मेहनत को टिकाऊ कारोबार में बदल देती है. आज उनकी कहानी यह बताती है कि सही योजना, धैर्य और सरकारी सहयोग से छोटे शहरों में भी बड़ा बदलाव संभव है.
Edited by रविकांत पारीक



