संजय दहरिया: कैंसर से जंग, चेहरे पर लकवा, फेल हुए, फिर UPSC में हासिल की AIR 946
छत्तीसगढ़ के संजय दहरिया की प्रेरक कहानी. 23 साल की उम्र में कैंसर हुआ, 4 सर्जरी और 28 रेडिएशन के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी. कैंसर से 14 साल की लंबी लड़ाई के बाद उन्होंने UPSC परीक्षा पास की और ऑल इंडिया रैंक 946 हासिल की. यह कहानी संघर्ष, धैर्य और सपनों को पूरा करने की मिसाल है.
जीवन में कभी कभी ऐसे पल आते हैं जब सब कुछ खत्म होता हुआ लगता है. सपने टूट जाते हैं और भविष्य धुंधला दिखाई देता है. लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सबसे मुश्किल परिस्थितियों में भी हार नहीं मानते. छत्तीसगढ़ के संजय दहरिया (Sanjay Dahariya) की कहानी ऐसी ही प्रेरणा देती है.
संजय दहरिया ने न केवल कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लंबी लड़ाई लड़ी बल्कि उसी संघर्ष के बीच अपने IAS बनने के सपने को भी जिंदा रखा. करीब चौदह साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने UPSC परीक्षा पास कर ली और ऑल इंडिया रैंक (AIR) 946 हासिल की.
संजय दहरिया छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बेलटुकरी गांव के रहने वाले हैं. उनका परिवार खेती से जुड़ा हुआ है. साधारण परिवार में पले बढ़े संजय पढ़ाई में हमेशा तेज थे.
स्कूल के दिनों में वह हमेशा टॉप छात्रों में शामिल रहते थे. पांचवीं तक उन्होंने अपने गांव में पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय की प्रवेश परीक्षा पास की और रायपुर के स्कूल में दाखिला लिया.
वहीं से उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और बारहवीं कक्षा में अपने स्कूल में तीसरा स्थान हासिल किया. इसी दौरान उनके जीवन में एक घटना ने उन्हें बहुत प्रभावित किया.
एक बार स्कूल में एक आईएएस अफसर आए थे जो स्कूल के चेयरमैन थे. उनकी बातों और व्यक्तित्व ने संजय पर गहरा असर छोड़ा. उसी दिन उन्होंने मन में ठान लिया कि वह भी एक दिन आईएएस अधिकारी बनेंगे.
साल 2011 में संजय ग्रेजुएशन कर रहे थे. उसी दौरान उन्हें कोलकाता के एक बैंक में सहायक के पद पर नौकरी मिल गई. यह नौकरी उन्हें बारहवीं के प्रमाणपत्र के आधार पर मिली थी.
नौकरी के साथ उन्होंने UPSC की तैयारी भी शुरू कर दी. लेकिन इसी समय उनकी जिंदगी ने एक अप्रत्याशित मोड़ लिया.
उनके चेहरे के दाईं तरफ कान के पास एक सूजन दिखाई देने लगी. डॉक्टरों ने जांच की और बायोप्सी के बाद पता चला कि उन्हें पैरोटिड कैंसर है जो लार ग्रंथि में होता है.
यह खबर उनके लिए बहुत बड़ा झटका थी.
संजय कहते हैं कि उन्हें कई महीनों तक विश्वास ही नहीं हुआ कि उन्हें कैंसर है. उन्होंने कई बार जांच करवाई क्योंकि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह बीमारी कैसे हो गई. उनकी जीवनशैली साफ सुथरी थी. कोई नशा नहीं था और परिवार में भी किसी को यह बीमारी नहीं थी.
साल 2011 से 2018 के बीच संजय का इलाज मुंबई के टाटा कैंसर अस्पताल में चला. इस दौरान उनकी चार बड़ी सर्जरी हुईं. 2012 में पहली सर्जरी हुई. लेकिन कैंसर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. इसके बाद 2013 में दूसरी बड़ी सर्जरी की गई जिसमें उनकी पूरी लार ग्रंथि निकालनी पड़ी.
इस ऑपरेशन से उनकी जान तो बच गई लेकिन इसके कारण उनके चेहरे के दाईं तरफ लकवा हो गया. बाद में दो और ऑपरेशन किए गए ताकि कैंसर के दुष्प्रभावों को रोका जा सके. इन वर्षों में उन्हें 28 बार रेडिएशन भी करवाना पड़ा. इलाज के दौरान खर्च भी बहुत ज्यादा हुआ. लगभग 15 लाख रुपये इलाज में लग गए.
इलाज के दौरान भी संजय ने हार नहीं मानी. वह लगातार नौकरी करते रहे ताकि इलाज का खर्च उठा सकें. उन्होंने इस दौरान चार अलग अलग बैंक नौकरियां बदलीं. आखिर में वह बैंक मैनेजर के पद तक पहुंचे.
लेकिन लगातार इलाज और मानसिक तनाव के कारण उन्होंने 2019 में नौकरी छोड़ दी. इसके बाद 2022 तक उन्होंने खुद को मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत बनाने में समय दिया.
कैंसर के इलाज के कारण उनके चेहरे की नसें निकालनी पड़ीं. आज भी उनके चेहरे के दाएं हिस्से में कोई हलचल नहीं है. उन्हें दाईं आंख बंद करने में परेशानी होती है इसलिए सोते समय आंख ढकनी पड़ती है. आंख सूखने से बचाने के लिए उन्हें नियमित रूप से आई ड्रॉप का उपयोग करना पड़ता है.
उनकी सुनने की क्षमता भी प्रभावित हुई है और कान में हमेशा आवाज महसूस होती है. इसके बावजूद उन्होंने अपने सपने को नहीं छोड़ा.

2023 में संजय दहरिया ने पहली बार UPSC परीक्षा दी. पहले प्रयास में वे फेल हो गए. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 2025 में दूसरे प्रयास में उन्होंने UPSC परीक्षा पास कर ली और ऑल इंडिया रैंक 946 हासिल की.
संजय बताते हैं कि वह भावनात्मक रूप से काफी संवेदनशील हैं और उन्हें खुद को संभालने में समय लगा. इस दौरान उन्होंने मोटिवेशनल स्पीकर बी.के. शिवानी को सुनना शुरू किया. धीरे धीरे उनका आत्मविश्वास वापस आने लगा.
टाटा कैंसर अस्पताल में उन्हें कुछ ऐसे लोग मिले जिन्होंने उन्हें बहुत प्रेरित किया. वे कैंसर मरीजों की मदद करते थे और रहने की सुविधा भी देते थे.
जब संजय ने उन्हें पैसे देने की कोशिश की तो उन्होंने मना कर दिया और कहा कि जब वह आईएएस बन जाएं तो जरूरतमंद लोगों की मदद करें.
यह बात उनके दिल में घर कर गई.
साल 2022 में उनकी सेहत स्थिर हो गई. इसके बाद उन्होंने पूरी ताकत के साथ UPSC की तैयारी शुरू की. चार साल तक उन्होंने रोज सुबह आठ बजे से रात दस बजे तक पढ़ाई की. बीच में केवल तीन बार एक घंटे का ब्रेक लेते थे. पूरे साल में वह मुश्किल से 15 दिन ही छुट्टी लेते थे. उन्होंने केवल समाजशास्त्र विषय के लिए कोचिंग ली. बाकी विषयों की तैयारी उन्होंने खुद की.
2023 में उन्होंने पहला प्रयास दिया लेकिन सफल नहीं हो सके. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.
2025 में दूसरे प्रयास में उन्होंने UPSC परीक्षा पास कर ली और ऑल इंडिया रैंक 946 हासिल की.
आज संजय दहरिया की कहानी हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है. उन्होंने दिखा दिया कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सपने पूरे किए जा सकते हैं.
कैंसर की लंबी लड़ाई, शारीरिक तकलीफें और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा. उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि असली ताकत शरीर में नहीं बल्कि मन में होती है. जब मन मजबूत हो तो जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौतियां भी छोटी लगने लगती हैं.




