पटना की बस्तियों से कैंसर केयर और AI तक — गौतम गौरी की कहानी
कॉरपोरेट जॉब छोड़ पटना लौटे गौतम गौरी ने Diksha Foundation के जरिए बच्चों की शिक्षा से शुरुआत की. फिर कैंसर से उनकी मां का देहांत हो गया. जिसके बाद उन्होंने Suchitra Cancer Care Foundation शुरू किया. आज वह शिक्षा, कैंसर जागरूकता और AI के जरिए बिहार में जानकारी और अवसरों तक पहुंच आसान बना रहे हैं.
साल 2010 में कॉरपोरेट जॉब छोड़कर पटना लौटे गौतम गौरी कोई बड़ा बिजनेस प्लान लेकर नहीं आए थे. उनके मन में बस एक सवाल था: कम कमाई वाले परिवारों के बच्चों को पढ़ने और आगे बढ़ने के बेहतर मौके कैसे दिए जाएं?
इसी सवाल से Diksha Foundation की शुरुआत हुई.
आज करीब 16 साल बाद गौतम का काम शिक्षा से आगे बढ़कर कैंसर जागरूकता, हेल्थकेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तक पहुंच चुका है. इस सफर में उन्होंने अपनी मां सुचित्रा गौरी को कैंसर से खोया, उस अनुभव को सामाजिक पहल में बदला और अब टेक्नोलॉजी के जरिए सही जानकारी और मार्गदर्शन ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं.
गौतम की कहानी सिर्फ एक सामाजिक संस्था खड़ी करने की कहानी नहीं है. यह उस बिहार की कहानी भी है जहां लंबे समय तक काम करने वाले लोग स्थानीय स्तर पर बदलाव की नई संभावनाएं बना रहे हैं.
YourStory ने हाल ही में Diksha Foundation के फाउंडर और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर गौतम गौरी (Gautam Gauri) से बात की. वह Suchitra Cancer Care Foundation (SCCF) के को-फाउंडर भी हैं.
इस बातचीत में उन्होंने बिहार लौटने के अपने फैसले के बारे में बताया. उन्होंने Diksha Foundation के अब तक के सफर को भी साझा किया. गौतम ने अपनी मां की याद में शुरू किए गए Suchitra Cancer Care Foundation (SCCF) के बारे में भी बात की. इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में AI के इस्तेमाल को लेकर अपने अनुभव साझा किए.
कॉरपोरेट जॉब छोड़ पटना लौटे
गौतम ने 1999 से 2003 के बीच Birla Institute of Technology, Mesra से Computer Science में Bachelor of Engineering किया. इसके बाद 2005 से 2007 के बीच Institute of Management Technology (IMT), Ghaziabad से MBA किया.
पढ़ाई के बाद उन्होंने Cognizant में बिजनेस एनालिस्ट के तौर पर करियर शुरू किया. वह कंपनी के एनालिटिक्स डिविजन में गुरुग्राम से काम कर रहे थे. करियर आगे बढ़ रहा था, लेकिन 2010 के आसपास उन्हें लगा कि बिहार लौटकर कुछ करने का समय आ गया है.
उनके परिवार का समाज से जुड़ाव भी इस फैसले के पीछे एक वजह था. उनके पिता तिलक राज गौरी बिहार सरकार के वित्त विभाग में बजट से जुड़े रहे थे और एक दशक से ज्यादा समय तक Budget In charge रहे. उनकी मां सुचित्रा गौरी पटना के DAV स्कूल की प्रिंसिपल थीं.
गौतम के पिता को उनका नौकरी छोड़ना शुरुआत में आर्थिक रूप से जोखिम भरा लगा. लेकिन गौतम ने फैसला कर लिया था.
गौतम बताते हैं, “बिहार में उस समय उम्मीद का माहौल था. बहुत से लोग बाहर से वापस लौट रहे थे और मुझे लगा कि यह योगदान देने का सही समय है. मैं यह देखना चाहता था कि अपने शहर और अपने राज्य में रहकर कुछ ऐसा किया जा सकता है या नहीं, जिसका असर लोगों की जिंदगी पर पड़े.”

Synergy Sustainability Summit में गौतम गोरी ने Diksha Foundation के प्रभाव पर एक प्रजेंटेशन दिया. इसके बाद उन्हें सम्मानित किया गया.
बस्तियों से शुरू हुआ Diksha का सफर
Diksha Foundation की शुरुआत बेहद छोटे स्तर पर हुई. गौतम पटना के लालू नगर और जगदेव पथ के आसपास की बस्तियों में गए और परिवारों से पूछा कि क्या वे अपने बच्चों को एक नए लर्निंग सेंटर में भेजेंगे.
रेलवे लाइन के पास रहने वाले बच्चों के लिए सेंटर करीब दो किलोमीटर दूर था. इसके बावजूद दो-तीन दिनों में 30 से 40 बच्चे वहां पहुंच गए.
गौतम के लिए यह पहला संकेत था कि जरूरत सिर्फ स्कूल या किताबों की नहीं है. बच्चों को ऐसा माहौल भी चाहिए जहां उन्हें सुना और समझा जाए.
शुरुआत में कोई बड़ा संस्थागत अनुदान नहीं था. टीम ने दोस्तों और समर्थकों के लिए एक लाइव Google Sheet बनाई, जहां लोग अपनी क्षमता के अनुसार छोटी रकम देने का वादा करते थे और उसका हिसाब भी दर्ज होता था.
संगीता दीदी शुरुआत से उनके साथ जुड़ीं. वह आज भी संगठन के साथ हैं और समय के साथ कम्युनिटी टीचर और लीडर की भूमिका में आगे बढ़ी हैं.

अपनी मां सुचित्रा गौरी के साथ गौतम गौरी (काले रंग का शर्ट पहने हुए)
मां का मिला साथ, बदली 800 बच्चों की ज़िंदगी
Diksha Foundation का काम केवल बच्चों को पढ़ाने तक सीमित नहीं रहा. टीम ने शिक्षा को बच्चों की आवाज, आत्मविश्वास और क्षमताओं से जोड़ने की कोशिश की.
शुरुआत के करीब एक साल बाद गौतम की मां सुचित्रा भी Diksha से फुलटाइम वॉलंटियर के तौर पर जुड़ गईं. उन्होंने बच्चों के साथ सीधे काम किया और सेंटर के माहौल को ज्यादा मानवीय बनाने में अहम भूमिका निभाई.
गौतम कहते हैं कि उनकी मां के लिए शिक्षा का अर्थ सिर्फ किताब और परीक्षा नहीं था. बच्चों को अपनी बात कहने और सवाल पूछने की जगह मिलनी चाहिए.
2015 में, Diksha की शुरुआत के करीब पांच साल बाद, गौतम Commonwealth Scholarship पर University of Cambridge गए. 2015 से 2016 के बीच उन्होंने एजुकेशन में MPhil की डिग्री ली. उनका अध्ययन शिक्षा के उद्देश्यों और मूल्यों पर केंद्रित था.
कैम्ब्रिज में Howard Gardner की Multiple Intelligences Theory और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन (Amartya Sen) के Capability Approach जैसे विचारों ने Diksha में पहले से किए जा रहे प्रयोगों को सैद्धांतिक आधार देने में मदद की.
हालांकि, गौतम ने किसी दूसरे देश के शिक्षा मॉडल को बिहार में ज्यों का त्यों लागू करने के बजाय स्थानीय जरूरतों के हिसाब से काम को आगे बढ़ाया.
आज करीब 800 बच्चे और किशोरियां Diksha के शिक्षा कार्यक्रमों से जुड़े हैं. इनमें लगभग 500 बच्चे पटना, बिहटा और सरायरंजन के KHEL Learning Centres में हैं. वहीं Empowering Futures प्रोग्राम पटना की छह कम्युनिटीज में करीब 300 किशोरियों के साथ काम करता है.

लर्निंग सेंटर बना बच्चों का दूसरा घर
बिहार की गर्मियों में जब तापमान 40 डिग्री से ऊपर पहुंचता है, तब Diksha Foundation के लर्निंग सेंटर बच्चों के लिए सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं रहते. बच्चे दोपहर में सेंटर आते हैं और शाम करीब छह बजे तक पढ़ाई, खेल और बातचीत में समय बिताते हैं. कई बच्चों के माता-पिता निर्माण कार्य, मजदूरी या दूसरी नौकरियों में व्यस्त रहते हैं. ऐसे में सेंटर बच्चों के लिए सुरक्षित और सीखने वाला माहौल उपलब्ध कराते हैं.
Feeding India के सहयोग से सेंटर पर बच्चों को खाना भी उपलब्ध कराया जा रहा है.
गौतम के मुताबिक, समय के साथ इन सेंटर की भूमिका भी बदल गई है. पुराने बच्चे वापस आते हैं, माताएं कार्यक्रमों में हिस्सा लेती हैं और बच्चे पढ़ाई के अलावा अपनी बातें भी साझा करते हैं.
गौतम कहते हैं, “हम इसे अब सिर्फ after school programme नहीं मानते. यह community learning centre की तरह काम कर रहा है.”
मां की बीमारी ने दिखाई कैंसर केयर की राह
2017-18 के आसपास गौतम के पिता में डिमेंशिया (dementia) के शुरुआती लक्षण दिखाई देने लगे. उनकी मां सुचित्रा उनकी देखभाल कर रही थीं. इसी दौरान उनका वजन तेजी से कम होने लगा और उन्हें बार-बार बुखार आने लगा.
कई डॉक्टरों से सलाह लेने के बावजूद बीमारी की सही पहचान तुरंत नहीं हो सकी. बाद में पता चला कि उन्हें कैंसर है और तब तक बीमारी काफी बढ़ चुकी थी.
गौतम उन्हें इलाज के लिए मुंबई के Tata Memorial Hospital ले गए. उनके पिता पटना में एक केयरगिवर के साथ रहे. करीब तीन महीने गौतम का ज्यादातर समय अस्पताल में बीता.
इसके बाद उनकी मां का निधन हो गया. इस नुकसान से उबरने में उन्हें करीब एक साल लगा. लेकिन इसी अनुभव ने आगे चलकर Suchitra Cancer Care Foundation (SCCF) की नींव रखी.
SCCF के को-फाउंडर डॉ. अमित कुमार उनकी मां के इलाज से जुड़े थे. बाद में दोनों ने कैंसर जागरूकता और भरोसेमंद जानकारी उपलब्ध कराने की दिशा में काम शुरू किया.
यह फाउंडेशन समुदायों में जागरूकता कार्यक्रम चलाता है. गौतम Gautam OncoTalks नाम का पॉडकास्ट भी होस्ट करते हैं, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों के ऑन्कोलॉजिस्ट से बातचीत होती है. SCCF की ऑनलाइन कैंसर एजुकेशन लाइब्रेरी में 50 से ज्यादा वीडियो हैं. इनमें OncoTalks के एपिसोड, विशेषज्ञों की बातचीत, जागरूकता कार्यक्रम और कॉन्फ्रेंस सेशन शामिल हैं.
गौतम के लिए कैंसर की चुनौती सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं है. मरीज और परिवार को डॉक्टर, जांच, मेडिकल शब्दावली और कई कठिन फैसलों के बीच रास्ता बनाना पड़ता है. सही जानकारी और मार्गदर्शन इस प्रक्रिया को थोड़ा आसान बना सकते हैं.

अब AI के जरिए फैला रहे जागरुकता
टेक्नोलॉजी से गौतम का रिश्ता पुराना है. Cognizant में उनके करियर की शुरुआत एनालिटिक्स और टेक्नोलॉजी से हुई थी. अब Generative AI (Gen AI) के विकास ने उन्हें इस अनुभव को सोशल सेक्टर में फिर इस्तेमाल करने का अवसर दिया है.
SCCF अब Suchi नाम के AI-समर्थित कैंसर इंफॉर्मेशन गाइड पर काम कर रहा है. इसका उद्देश्य मरीजों और उनके परिवारों को भरोसेमंद जानकारी समझने और डॉक्टर से बेहतर सवाल पूछने में मदद करना है. आगे इसे भोजपुरी और नेपाली जैसी भाषाओं में भी उपयोगी बनाने की कोशिश है.
Diksha में Rusty नाम का AI Tutor भी तैयार किया जा रहा है, जो बिहार बोर्ड के पाठ्यक्रम पर आधारित है. यह प्रोजेक्ट JPMorgan Chase के Force for Good प्रोग्राम के सहयोग से विकसित हो रहा है.
इसके साथ Diksha, Glific के जरिए WhatsApp-बेस्ड लाइफ स्किल्स प्रोग्राम भी चला रहा है.
गौतम के लिए AI का मतलब शिक्षक या डॉक्टर की जगह लेना नहीं है. उनका मानना है कि सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी जानकारी और मार्गदर्शन तक पहुंच को बेहतर बना सकती है.
गौतम बताते हैं, “बिहार जैसे राज्य में समस्या सिर्फ संसाधनों की नहीं है. कई बार सही जानकारी और सही दिशा भी लोगों तक नहीं पहुंचती. अगर टेक्नोलॉजी इसमें मदद कर सकती है, तो हमें उसके साथ प्रयोग जरूर करना चाहिए.”
‘दिल में बसता है बिहार’ — गौतम गौरी
2010 में गौतम पटना की बस्तियों में जाकर बच्चों और उनके परिवारों से मिल रहे थे. आज उनका काम शिक्षा से निकलकर कैंसर जागरूकता और AI तक पहुंच चुका है.
इस दौरान बिहार भी बदला है. नई पीढ़ी के लिए एजुकेशन, टेक्नोलॉजी और सोशल सेक्टर में काम करने के अवसर बढ़े हैं. गौतम जैसे लोग इस बदलाव को सिर्फ बाहर से देखने के बजाय उसके बीच रहकर आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.
फिर भी गौतम के लिए इस सफर का सबसे बड़ा सबक किसी टेक्नोलॉजी, संस्था या मॉडल से जुड़ा नहीं है. वह इसे लगातार मौजूद रहने से जोड़ते हैं.
गौतम कहते हैं, “हर समस्या का समाधान आपके पास नहीं होगा. हर बार बड़ा बदलाव भी नहीं आएगा. लेकिन अगर आप लंबे समय तक लोगों के साथ बने रहते हैं, तो एक भरोसे की जगह बनती है.”
शायद यही गौतम के 16 साल के सफर का सबसे अहम हिस्सा है. शिक्षा हो, कैंसर केयर हो या AI, उनका काम एक ही विचार के आसपास बना रहा है: लोगों के बीच रहना, उनकी जरूरत समझना और जहां संभव हो, जानकारी और अवसर तक पहुंच आसान बनाना.
बिहार गौतम गौरी के सफर का शुरुआती पड़ाव जरूर था, लेकिन 16 साल बाद भी यही उनकी कहानी का केंद्र है. यहीं से उनके सफर को मायने मिले और आज उनका दिल यहीं बसता है.




