Taruwar Agro: बिहार के तीन दोस्तों ने केले के कचरे से खड़ा किया 2.5 करोड़ रु रेवेन्यू वाला बिजनेस
बिहार के हाजीपुर से तीन दोस्तों ने केले के बेकार तने से फाइबर बनाकर Taruwar Agro शुरू किया. कंपनी फाइल फोल्डर, योगा मैट, बास्केट समेत कई प्रोडक्ट बनाती है. वित्त वर्ष 26 में कंपनी ने करीब 2.5 करोड़ रेवेन्यू दर्ज किया और किसानों व स्थानीय लोगों के लिए कमाई और रोजगार के अवसर बनाए.
बिहार के खेतों में केले का पेड़ फल देने के बाद अक्सर बेकार समझ लिया जाता है. किसान इसे काटकर खेत से बाहर कर देते हैं. फल मिलने के बाद इस पेड़ का उनके लिए कोई खास इस्तेमाल नहीं रह जाता.
लेकिन तीन दोस्तों ने इसी बेकार समझे जाने वाले पेड़ में बिजनेस का मौका देखा.
जगत कल्याण, सत्यम कुमार और नितीश कुमार वर्मा ने नौकरी के रास्ते को छोड़कर केले के तने से फाइबर बनाने का काम शुरू किया. उनका मकसद सिर्फ एक नया प्रोडक्ट बनाना नहीं था. वे बिहार में उपलब्ध स्थानीय संसाधनों को कारोबार से जोड़ना चाहते थे.
इसी सोच से Taruwar Agro Industries की शुरुआत हुई.
आज कंपनी केले के फाइबर से फाइल फोल्डर, योगा मैट, बास्केट और पूजा के आसन जैसे कई प्रोडक्ट्स बना रही है. केले के बचे हिस्से से वर्मी कंपोस्ट और प्लांट न्यूट्रिशन लिक्विड भी तैयार किए जाते हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का रेवेन्यू करीब 2.5 करोड़ रुपये रहा.
इस मॉडल से किसानों को केले का फल देने के बाद बचे पेड़ से अतिरिक्त आमदनी मिल रही है. वहीं, प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग के स्तर पर स्थानीय लोगों के लिए रोजगार भी पैदा हो रहा है.
Taruwar Agro की कहानी सिर्फ एक स्टार्टअप की कहानी नहीं है. यह उस सोच की कहानी है जिसमें बिहार के स्थानीय संसाधनों को नए नजरिए से देखकर कारोबार के रास्ते तलाशे जा रहे हैं.
दोस्ती से बिजनेस पार्टनरशिप तक
तीनों फाउंडर्स की मुलाकात MBA की पढ़ाई के दौरान हुई थी. अलग-अलग जगहों से आए इन युवाओं की दोस्ती धीरे-धीरे बिजनेस पार्टनरशिप में बदल गई.
जगत कल्याण खगड़िया के रहने वाले हैं. वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं. उनके दादा किसान थे, जबकि नाना कृषि विभाग में सरकारी अधिकारी थे. पिता बैंक में काम करते थे और मां गृहिणी हैं.
पिता की नौकरी के कारण परिवार बाद में पटना आ गया. जगत ने स्कूल की पढ़ाई के बाद बेंगलुरु से इंजीनियरिंग की और फिर MBA किया. MBA के दौरान उन्होंने पर्यावरण और IoT (Internet of things) से जुड़ी कंपनियों में इंटर्नशिप की. पढ़ाई पूरी होने के बाद उनके पास तंजानिया, दुबई और IDFC First Bank से नौकरी के अवसर आए.
लेकिन उन्होंने ये मौके छोड़ दिए. जगत और उनके दोस्तों ने बिहार में ही कुछ शुरू करने का फैसला किया.
YourStory से बात करते हुए Taruwar Agro के CEO जगत कल्याण बताते हैं, “हम तीनों के सामने नौकरी के कई विकल्प थे. विदेश जाने का मौका भी था. लेकिन कोविड-19 महामारी के दौरान हमने सोचा कि अगर मेहनत करनी ही है तो अपने लिए क्यों न करें. अपने राज्य और अपने लोगों के लिए क्यों न कुछ किया जाए. हम चाहते थे कि बिहार से ऐसा काम सामने आए, जिसे देश और दुनिया के स्तर पर पहचाना जाए.”
इसके बाद तीनों ने बिहार में उपलब्ध संसाधनों और उनसे जुड़े कारोबारी अवसरों पर रिसर्च शुरू की.
नितीश कुमार वर्मा बिहार शरीफ से हैं. उनकी शुरुआती पढ़ाई बोकारो से हुई. इसके बाद उन्होंने बिहार शरीफ में कॉमर्स की पढ़ाई की. नालंदा से B.Com Hons करने के बाद उन्होंने MBA किया. इसके बाद नितीश ने S&P और Infosys जैसी कंपनियों में काम किया.
वहीं, सत्यम कुमार दरभंगा के हयाघाट से आते हैं. उनके परिवार में दो बहनें और एक भाई हैं. उनकी मां सरकारी अधिकारी हैं और पिता किसान हैं. सत्यम ने अपनी स्कूली पढ़ाई दरभंगा से पूरी की. इसके बाद Economics में ग्रेजुएशन और फिर MBA किया. MBA के दौरान उन्हें पर्यावरण से जुड़ी कंपनियों में इंटर्नशिप और काम करने का अनुभव मिला. आगे चलकर यही अनुभव उनकी ऑन्त्रप्रेन्योरशिप जर्नी में काम आया.

Taruwar Agro के CEO जगत कल्याण
जब केले के बेकार तने में दिखा बिजनेस
तीनों दोस्तों ने कई महीनों तक अलग-अलग सेक्टर्स में रिसर्च की. इसी दौरान उनका ध्यान केले की खेती पर गया.
बिहार देश के प्रमुख केला उत्पादक राज्यों में शामिल है. राज्य के कई हिस्सों में किसान बड़े पैमाने पर केले की खेती करते हैं. लेकिन फल देने के बाद केले का तना खेत में रह जाता है. आमतौर पर किसान इसे काटकर हटा देते हैं. तीनों को यहीं एक कारोबारी अवसर दिखाई दिया.
जिस चीज को किसान बेकार समझकर खेत से निकाल रहा था, वही Taruwar Agro के लिए कच्चा माल बन सकती थी.
तीनों ने केले के तने से फाइबर निकालने की प्रक्रिया को समझना शुरू किया. इस दौरान तत्कालीन KVK Vaishali की प्रमुख और वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुनीता कुशवाहा और उनकी टीम से भी उन्हें मदद मिली.
Taruwar Agro के डायरेक्टर सत्यम कुमार बताते हैं, “जब हमने केले के पेड़ पर रिसर्च शुरू की तो समझ आया कि इसमें काफी संभावनाएं हैं. फल लेने के बाद पेड़ किसान के लिए बोझ बन जाता है. हमने उसी पेड़ को कच्चे माल की तरह देखना शुरू किया.”
वह आगे बताते हैं, “हमारा मकसद केवल फाइबर बनाना नहीं था. हम ऐसा मॉडल बनाना चाहते थे जिसमें किसान को अतिरिक्त आमदनी मिले, स्थानीय लोगों को काम मिले और कृषि अवशेष का इस्तेमाल भी हो. इसी सोच से साल 2021 में Taruwar Agro की शुरुआत हुई.”
खेत से यूनिट तक, पूरा लोकल मॉडल
Taruwar Agro ने हाजीपुर में अपना काम शुरू किया. हाजीपुर पटना के करीब है और केले की खेती के लिए भी जाना जाता है. कंपनी किसानों से फल दे चुके केले के पेड़ खरीदती है. कई बार किसान खुद पेड़ यूनिट तक पहुंचाते हैं. इससे किसान का खेत भी साफ हो जाता है और पेड़ हटाने का खर्च भी बचता है. यानी जिस पेड़ को पहले खेत से हटाना किसान के लिए एक अतिरिक्त काम था, वही अब उसके लिए आमदनी का जरिया बन रहा है.
यही बात इस मॉडल की खासियत भी है. कच्चा माल स्थानीय है और उसकी शुरुआती प्रोसेसिंग भी स्थानीय स्तर पर होती है. इससे किसान से लेकर कामगार और मैन्युफैक्चरिंग तक एक छोटा-सा लोकल वैल्यू चेन तैयार होता है.
केले के एक पेड़ से बनते हैं कई प्रोडक्ट
कंपनी मशीनों की मदद से केले के तने से फाइबर निकालती है. इसके बाद फाइबर को अलग करके सुखाया जाता है. इस फाइबर का इस्तेमाल हैंडीक्राफ्ट, कपड़े, सैनिटरी पैड और कई दूसरे प्रोडक्ट्स में कच्चे माल के तौर पर किया जा सकता है.
Taruwar Agro खुद भी केले के फाइबर से फाइल फोल्डर, योगा मैट, बास्केट और पूजा के आसन जैसे प्रोडक्ट्स बना रही है. कंपनी फाइबर से वीगन लेदर और फाइबर मिश्रित कपड़ों पर भी काम कर रही है.
खास बात यह है कि फाइबर निकालने के बाद बचने वाला हिस्सा भी बेकार नहीं जाता. कंपनी इससे वर्मी कंपोस्ट तैयार करती है. केले से तैयार सैप लिक्विड का इस्तेमाल पौधों के लिए न्यूट्रिशन लिक्विड के तौर पर किया जाता है. कंपनी केले के कोर स्टेम से जूस और जेली जैसे प्रोडक्ट्स तैयार करने पर भी काम कर रही है. इसके अलावा केले से चिप्स, बनाना फ्लोर और बनाना स्टार्च बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रही है.
नितीश बताते हैं, “हम केले को केवल फाइबर के तौर पर नहीं देखते. हमारी कोशिश है कि पेड़ का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा उपयोग में आए.”
वह आगे बताते हैं, “फाइबर अलग होता है और उससे कई प्रोडक्ट बन सकते हैं. बचा हुआ पल्प वर्मी कंपोस्ट में जाता है. दूसरे हिस्सों से भी फूड और एग्रीकल्चर से जुड़े प्रोडक्ट्स बनाए जा सकते हैं. इस तरह एक पेड़ से कई तरह के प्रोडक्ट्स और कई तरह की कमाई के अवसर बनाए जा सकते हैं.”
अब Taruwar Agro केले से आगे भी अपने कारोबार की संभावनाएं तलाश रही है. कंपनी मखाना और हेल्दी स्नैकिंग से जुड़े प्रोडक्ट्स पर काम कर रही है. इसमें कच्चा मखाना और दस से ज्यादा फ्लेवर में रोस्टेड मखाना शामिल हैं. अखरोट प्रोसेसिंग और डाइटरी प्रोडक्ट्स भी कंपनी के नए क्षेत्रों में हैं.
इस विस्तार के पीछे भी वही सोच है. बिहार में उपलब्ध एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स को सिर्फ कच्चे माल के तौर पर बेचने के बजाय उनमें वैल्यू एडिशन किया जाए.
बिहार की पहचान लंबे समय से कृषि और उससे जुड़े उत्पादों से रही है. अब ऐसे कारोबार इस पहचान को एक नए तरीके से देख रहे हैं. कोशिश है कि खेत से निकलने वाला कच्चा माल सिर्फ मंडी तक न पहुंचे, बल्कि उससे तैयार प्रोडक्ट बनें और उनकी कीमत भी बढ़े.

Taruwar Agro के डायरेक्टर सत्यम कुमार
₹15 लाख से शुरुआत, अब ₹2.5 करोड़ का रेवेन्यू
Taruwar Agro की शुरुआत करीब 15 लाख रुपये की पूंजी से हुई. इसके अलावा लगभग 5 लाख रुपये की ऑपरेटिंग कैपिटल की जरूरत पड़ी. यह पैसा तीनों फाउंडर्स ने निजी बचत और परिवार की मदद से जुटाया. कंपनी ने अब तक किसी बाहरी निवेशक से फंडिंग नहीं जुटाई है.
लेकिन शुरुआत आसान नहीं थी. सबसे बड़ी चुनौती केले के फाइबर की प्रोसेसिंग और उसके इस्तेमाल को समझना था. किताबों और इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी सीमित थी. इसलिए संस्थापकों ने अलग-अलग जगहों पर जाकर इस प्रक्रिया को समझा और लगातार प्रयोग किए.
दूसरी चुनौती कच्चा माल जुटाने की थी. खेतों में केले के पेड़ तो उपलब्ध थे, लेकिन उन्हें यूनिट तक लाना आसान नहीं था. किसानों को यह समझाना भी जरूरी था कि फल देने के बाद खेत में बचा पेड़ उनके लिए अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन सकता है. इसके लिए कंपनी ने स्थानीय स्तर पर किसानों के बीच जागरूकता बढ़ाई और उनके साथ काम करना शुरू किया.
सत्यम कहते हैं, “हमारे सामने एक साथ कई चुनौतियां थीं. पेड़ उपलब्ध थे लेकिन उन्हें खेत से यूनिट तक लाना पड़ता था. किसानों को इसकी जानकारी देनी थी. इस काम के लिए स्थानीय लोगों को जोड़ा.”
इसके बाद स्किल्ड लेबर की चुनौती सामने आई. केले के फाइबर की प्रोसेसिंग के लिए प्रशिक्षित लोग आसानी से उपलब्ध नहीं थे. कंपनी ने खुद लोगों को ट्रेन किया. आज कंपनी की कुल वर्कफोर्स में से करीब 60 प्रतिशत महिलाएं हैं.
इस तरह कारोबार का असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहा. स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग से रोजगार के अवसर भी बनने लगे. वित्त वर्ष 2025-26 में Taruwar Agro का रेवेन्यू करीब 2.5 करोड़ रुपये रहा.
B2B से B2C तक पहुंचा कारोबार
प्रोडक्ट बनाना एक चुनौती थी, लेकिन उन्हें बाजार तक पहुंचाना दूसरी. शुरुआत में कंपनी ने संभावित खरीदारों को सैंपल भेजे. प्रोडक्ट की टेस्टिंग हुई और धीरे-धीरे ऑर्डर मिलने लगे. परिवहन की लागत कम करने के लिए कंपनी ने कई लॉजिस्टिक और कूरियर कंपनियों से बातचीत की. बाद में India Post और दूसरे पार्टनर्स के साथ भी व्यवस्था बनाई गई.
आज कंपनी B2B और B2C दोनों मॉडल पर काम करती है.
फाइबर और उससे जुड़े प्रोडक्ट्स दूसरी कंपनियों को बेचे जाते हैं. इन्हें सरकार भी खरीदती है. वहीं योगा मैट, बास्केट, कपड़े, वर्मी कंपोस्ट, न्यूट्रिशन लिक्विड और फूड प्रोडक्ट्स सीधे ग्राहकों तक पहुंचाए जाते हैं.
कंपनी अपनी ई-कॉमर्स वेबसाइट के अलावा Amazon, Flipkart और Meesho जैसे प्लेटफॉर्म पर भी बिक्री करती है.
फाउंडर्स के मुताबिक इस तरह के बिजनेस को खड़ा करने में 8 से 10 महीने लग सकते हैं. इसके बाद करीब एक से डेढ़ साल में कारोबार नो प्रॉफिट नो लॉस की स्थिति तक पहुंच सकता है. उनके अनुसार इसके बाद धीरे-धीरे मुनाफा बनना शुरू होता है.

Taruwar Agro की प्रोडक्ट रेंज
बिहार में ही अवसर तलाशने की कोशिश
अगले तीन वर्षों के लिए कंपनी का फोकस सस्टेनेबल फैशन और घरेलू बाजार में अपनी पहचान मजबूत करने पर है. फाइबर से नए प्रोडक्ट तैयार करने के साथ कंपनी बनाना वीगन लेदर, बनाना फ्लोर, स्टार्च और ज्यादा मात्रा में केले के फाइबर वाले कपड़ों पर काम करना चाहती है.
कंपनी हेल्थ और सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स के बाजार को भी देख रही है.
भारत के दूसरे हिस्सों में विस्तार के साथ विदेशों में भी बाजार तलाशा जा रहा है. कंपनी ने फ्रांस और फिलीपींस में अपने सैंपल भेजे हैं. आगे की बातचीत इन सैंपल्स के नतीजों पर निर्भर करेगी.
तीनों फाउंडर्स के लिए Taruwar Agro सिर्फ एक कंपनी नहीं है. यह बिहार में उपलब्ध संसाधनों को बिजनेस से जोड़ने की कोशिश है. तीनों का मानना है कि राज्य में कच्चे माल और मानव संसाधन की कमी नहीं है. जरूरत उन्हें नए नजरिए से देखने की है.
जगत कहते हैं, “बिहार में अवसरों की कमी नहीं है. यहां प्राकृतिक संसाधन हैं, मेहनत करने वाले लोग हैं और कई ऐसे प्रोडक्ट्स हैं जिनमें वैल्यू एडिशन किया जा सकता है. जरूरत है कि युवा इन अवसरों को पहचानें.”
वह आगे कहते हैं, “कारोबार शुरू करने के लिए हमेशा बहुत बड़े स्तर से शुरुआत जरूरी नहीं है. छोटे स्तर पर शुरुआत करके भी रोजगार और बाजार दोनों बनाए जा सकते हैं. अगर ज्यादा युवा बिहार में कारोबार शुरू करेंगे तो राज्य की कारोबारी पहचान भी मजबूत होगी.”
खेत से बाजार तक बिहार की बदलती तस्वीर
तीनों फाउंडर्स का सफर अभी भी शुरुआती दौर में है. लेकिन उनकी कहानी एक दिलचस्प बदलाव दिखाती है. बिहार के खेतों में पैदा होने वाला केला अब सिर्फ फल तक सीमित नहीं है.
फल निकलने के बाद बचा तना फाइबर का कच्चा माल बन रहा है. उसी फाइबर से फाइल फोल्डर, योगा मैट, बास्केट और दूसरे प्रोडक्ट तैयार हो रहे हैं. बचे हिस्से से वर्मी कंपोस्ट और प्लांट न्यूट्रिशन लिक्विड बनाया जा रहा है. आगे इसी कच्चे माल से खाद्य और सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स बनाने की कोशिश हो रही है.
यही वैल्यू एडिशन बिहार के लिए एक बड़ा कारोबारी अवसर बन सकता है.
राज्य में उपलब्ध कृषि संसाधनों को स्थानीय स्तर पर प्रोसेस करके अगर उन्हें नए बाजारों से जोड़ा जाए तो किसान, कामगार और उद्यमी तीनों इससे जुड़ सकते हैं.
Taruwar Agro की कहानी इसी संभावना की एक मिसाल है.
तीन दोस्तों ने एक ऐसे पेड़ में कारोबार देखा, जिसे खेत में अक्सर बेकार समझकर हटा दिया जाता था. हाजीपुर से शुरू हुआ यह सफर अब फाइबर, कृषि, खाद्य और सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स तक पहुंच चुका है.
अब बिहार ऐसे ही छोटे-छोटे प्रयोगों से अपनी खास पहचान बना रहा है. जहां खेत में बचा हुआ हिस्सा सिर्फ कचरा नहीं है, बल्कि किसी नए कारोबार, नई कमाई और नए रोजगार की शुरुआत भी हो सकता है.



