बिहार की ‘जीविका दीदियां’: जब महिलाओं ने थामा बदलाव का चिराग
10 रु से शुरू हुई बिहार की यह ‘जीविका’ क्रांति आज बदलाव की मिसाल बन चुकी है. महिलाएं अब घर की सीमाएं पार कर पंचायत, बाजार और समाज में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं. बिहार से निकली यह कहानी पूरे भारत की प्रेरणा बन रही है.
बिहार जैसे राज्य में, जहां पारंपरिक सामाजिक ढांचे, पर्दा प्रथा, और पुरुष प्रधान सोच का बोलबाला रहा है, वहां आज महिलाएं अपने नाम, अपने काम और अपने साहस से जानी जा रही हैं. कभी “फलां की बहू” या “उसकी पत्नी” कहलाने वाली महिलाएं, अब पंचायत स्तर की बैठकें संभाल रही हैं, बैंक के काउंटर से बिना झिझक बात कर रही हैं और अपने परिवार की आर्थिक रीढ़ बन चुकी हैं.
यह बदलाव अचानक नहीं आया — यह संघर्ष, सीख और साथ की कहानी है. और इस बदलाव की धुरी बनीं — जीविका दीदियां.
‘जीविका’ योजना क्या है?
2006-07 में बिहार सरकार ने वर्ल्ड बैंक की मदद से ‘जीविका’ (Bihar Rural Livelihoods Promotion Society — BRLPS) की शुरुआत की. उद्देश्य था:
- ग्रामीण महिलाओं को संगठित करना
- उन्हें स्वयं सहायता समूहों (SHG) के ज़रिए जोड़ना
- आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी सुनिश्चित करना
- आत्मनिर्भरता, वित्तीय शिक्षा और नेतृत्व क्षमता विकसित करना
अब तक 10.6 लाख SHG बन चुके हैं, जो न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के लिए एक मिसाल हैं.
1.35 करोड़ जीविका दीदियां चला रही ₹1 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था
आज बिहार की 1.35 करोड़ जीविका दीदियां चला रही हैं 1 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था — और वो भी 99.5% रीपेमेंट रेट के साथ. अब तक 78,000 करोड़ रुपये से अधिक का लोन इन समूहों को दिया जा चुका है.
इस योजना को चलाने और विस्तार देने का जिम्मा संभाला है हिमांशु शर्मा (IAS), CEO – BRLPS ने. YourStory की फाउंडर और CEO श्रद्धा शर्मा से बातचीत में उन्होंने बताया कि कैसे यह योजना एक प्रयोग से शुरू होकर आज 1 लाख करोड़ रुपये की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बन गई है — और वो भी महिलाओं के नेतृत्व में.
हिमांशु शर्मा कहते हैं, “यह कोई राहत योजना नहीं है. यह आत्म-सम्मान, आर्थिक शक्ति और सामूहिक भरोसे की कहानी है.”
महिलाओं के हाथ में सत्ता और स्वाभिमान
भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी अभी भी GDP का केवल 18% है. ऐसे में महिला सशक्तिकरण योजनाएं बेहद ज़रूरी हैं.
ऐसे में बिहार सरकार की ‘जीविका दीदी’ पहल के ज़रिए लाखों महिलाएं अब आत्मनिर्भर बन रही हैं.
आज जब गुड़िया कुमारी किसी कमरे में दाखिल होती हैं, तो लोग सम्मान से देखते हैं. फुसफुसाते हैं — “जीविका दीदी आ गईं.”
लेकिन कभी ऐसा दिन होगा, ये उन्होंने खुद नहीं सोचा था. कभी वह किसी की बहू या पत्नी के नाम से पहचानी जाती थीं, अपनी खुद की कोई पहचान नहीं थी.
ये कहानी साबित करती है कि अगर महिलाओं को अवसर, साथ और पहचान मिले, तो वे चमत्कार कर सकती हैं — सिर्फ़ ₹10 से शुरुआत करके भी.
सिर्फ ₹10 की बचत से शुरू हुआ सफर
पटना के फुलवारी शरीफ की गलियों से निकलती रोशनी:
फुलवारी शरीफ ब्लॉक की महिलाएं आज आत्मनिर्भर हैं. कभी घर की चारदीवारी में सिमटी ये महिलाएं आज कारोबार चला रही हैं, निर्णय ले रही हैं और दूसरों के लिए मिसाल बन चुकी हैं.
हाल ही में YourStory की फाउंडर और CEO श्रद्धा शर्मा से 12 जीविका दीदियों ने अपनी कहानियां साझा कीं — ये कहानियां हैं आत्मसम्मान, मेहनत, उम्मीद और बदलाव की.
मनिषा कुमारी, सीता देवी और गुड़िया कुमारी जैसी महिलाओं ने हफ्ते में ₹10 बचाकर अपनी नई जिंदगी की नींव रखी.
गांव की मिट्टी से निकलीं ये कहानियां
मनिषा की मसाला फैक्ट्री
पटना के फुलवारी शरीफ की मनिषा कुमारी ने ₹10 की बचत से शुरुआत की थी. विकास ग्राम संगठन में हर हफ्ते की गई छोटी सी बचत एक बड़ी शुरुआत बन गई. इसके बाद मनिषा को छोटे-छोटे लोन मिलते गए — पहले 10,000 रुपये, फिर 15,000 रुपये, और फिर 50,000 रुपये तक.
आज उनके पास सत्तू, बेसन, तेल और मसाले बेचने का छोटा कारोबार है. एक समय ऐसा था जब वह बिना पूछे घर से बाहर नहीं निकलती थीं. आज वे दूसरों को रोजगार दे रही हैं.
मनिषा कहती हैं, “2014 में जीविका से जुड़ी. शुरुआत में संकोच था लेकिन CRP दीदी ने समझाया. पति का साथ मिला. फिर धीरे-धीरे मैंने सत्तू-बेसन का कारोबार शुरू किया. आज मैं मसाला, आटा और तेल भी बेचती हूं.”
संजू देवी का बैंक खाते से फैंसी स्टोर तक का सफर
जीविका दीदी पहले से जुड़ने से पहले संजू देवी के पास बैंक खाता भी नहीं था. जब CRP दीदी ने ₹10 के योगदान से समूह में शामिल किया, तो उन्होंने 10 ग्रुप बनाए. फिर उन्हें लोन मिला और उन्होंने सौंदर्य प्रसाधन की दुकान (फैंसी स्टोर) खोला.
संजू देवी बताती हैं, “CRP दीदी ने मुझे सिर्फ दस रुपये देकर समूह में जुड़ने के लिए कहा. मैंने और महिलाओं को जोड़ा और 10 समूह बना लिए. बाद में मुझे लोन के लिए चुना गया. उस पैसे से मैंने एक छोटी सी श्रृंगार (कास्मेटिक) की दुकान शुरू की.”
सफीना खातून ने बदली परिवार की तक़दीर
सफीना खातून के पास खाने तक के पैसे नहीं थे, पति बीमार रहते थे. उनके लिए भी सिर्फ 10 रुपये की बचत से समूह में जुड़ना एक बड़ा मौका बन गया. उन्होंने किराना दुकान शुरू की और आज उनके बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं.
वह बताती हैं, “मेरे पति ज़्यादातर बीमार रहते हैं. घर में खाना तक के पैसे नहीं होते थे. बच्चों की पढ़ाई भी बहुत मुश्किल हो गई थी. लेकिन जब मैंने जीविका पहल से जुड़कर लोन लिया, तो एक छोटी किराने की दुकान शुरू की. आज मेरी बेटियां स्कूल में अच्छी पढ़ाई कर रही हैं और पूरे परिवार की हालत पहले से बहुत बेहतर हो गई है.”
गुड़िया की इज्ज़त से जुड़ी जंग
गुड़िया ने ₹15,000 का पहला कर्ज़ सौंदर्य प्रसाधन या दुकान के लिए नहीं, बल्कि बाथरूम बनवाने के लिए लिया.
क्योंकि उनके घर में शौचालय नहीं था — जो उनके लिए अपमान का कारण बनता था. परिवार और पति की सोच रूढ़िवादी थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.
उनकी इस पहल से पूरा गांव प्रेरित हुआ और कई घरों में बाथरूम बनवाए गए.
गुड़िया कहती हैं, “यही बदलाव मैंने लाया है.”
इसी तरह, एक और गुड़िया (शास्त्री) ने भी जीविका पहल के जरिए ग्राम संगठन से जुड़कर बाथरूम बनवाया. वह अब 11 कमेटियों की अकाउंटिंग संभालती हैं.
गुड़िया कहती हैं, “पहले हमें बैंक जाने में डर लगता था, अब हम आत्मविश्वास और गर्व के साथ जाते हैं.”
नीति की मेहनत से रोशन हुआ घर
नीति कुमारी का परिवार गरीबी रेखा के नीचे (BPL) आता है. साल 2020 में वह महिला ग्राम संगठन से जुड़ीं.
वह गर्व से कहती हैं, “जीविका कार्यक्रम की मदद से मैंने अपनी दुकान शुरू की और आत्मनिर्भर बनी. उस समय हमारे घर में बिजली भी नहीं थी. मैंने दफ्तर के कई चक्कर लगाए और आखिरकार हमारे घर में बिजली का कनेक्शन लगवाया.”
जीविका ने संवारा सीता का संसार
17 साल की उम्र में सीता देवी की शादी हो गई. 10वीं पास होने के बावजूद ससुराल में उन्हें अनपढ़ समझा गया. लेकिन अंदर की पढ़ने की ललक ने उन्हें SHG से जोड़ा. उन्होंने अखबार के रैपर पढ़-पढ़ कर ज्ञान बढ़ाया.
साल 2017 में जब एक CRP दीदी ने सीता से बचत समूह से जुड़ने की बात की, तो दूसरों को जहां मदद दिखी, वहीं सीता ने उसमें एक मौका देखा.
सीता ने 10 महिलाओं का एक समूह बनाया. सभी ने मिलकर पैसे जमा किए और पास के बैंक में एक बचत खाता खुलवाया.
जिस पढ़ाई को कभी उनके [सीता के] परिवार ने महत्व नहीं दिया था, वही अब उनकी ताकत बन गई. जब उन्हें समूह का हिसाब-किताब संभालने की ज़िम्मेदारी मिली, तो उनमें नेतृत्व और निर्णय लेने की क्षमता निखरकर सामने आई.
समूह को जीविका से 1,50,000 रुपये का लोन मिला, जिसमें से सीता को 15,000 रुपये मिले. इस पैसे से उसने एक बछड़ा खरीदा. जब वह बड़ा हुआ और उससे और बछड़े हुए, तो उसने उसे 30,000 रुपये में बेच दिया — यानी अपनी कमाई दोगुनी कर ली. इस पैसे से सीता ने अपने पति के लिए एक छोटी दुकान भी शुरू करवाई और अपना लोन चुका दिया.
आज सीता 18 स्वयं सहायता समूह (SHG) संभाल रही हैं. उन्हें समाज में पहचान और इज्जत मिल रही है. उनके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, जिनकी पढ़ाई का खर्च वह अपने पशुपालन व्यवसाय से उठा रही हैं.
वह गर्व से कहती हैं, “अब मेरी कदर बढ़ गई है.” यह बदलाव पीढ़ियों को प्रभावित करने वाला है.
पिंकी कुमारी: पर्दा हटता गया, पहचान बनती गई
कई महिलाओं के लिए जीविका सिर्फ एक आर्थिक योजना नहीं, बल्कि ‘पर्दे से पहचान’ तक की यात्रा रही है.
पिंकी कुमारी, जो कभी घूंघट में रहती थीं, अब फूलों का कारोबार कर रही हैं और इंस्टाग्राम पर अपने बिजनेस की रील्स बनाती हैं.
पिंकी कुमारी कहती हैं, “2018 में जुड़ी थी. उस वक्त घूंघट में रहती थी. लेकिन ससुर ने कहा — ‘अब जब बाहर जाती हो, सिर मत ढकना.’ फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा.”
वे आगे कहती हैं, “पहले हम सोचते थे कि औरतें सिर्फ रोटियां बनाएं, अब हम सोचते हैं कि हमारी बेटियां बैंक की मेनेजर बनें.”
आज पिंकी 30 जीविका दीदियों के साथ फूलों का बिज़नेस करती हैं, रील्स बनाकर इंस्टाग्राम पर डालती हैं.
इंदु देवी की सिलाई से आत्मनिर्भरता तक की यात्रा
जीविका दीदियों के कहने पर इंदु देवी ने काम करना शुरू किया. वह विधवा थीं और छोटे बच्चों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी. उन्होंने एक सिलाई मशीन खरीदी और उसे एक सफल टेलरिंग बिज़नेस में बदल दिया.
आज उनके पास दो मशीनें हैं और वह महिलाओं के कपड़े सिलती हैं. इससे उन्हें अच्छी कमाई हो जाती है.
वह कहती हैं, “मेरे पास सहारा देने वाला कोई नहीं है. लेकिन महंगाई के बावजूद मैं घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई दोनों संभाल रही हूं. एक औरत होने के नाते, मैंने साबित कर दिया कि मैं अकेले भी सब कर सकती हूं.”
पिंकी की मेहनत से बदली किस्मत
एक और पिंकी कुमारी, जो कभी दो वक्त का खाना भी नहीं जुटा पाती थीं, आज ₹50,000 महीना कमाती हैं. फैंसी दुकान और गाय पालन से उन्होंने घर की आर्थिक स्थिति सुधारी है. यह उनकी मेहनत और हिम्मत की कहानी है.
जब वह जीविका दीदी कार्यक्रम से जुड़ीं, तो उन्होंने 20,000 रुपये का लोन लिया और एक छोटी दुकान खोली जिसमें गहने और कॉस्मेटिक जैसी चीजें बेचने लगीं.
बाद में और लोन लेकर उन्होंने दुकान को बड़ा किया और कुछ गायें भी खरीदीं. आज उनकी आमदनी ने पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति को बदल दिया है.
तारा की तरक्की: ट्यूशन से बिज़नेस तक
तारा देवी आज एक डिटर्जेंट बनाने का कारोबार चला रही हैं. जीविका दीदी बनने के बाद उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया.
हालांकि वह इंटर तक पढ़ी हुई हैं — जो उनके ससुराल में सबसे ज्यादा पढ़ाई मानी जाती थी — फिर भी उन्हें सिर्फ घर पर ट्यूशन पढ़ाने तक ही सीमित कर दिया गया था.
लेकिन जीविका योजना से लोन लेकर उन्होंने एक ट्रेनिंग प्रोग्राम में हिस्सा लिया और फिर खुद का बिज़नेस शुरू किया. अब वह घर पर ही डिटर्जेंट बनाती हैं और घर-घर जाकर बेचती हैं. अपने पति के सहयोग से अब वह अपने कारोबार को और बढ़ाने की योजना बना रही हैं.
रूबी कुमारी बनी बैंक सखी
रूबी कुमारी का सपना था बैंक में काम करना, और वह सपना तब पूरा हुआ जब वह बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट सेक्रेटरी बनीं. आज वह 2,000 से 3,000 खातों को संभालती हैं और अपने गांव में बैंकिंग सेवाएं पहुंचा रही हैं.
वह कहती हैं, “जीविका पहल के जरिए मेरा सपना पूरा हुआ है. अब मैं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन गई हूं.”
सावित्री का संघर्ष बना मुस्कान
सावित्री कपरना की जिंदगी अब भी आसान नहीं है — वह आज भी लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती हैं, फूस की झोपड़ी में रहती हैं और छोटी सी मछली की दुकान चलाती हैं. लेकिन उनके चेहरे पर शिकन नहीं, मुस्कान है.
वह कहती हैं, “जितना दुख देखोगे, उतनी हिम्मत बढ़ेगी. हमने जीना सीख लिया है.”

YourStory की फाउंडर और CEO श्रद्धा शर्मा से 12 जीविका दीदियों ने अपनी कहानियां साझा कीं — ये कहानियां हैं आत्मसम्मान, मेहनत, उम्मीद और बदलाव की.
पहचान: अब रिश्तों से नहीं, नाम से बन रही
जीविका दीदियों की ज़िंदगी सिर्फ पैसों या आर्थिक आज़ादी से नहीं बदली है, बल्कि उन्होंने समाज की पुरानी सोच और परंपराओं को भी तोड़ा है.
अब वे अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में भेज रही हैं और यह संकल्प ले चुकी हैं कि अपनी बेटियों की शादी 21 साल की उम्र के बाद ही करेंगी. यह बहुत अलग है उस जीवन से जो कभी समाज की बंदिशों और कम विकल्पों में बीत रहा था.
आज इन जीविका दीदियों को सिर्फ उनके परिवार नहीं, बल्कि पूरा समाज सम्मान देता है. सरकारी अधिकारी भी उनकी राय लेते हैं. अब वे किसी पुरुष के रिश्ते से नहीं, बल्कि अपने नाम और काम से जानी जाती हैं.
क्यों खास है जीविका दीदियों की यह यात्रा?
ये महिलाएं अब अपने गांव की रोल मॉडल बन चुकी हैं. वे दूसरी महिलाओं को भी प्रेरित कर रही हैं कि जीविका से जुड़ो, आत्मनिर्भर बनो.
इन दीदियों की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि वे पैसे कमा रही हैं, बल्कि यह है कि उन्होंने अपने बेटियों की शादी की उम्र 21 साल तय की है, बेटों को बेटियों से ऊपर नहीं रखा, और समाज को सिखाया कि औरतें बोझ नहीं, नेतृत्वकर्ता हैं. उन्होंने साबित किया है कि औरतें सिर्फ सपना नहीं देखतीं, उन्हें पूरा भी करती हैं.
उनकी आवाज़ एक है, और साफ़ है — “हम चाहती हैं कि हर महिला जीविका से जुड़े और अपनी जिंदगी बदले.”
ये सिर्फ कहानी नहीं, एक आंदोलन है — जो हर दस रुपये की बचत से शुरू होता है और सम्मान, आत्मनिर्भरता और पहचान तक पहुंचता है.
इस योजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह योजना ‘उपर से थोपे गए समाधान’ की बजाय ‘भीतर से निकले बदलाव’ की वकालत करती है.
यहां महिलाएं खुद निर्णय लेती हैं कि किस दिशा में आगे बढ़ना है — कोई बकरी पालन करती है, कोई दुकान खोलती है, कोई सिलाई शुरू करती है, तो कोई ब्यूटी पार्लर चलाती है.
क्यों ज़रूरी है इस मॉडल को अपनाना?
बिहार का जीविका मॉडल इस बात का उदाहरण है कि:
- सशक्तिकरण सिर्फ भाषणों से नहीं, जमीनी योजनाओं से आता है
- जब महिलाओं को वित्तीय शिक्षा, साख और फैसले लेने का अधिकार मिलता है, तो वो पूरे समाज को ऊपर उठाती हैं
- ऐसे कार्यक्रम लाभार्थी आधारित नहीं, बल्कि नेता बनाने वाले होने चाहिए
हाल ही में बिहार के उद्योग मंत्री श्री नीतीश मिश्रा ने माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट X पर एक पोस्ट की. उन्होंने 'जीविका' दीदी पहल की सराहना की. उन्होंने इसे नारी सशक्तिकरण की एक मौन क्रांति बताया. उन्होंने बताया कि यह पहल महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव ला रही है.
Edited by Ravi Pareek



