Ezeepay: 8800 रु से शुरू हुआ सफर कैसे बना 8.5 लाख रिटेलर का नेटवर्क? जानिए
बिहार की बाढ़ में सब कुछ खोने के बाद भी शम्स तबरेज ने हार नहीं मानी. 8,800 रुपये से शुरुआत कर उन्होंने Ezeepay बनाया, जो आज 8.5 लाख रिटेलर्स और 1 लाख गांवों तक डिजिटल वित्तीय सेवाएं पहुंचा रहा है. यह कहानी संघर्ष, जज्बे और ग्रामीण भारत को जोड़ने की है.
साल 2017. बिहार में बाढ़ अपने चरम पर थी. पानी सिर्फ खेतों और सड़कों तक सीमित नहीं था, वह सपनों को भी बहा ले जा रहा था. अररिया के शम्स तबरेज के लिए यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी. यह उनके कई सालों की मेहनत का अंत जैसा था. जनरेटर डूब गए. बैटरियां खराब हो गईं. मशीनें बेकार हो गईं. उनका पूरा सेटअप, जो उन्होंने धीरे-धीरे खड़ा किया था, एक ही झटके में खत्म हो गया.
उस रात शायद पहली बार उन्हें लगा होगा कि अब आगे क्या.
लेकिन हर कहानी में एक मोड़ होता है. और शम्स की कहानी का मोड़ अभी बाकी था.
एक बेटे का वादा
इस कहानी की शुरुआत इससे भी पहले होती है.
अररिया के एक साधारण परिवार में जन्मे शम्स बचपन से ही अपने पिता को संघर्ष करते हुए देखते थे. उनके पिता एक छोटा बिजनेस चलाते थे और घर की जिम्मेदारियां किसी तरह संभाली जाती थीं।
जब शम्स पटना में कॉलेज कर रहे थे, तब जिंदगी ने एक और परीक्षा ली. उनकी मां गंभीर रूप से बीमार हो गईं. इलाज का खर्च बढ़ता गया. घर की हालत खराब होती गई. एक दिन ऐसा भी आया जब उनके पिता को मजबूरी में उनकी मां के गहने बेचने पड़े.
यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं था. यह परिवार की गरिमा से जुड़ा पल था. 18 साल के शम्स ने उस दिन कोई बड़ा भाषण नहीं दिया. उन्होंने सिर्फ एक चुप वादा किया. वह इतना कमाएंगे कि अपनी मां के गहने वापस दिला सकें. यही वादा उनके जीवन का मकसद बन गया.
₹8,800 से शुरू हुआ सफर
हर बड़ी कहानी की शुरुआत छोटी होती है. शम्स के लिए वह शुरुआत ₹8,800 से हुई. स्थानीय इलाहाबाद बैंक की शाखा को अपने कंप्यूटर सिस्टम चलाने के लिए बिजली की जरूरत थी.
शम्स ने मौका देखा. उन्होंने अपने माता-पिता से ₹8,800 उधार लिए. जनरेटर ठीक किया और बैंक को रोज ₹130 में बिजली देना शुरू किया. यह कोई बड़ा बिजनेस नहीं था. लेकिन यह एक सोच थी.
धीरे-धीरे उन्होंने बैटरी चार्जिंग का काम भी शुरू किया. रोज ₹400 से ₹500 तक कमाने लगे. यह कमाई छोटी थी, लेकिन आत्मविश्वास बड़ा था. उन्होंने पढ़ाई भी जारी रखी. और धीरे-धीरे उन्होंने अपने परिवार की हालत बदलनी शुरू कर दी.
एक दिन उन्होंने अपना वादा भी पूरा किया. अपनी मां के गहने वापस दिलाए. लेकिन शम्स अब सिर्फ अपने लिए नहीं सोच रहे थे.
‘शम्स मोबाइल वाले’ से बैंकिंग तक
साल 2005 में उन्होंने मोबाइल का कारोबार शुरू किया. यह वह दौर था जब मोबाइल फोन का चलन तेजी से बढ़ रहा था, लेकिन छोटे शहरों में अभी भी यह एक नई चीज थी.
शम्स ने इस मौके को पकड़ा. धीरे-धीरे इलाके में उनकी पहचान बनने लगी. लोग उन्हें “शम्स मोबाइल वाले” के नाम से जानने लगे. यहीं से उन्होंने एक और चीज सीखी. भारत का असली बाजार शहरों में नहीं, बल्कि छोटे कस्बों और गांवों में है. और वहां सबसे ज्यादा जरूरत है भरोसे की.
साल 2012 में भारत में वित्तीय समावेशन पर जोर बढ़ा. सरकार चाहती थी कि हर व्यक्ति बैंकिंग सिस्टम से जुड़े.
शम्स ने इस बदलाव को सिर्फ खबर की तरह नहीं देखा. उन्होंने इसे अवसर की तरह देखा. उन्होंने इलाहाबाद बैंक के साथ मिलकर एक ग्राहक सेवा केंद्र खोला. यह केंद्र छोटा था, लेकिन उसका असर बड़ा था. यहां उन लोगों के खाते खुलने लगे, जिन्होंने कभी बैंक नहीं देखा था. लोग पैसे भेजते थे. पैसे निकालते थे. छोटी-छोटी सेवाएं लेते थे. धीरे-धीरे यह केंद्र एक भरोसे का स्थान बन गया.
शम्स को समझ आने लगा कि असली बदलाव वहीं होता है, जहां जरूरत सबसे ज्यादा होती है.

सांकेतिक चित्र (image: AI generated)
2017 की बाढ़… जब सब कुछ खत्म हो गया
फिर आया वह साल, जिसने सब कुछ बदल दिया. बिहार की बाढ़ ने उनका पूरा कारोबार खत्म कर दिया. उनके पास जो कुछ था, वह सब पानी में बह गया. इससे उन्हें सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं हुआ बल्कि आत्मविश्वास भी हिल गया. कर्ज बढ़ गया. भविष्य धुंधला हो गया.
ऐसे समय में लोग अक्सर हार मान लेते हैं. लेकिन शम्स की कहानी अलग थी. उनकी पत्नी ने उन्हें याद दिलाया कि उन्होंने हर बार मुश्किलों में रास्ता बनाया है. यही बात उन्हें फिर से खड़ा होने की ताकत दे गई.
Ezeepay की शुरुआत
बाढ़ के बाद का समय सिर्फ नुकसान का नहीं था. वह बदलाव का समय भी था. देश में डिजिटल पेमेंट तेजी से बढ़ रहा था. लोग मोबाइल से पैसे भेज रहे थे. नए प्लेटफॉर्म उभर रहे थे. शम्स ने यह देखा और एक बड़ा फैसला लिया.
15 अगस्त 2018 को उन्होंने Ezeepay की शुरुआत की. सिर्फ 3-4 लोगों की टीम थी. संसाधन सीमित थे. लेकिन सोच बहुत साफ थी. उन्होंने तय किया कि वह ऐप नहीं बनाएंगे. वह लोगों को जोड़ेंगे. छोटे दुकानदार, किराना स्टोर, गांव के व्यापारी — यही उनके पार्टनर होंगे.
शम्स खुद गांव-गांव गए. दुकानदारों से मिले. उन्हें समझाया कि वे भी डिजिटल सेवा दे सकते हैं. यह टेक्नोलॉजी से ज्यादा भरोसे का खेल था.
कोरोना काल… जब मॉडल बना जरूरत
साल 2020 में जब देश कोरोना महामारी (कोविड-19) के चलते लॉकडाउन में था, तब असली परीक्षा शुरू हुई. सरकार ने महिलाओं के जनधन खातों में पैसे भेजे. लेकिन गांवों में लोग बैंक नहीं जा सकते थे.
यहीं Ezeepay का नेटवर्क काम आया. रिटेलर्स घर-घर जाकर लोगों को पैसे निकालने में मदद करने लगे. लोगों को लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ी. यह सिर्फ सुविधा नहीं थी. यह राहत थी. यहीं साबित हुआ कि यह मॉडल सिर्फ बिजनेस नहीं, बल्कि एक जरूरी सेवा है.
आज Ezeepay सिर्फ एक कंपनी नहीं है. यह एक नेटवर्क है — 1 लाख से ज्यादा गांव; 12,000 से ज्यादा पिन कोड और 8.5 लाख से ज्यादा रिटेलर्स इससे जुड़े हुए हैं.
ये रिटेलर्स अब अपने इलाके में छोटे बैंक की तरह काम करते हैं. लोग यहां पैसे निकालते हैं, बिल भरते हैं, रिचार्ज करते हैं और पैसे भेजते हैं. इससे छोटे दुकानदारों को कमाई का नया स्रोत मिला है. और गांवों में रहने वाले लोगों को आसान बैंकिंग सुविधा.
शम्स तबरेज की कहानी सिर्फ एक सफल बिजनेस की कहानी नहीं है. यह उस सोच की कहानी है, जो हर मुश्किल में अवसर देखती है. उन्होंने दिखाया कि भारत की डिजिटल क्रांति सिर्फ बड़े शहरों में नहीं, बल्कि छोटे गांवों में पूरी होती है. और जब वहां के लोग इस बदलाव का हिस्सा बनते हैं, तभी असली विकास होता है.
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि हालात चाहे कितने भी खराब क्यों न हों, अगर नजर सही हो, तो हर समस्या एक नए रास्ते की शुरुआत बन सकती है.



