कचरे से कमाई! बिहार के दो भाइयों ने खड़ा किया करोड़ों का स्टार्टअप Minus Degre
बिहार के नवादा के रहने वाले दो भाईयों राहुल कुमार और विकाश कुमार ने Minus Degre की शुरुआत की. प्लास्टिक कचरे को प्रीमियम मटेरियल में बदलने वाली यह बूटस्ट्रैप्ड कंपनी आज Tata EV, Adidas, Westside और नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स बना रही है.
बचपन में घरों में प्लास्टिक की थैलियों का दोबारा इस्तेमाल आम बात थी. पुरानी चीजों को फेंकने के बजाय नया रूप दिया जाता था. उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही आदत एक दिन करोड़ों रुपये के कारोबार की नींव बनेगी.
बिहार के नवादा के रहने वाले दो भाई राहुल कुमार और विकाश कुमार ने इसी सोच को बिजनेस में बदल दिया. उन्होंने प्लास्टिक कचरे को सिर्फ रिसाइकिल नहीं किया, बल्कि उसे डिजाइन और इंजीनियरिंग की मदद से प्रीमियम मटेरियल में बदलने का प्रयास किया. आज उनकी कंपनी Minus Degre के प्रोडक्ट बड़े कॉरपोरेट्स, एयरपोर्ट और प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंच चुके हैं. लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे वर्षों का संघर्ष, लगातार प्रयोग और हार न मानने का जज्बा है.
भारत में प्लास्टिक कचरे की चुनौती भी लगातार बढ़ रही है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की Annual Report on Implementation of Plastic Waste Management Rules, 2022-23 के अनुसार, देश में हर साल करीब 41 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. वहीं, UNEP (United Nations Environment Programme) की Global Plastics Outlook रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में पैदा होने वाले प्लास्टिक का केवल लगभग 9 प्रतिशत ही प्रभावी रूप से रिसाइकिल हो पाता है. ऐसे में प्लास्टिक कचरे को उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदलने वाले मॉडल सर्कुलर इकोनॉमी (Circular Economy) के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं.
बचपन की सीख बनी कारोबार की बुनियाद
राहुल और विकाश का बचपन बिहार के नवादा के एक मध्यमवर्गीय परिवार में बीता. उनके पिता मेडिकल प्रैक्टिशनर हैं, जबकि मां गृहिणी हैं. परिवार ने दोनों भाइयों को पढ़ाई के साथ स्वतंत्र सोचने और प्रयोग करने की आजादी दी.
आगे चलकर विकाश ने IIT दिल्ली से मैकेनिकल इंजीनियरिंग और मास्टर्स की पढ़ाई की. वहीं राहुल ने NIFT दिल्ली से टेक्सटाइल डिजाइन में ग्रेजुएशन पूरी की. एक के पास इंजीनियरिंग की समझ थी और दूसरे के पास डिजाइन की. यही जोड़ी आगे चलकर Minus Degre की सबसे बड़ी ताकत बना.
IIT दिल्ली में पढ़ाई के दौरान दोनों भाइयों ने प्लास्टिक रिसाइक्लिंग पर प्रयोग शुरू किए. कैंपस में ही एक छोटी सैंपलिंग मशीन तैयार की गई. प्रयोगों के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि फेंका हुआ प्लास्टिक भी मजबूत, आकर्षक और उपयोगी मटेरियल में बदला जा सकता है. यहीं से की शुरुआत की नींव पड़ी.
YourStory से बात करते हुए राहुल कुमार बताते हैं, “हमने बचपन में अपने दादा-दादी को हर चीज का दोबारा इस्तेमाल करते देखा. तब उसे सस्टेनेबिलिटी नहीं कहा जाता था, लेकिन वह जीवन का हिस्सा थी. जब हमने प्लास्टिक पर काम शुरू किया तो महसूस हुआ कि समस्या प्लास्टिक नहीं, बल्कि उसके प्रति हमारी सोच है. अगर कचरे को सुंदर और उपयोगी बनाया जाए तो लोग उसे फेंकने के बजाय उसकी कीमत समझेंगे.”

Minus Degre की टीम
कचरे को बनाया प्रीमियम मटेरियल
Minus Degre की शुरुआत केवल प्लास्टिक रिसाइक्लिंग करने के लिए नहीं हुई. दोनों भाइयों का उद्देश्य था कि कचरे की आर्थिक कीमत बढ़ाई जाए. उनका मानना है कि जब तक किसी अपशिष्ट की आर्थिक उपयोगिता नहीं बढ़ेगी, तब तक उसके संग्रह और रिसाइक्लिंग की मजबूत व्यवस्था भी विकसित नहीं हो सकेगी.
कंपनी प्लास्टिक कचरे को रिसाइक्लर्स और वेस्ट कलेक्शन नेटवर्क से जुटाती है. इसके बाद उसे अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया जाता है. सफाई और प्रोसेसिंग के बाद उसी प्लास्टिक से प्रीमियम पैनल, फर्नीचर, कॉरपोरेट गिफ्ट, ट्रॉफी, मेडल और इंटीरियर प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं.
कंपनी का दावा है कि उसके सभी प्रोडक्ट 100 प्रतिशत रिसाइकिल्ड प्लास्टिक से बनते हैं और उन्हें दोबारा भी रिसाइकिल किया जा सकता है.
राहुल कहते हैं, “हम खुद को सिर्फ रिसाइक्लिंग कंपनी नहीं मानते. हमारी कोशिश एक मटेरियल इनोवेशन कंपनी बनने की है. हम डिजाइन और इंजीनियरिंग की मदद से ऐसे मटेरियल तैयार करना चाहते हैं जो उद्योगों में नए संसाधनों की जगह ले सकें. हमारी सोच केवल प्लास्टिक तक सीमित नहीं है. आगे हम टेक्सटाइल और कृषि अपशिष्ट से भी नए मटेरियल विकसित करना चाहते हैं.”
30 हजार रुपये से हुई शुरुआत
कंपनी की शुरुआत बेहद सीमित संसाधनों के साथ हुई. शुरुआती सेटअप में करीब 10 हजार रुपये का ओवन और लगभग 15 से 20 हजार रुपये की लागत से तैयार की गई मशीन का इस्तेमाल किया गया.
दोनों भाइयों ने बिना किसी बाहरी निवेश के कारोबार शुरू किया. शुरुआती कमाई को लगातार बिजनेस में दोबारा निवेश किया गया.
सबसे पहले छोटे ज्वेलरी प्रोडक्ट बनाए गए. इसके बाद कॉरपोरेट गिफ्टिंग में कदम रखा गया. धीरे-धीरे कंपनी फर्नीचर, इको पैनल और बड़े इंटीरियर प्रोजेक्ट्स तक पहुंच गई.
वर्ष 2020 में कंपनी की आय महज 5 हजार रुपये थी. अगले कुछ वर्षों में यह बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 1.2 करोड़ रुपये से अधिक हो गई.
Minus Degre अब तक पूरी तरह बूटस्ट्रैप्ड कंपनी है. यानि कंपनी ने किसी बाहरी निवेशक से फंडिंग नहीं जुटाई और ग्राहकों से मिलने वाली आय के आधार पर कारोबार को आगे बढ़ाया.
राहुल बताते हैं, “पिछले पांच वर्षों में कई बार ऐसा लगा कि शायद अब आगे बढ़ना मुश्किल है. बैंक से ऋण मिलना आसान नहीं था. कई योजनाओं में आवेदन किया, लेकिन जमीनी स्तर पर चुनौतियां बहुत थीं. कई बार प्रोजेक्ट रुके, भुगतान अटका और भविष्य अनिश्चित दिखा. लेकिन हर बार हमने यही सोचा कि अगर समस्या इतनी बड़ी है तो समाधान भी उतना ही जरूरी है.”

Minus Degre द्वारा तैयार किए गए कुछ प्रोडक्ट्स
Adidas, Tata EV, राष्ट्रपति भवन और नोएडा एयरपोर्ट के लिए बनाए प्रोडक्ट
कंपनी के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों की सोच बदलना थी. आम धारणा यह थी कि रिसाइकिल्ड प्रोडक्ट सस्ते होने चाहिए. जबकि हाई क्वालिटी वाले रिसाइकिल्ड मटेरियल तैयार करने में रिसर्च, डिजाइन, प्रोसेसिंग और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग पर अधिक लागत आती है.
धीरे-धीरे कंपनी को बड़े ब्रांड्स के साथ काम करने का अवसर मिला.
- Shark Shopfit के माध्यम से Adidas स्टोर्स में इको पैनल लगाए गए.
- Westside के कई स्टोर्स में Minus Degre के रिसाइकिल्ड मटेरियल का उपयोग किया गया.
- Tata EV के आठ एक्सपीरियंस स्टोर्स के लिए रिसाइकिल्ड पैनल और फर्नीचर तैयार किए गए.
- Rare Planet के साथ मिलकर राष्ट्रपति भवन के लिए सस्टेनेबल प्रोडक्ट तैयार किए गए.
हाल ही में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के Arrival टर्मिनल के लिए 90 से अधिक सीटिंग मॉड्यूल बनाए.
राहुल कहते हैं, “जब बड़े ब्रांड हमारे मटेरियल पर भरोसा करते हैं तो यह सिर्फ हमारी सफलता नहीं होती. यह इस बात का संकेत है कि रिसाइकिल्ड मटेरियल भी क्वालिटी और डिजाइन के मामले में किसी नए मटेरियल से कम नहीं है. हमारा उद्देश्य हमेशा यह रहा है कि लोग पहले प्रोडक्ट की खूबसूरती देखें और बाद में जानें कि वह कचरे से बना है.”
अब लक्ष्य सिर्फ प्लास्टिक नहीं, नए मटेरियल तैयार करना
राहुल और विकाश आने वाले वर्षों में Minus Degre को भारत की अग्रणी मटेरियल इनोवेशन कंपनी बनाना चाहते हैं.
कंपनी अपनी प्रोडक्शन क्षमता बढ़ा रही है. बड़े आकार के पैनल और नए फिनिश वाले प्रोडक्ट विकसित किए जा रहे हैं. साथ ही टेक्सटाइल वेस्ट और कृषि अपशिष्ट से नए मटेरियल विकसित करने पर भी रिसर्च जारी है.
दोनों भाइयों का लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी मौजूदगी मजबूत करना है. उनका मानना है कि भारत डिजाइन, इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में दुनिया को टिकाऊ विकल्प उपलब्ध करा सकता है.
राहुल कहते हैं, “मैं खुद को ऐसा व्यक्ति नहीं मानता जो दूसरों को सलाह दे सके, क्योंकि हम आज भी सीख रहे हैं. लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि सस्टेनेबिलिटी का कारोबार धैर्य मांगता है. इसमें जल्दी सफलता नहीं मिलती. अगर आपका भरोसा अपने उद्देश्य पर बना रहता है तो कठिन समय भी निकल जाता है. आखिर में वही लोग बदलाव लाते हैं जो मुश्किल समस्याओं पर लंबे समय तक काम करने का साहस रखते हैं.”

एक वर्कशॉप के दौरान बच्चों को प्लास्टिक रिसाइक्लिंग के बारे में समझाते हुए Minus Degre की टीम
सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में बढ़ते कदम
भारत सरकार भी अब सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है. नीति आयोग की सर्कुलर इकोनॉमी से जुड़ी रिपोर्ट्स में कहा गया है कि संसाधनों के दोबारा उपयोग, रिसाइक्लिंग और अपसाइक्लिंग को बढ़ावा देकर न केवल कचरा कम किया जा सकता है, बल्कि नए रोजगार और आर्थिक अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं. वहीं Plastic Waste Management Rules (PWMR) और Extended Producer Responsibility (EPR) जैसी नीतियां भी उद्योगों को अधिक टिकाऊ मॉडल अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं.
ऐसे माहौल में Minus Degre जैसी कंपनियां केवल प्रोडक्ट नहीं बना रहीं, बल्कि यह दिखा रही हैं कि डिजाइन, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के जरिए अपशिष्ट को भी मूल्यवान संसाधन में बदला जा सकता है.
Minus Degre की कहानी सिर्फ एक स्टार्टअप की सफलता नहीं है. यह उस सोच की कहानी है जो कचरे में भी अवसर देखती है.
बिहार के एक छोटे शहर से निकले दो भाइयों ने यह साबित करने की कोशिश की है कि डिजाइन और टेक्नोलॉजी मिलकर अपशिष्ट को नई पहचान दे सकते हैं. उनका सफर अभी जारी है. मंजिल भले अभी दूर हो, लेकिन उनकी दिशा स्पष्ट है. उनका विश्वास है कि यदि कचरे को सही नजरिए से देखा जाए, तो वही भविष्य का सबसे मूल्यवान संसाधन बन सकता है.



