Bhagat Singh birth anniversary: एक बम धमाके से अंग्रेजों को हिला देने वाले भगत सिंह क्यों कहते थे “पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते..."

By Prerna Bhardwaj
September 28, 2022, Updated on : Wed Sep 28 2022 12:03:21 GMT+0000
Bhagat Singh birth anniversary:  एक बम धमाके से अंग्रेजों को हिला देने वाले भगत सिंह क्यों कहते थे “पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते..."
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एक ख़ूबसूरत नौजवान होने के अलावा भगत सिंह के समाज को देखने का अंदाज़ और उनके लिखने की ताक़त लोगों को उनकी तरफ आकर्षित किया. उनकी इन्हीं बातों ने बड़ी संख्या में इतिहासकारों को भी अपनी तरफ खींचा. यही वजह है कि अपनी शहादत के नौ दशक बाद भी भगत सिंह ही एक अकेला शख़्स मिलता है जो हर किसी के दिल को जीत सके.


साइमन कमीशन का विरोध करने के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में बुरी तरह घायल होने वाले राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय की नवंबर 1928 में मृत्यु के बाद भगत सिंह और उनके साथियों ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की हत्या करके लिया. दिसंबर 1928 में सांडर्स की हत्या के बाद पंजाब में अंग्रेज़ी राज का दमन-चक्र तेज़ी से चला. पंजाब के निर्दोष नौजवानों को पुलिस द्वारा गिरफ़्तार कर बुरी तरह से प्रताड़ित किया जाने लगा. इन युवाओं में नौजवान भारत सभा के सदस्य भी शामिल थे, जिसकी स्थापना भगत सिंह और उनके साथियों ने की थी.


8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त के साथ, केंद्रीय असेंबली में दो बम फेंके. बम फेंकने का मकसद किसी को मारना नहीं था बल्कि ब्रिटिश हुकूमत द्वारा लागू किये गए दो बिलों, पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल, का विरोध करना था. इसके साथ ही, बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त वहां से भागे नहीं बल्कि उन्होंने अपनी गिरफ्तारी खुद दी थी.  वहां से नहीं भागने की पीछे उनका मकसद अपनी बात लोगों तक पहुँचाने की थी. उस दौर में  ब्रिटिश दमन इतना तेज़ था की किसी भी इन्क़लाबी किताब, विचार लोगों तक पहुंचाना लगभग नामुमकिन था. भगत सिंह और उनके साथियों ने अपनी गिरफ्तारी देने के बाद कोर्ट में अपने बयान दिए और उम्मीद की कि इस बयान को अखबारों में छपा जायेगा और शायद इसी बहाने लोगों तक इनके विचार और सोच लोगों तक पहुंच सकेंगे.  


जैसा प्लान था, बम फेंकने के बाद उन्होंने गिरफ़्तारी दी और उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चला. 6 जून, 1929 को दिल्ली के सेशन जज लियोनॉर्ड मिडिल्टन की अदालत में दिया गया भगत सिंह का ऐतिहासिक बयान पढ़ कर हम समझ सकते हैं कि इस नौजवान के विचार कितने सुलझे हुए थे.


बता दें इसी अपील में ही उनका यह प्रसिद्द वक्तव्य था: “पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और यही चीज थी, जिसे हम प्रकट करना चाहते थे.”


कोर्ट में अपनी बात रखने से पहले उन्होंने कोर्ट को बम फेंके के उनकी नीयत और उद्देश्य देखने और समझाने की अपील की, न की बम फेंकने को हिंसा करने के रूप में देखे जाने की. उन्होंने कहा, “माई लॉर्ड, हम न वकील हैं, न अंग्रेजी विशेषज्ञ और न हमारे पास डिगरियां हैं. इसलिए हमसे शानदार भाषणों की आशा न की जाए. हमारी प्रार्थना है कि हमारे बयान की भाषा संबंधी त्रुटियों पर ध्यान न देते हुए, उसके वास्तवकि अर्थ को समझने का प्रयत्न किया जाए. दूसरे तमाम मुद्दों को अपने वकीलों पर छोड़ते हुए मैं स्वयं एक मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करूंगा. यह मुद्दा इस मुकदमे में बहुत महत्वपूर्ण है. मुद्दा यह है कि हमारी नीयत क्या थी और हम किस हद तक अपराधी हैं.”


अपने डिफेंस में उन्होंने कहा कि हमारे ऊपर बम फेंक कर लोगों को मारने की कोशिश करने के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं. अपनी सफ़ाई में कोर्ट के सामने उन्होंनेदो सवाल रखे और उस पर सोचने को कहा. वे सवाल थे: (1) क्या वास्तव में असेंबली में बम फेंके गए थे, यदि हां तो क्यों? (2) नीचे की अदालत में हमारे ऊपर जो आरोप लगाए गए हैं, वे सही हैं या गलत?


कोर्ट को इन दोनों प्रश्नों पर विचार करने की अपील करते हुए कानूनी कारवाई में उद्देश्य और मंशा के खासा महत्त्व पर ध्यान दिलाते हुए भगत सिंह ने कोर्ट में कहा, “यदि उद्देश्य को पूरी तरह भुला दिया जाए, तो किसी के साथ न्याय नहीं हो सकता, क्योंकि उद्देश्य को नजरों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति भी साधारण हत्यारे नजर आएंगे. सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर, जालसाज दिखाई देंगे और न्यायाधीशों पर भी कत्ल करने का अभियोग लगेगा.”


कारवाई पर आते हुए भगत सिंह ने आगे कहा कि हम बम फेंकने से इनकार नहीं कर रहे हैं. सरकारी वैज्ञानिकों का बयान है कि बम बड़े ज़ोरदार थे और उनसे अधिक नुकसान नहीं हुआ. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमने बम को वैज्ञानिक ढंग से ऐसा ही बनाया था ताकि इसके फूटने से जान-माल की क्षति नहीं हो.  किसी की हत्या का हमारा कोई इरादा नहीं था और उन बमों ने उतना ही काम किया जितने के लिए उन्हें तैयार किया गया था.


आगे उन्होंने कहा, “अगर उन बमों में ज़ोरदार पोटैशिमय क्लोरेट और पिक्रिक एसिड भरा होता, जैसा कि सरकारी विशेषज्ञ ने कहा है, तो इन बमों ने उस लकड़ी के घेरे को तोड़कर कुछ गज की दूरी पर खड़े लोगों तक को उड़ा दिया होता. और यदि उनमें कोई और भी शक्तिशाली विस्फोटक भरा जाता तो निश्चय ही वे असेंबली के अधिकांश सदस्यों को उड़ा देने में समर्थ होते.” भगत सिंह ने कहा बम बेंचों तथा डेस्कों के बीच की खाली जगह में ही गिरे थे. उनके फूटने की जगह से दो फीट पर बैठे हुए लोगों को या तो बिल्कुल ही चोंटें नहीं आईं या मामूली मात्र चोट आई. आगे उन्होंने कहा, “यदि हम चाहते तो उन्हें सरकारी कक्ष में फेंक सकते थे जो विशिष्ट व्यक्तियों से खचाखच भरा था. या फिर उस सर जॉन साइमन को अपना निशाना बना सकते थे जो उस समय असेंबली की अध्यक्ष दीर्घा में बैठा था. लेकिन हमने ऐसा नहीं किया क्योंकि किसी को मारना हमारा मकसद नहीं था.”


कोर्ट की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भगत सिंह से पूछा के क्रांति से उन लोगों का क्या मतलब है? इसी सवाल के जवाब में भगत सिंह ने यह प्रसिद्द वक्तव्य दिया था: “क्रांति के लिए ख़ूनी लड़ाइयां अनिवार्य नहीं है और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है. वह बम और पिस्तौल का संप्रदाय नहीं है. क्रांति से हमारा अभिप्राय है अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन.”


मुकदमे के अंत में भगत सिंह दोषी करार देते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई. बाद में, लाहौर कोंस्पिरेसी केस में भी दोषी करार देते हुए उन्हें, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 को फांसी की सज़ा दी गई.


फाँसी पर लटकाए जाने से 3 दिन पूर्व- 20 मार्च, 1931 को- भगतसिंह तथा उनके सहयोगियों राजगुरु और सुखदेव ने पंजाब के गवर्नर से मांग की थी की उन्हें युद्धबन्दी माना जाए तथा फांसी पर लटकाए जाने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाए.


ऐसे थे भगत सिंह! नौजवान, लिखने पढ़ने में माहिर, विचारों की स्पष्टता, जवान उम्र में शहीद और वह भी कुछ इस तरह का घटनाचक्र रच कर कि देश में हर किसी के हृदय को झकझोर दिया.


भगत सिंह जिन मूल्यों के लिए लड़े और अंततः शहादत का वरण किये इसे समझने के लिए हमें उनके वैचारिक दृष्टि और राजनीतिक समझ को समझाना होगा. भगत सिंह को भगत सिंह उनकी वैचारिक समझदारी ने बनाया. उनके लिए आज़ादी का ध्येय था- समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष राज्य. उनके सपनों का भारत वैसा था " जहां आदमी के द्वारा आदमी के शोषण का अंत हो जाय."


जैसा कि हर हीरो के साथ होता है कि देश हर साल उन्हें रस्मी श्रद्धांजलि दे, उनकी वीरता, साहस और देशभक्ति की तारीफ कर, उनके आदर्शों और सपनों पर विचार नहीं करता है. हम वैसा न करें और उनके सपनों का भारत बना उन्हें सच्ची श्रधांजलि दें.