बिजनौर के अर्चित राजपूत ने नौकरी छोड़ कैसे शुरू किया खुद का फूड कार्ट बिजनेस
बिजनौर के अर्चित राजपूत ने पिता की दुकान के पास फूड कार्ट शुरू किया और यूपी सरकार की CM YUVA Yojana की मदद से अपना छोटा व्यवसाय खड़ा किया. यह कहानी बताती है कि अनुभव, परिवार का साथ और रोज की मेहनत से स्वरोजगार कैसे स्थिर बनता है.
उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के रहने वाले अर्चित राजपूत के लिए फास्ट फूड कार्ट शुरू करने का विचार किसी बड़े सपने से नहीं निकला. यह विचार उनके रोजमर्रा के अनुभव से आया. वह सालों से अपने पिता की दुकान के आसपास रहे थे. जरूरत पड़ने पर हाथ बंटाते थे. ग्राहकों को आते जाते देखते थे. यह भी समझते थे कि कैसे साधारण और भरोसेमंद काम से लोग बार बार लौटकर आते हैं.
अर्चित ने कॉमर्स से ग्रेजुएशन किया. इसके साथ ही आईटीआई की ट्रेनिंग भी ली. पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने कहीं नौकरी नहीं की. उन्होंने घर के पास रहकर पिता की दुकान संभालने में मदद करना बेहतर समझा. बाहर जाने के बजाय वह परिवार के साथ रहकर कुछ अपना करना चाहते थे.
धीरे धीरे उनके मन में एक विचार साफ होने लगा. वह पिता के काम के साथ साथ कोई छोटा सा काम शुरू करना चाहते थे, जिसे पास में ही संभाला जा सके. ताकि दिन भर दो अलग जगहों के बीच भागदौड़ न करनी पड़े.
आखिरकार उन्होंने पिता की दुकान के पास ही एक छोटा फास्ट फूड कार्ट शुरू किया. इस कार्ट पर मोमोज, चाउमीन, बर्गर, स्प्रिंग रोल, चिली पोटैटो और पिज्जा जैसे आम और पसंद किए जाने वाले आइटम बनाए जाते हैं. ठेले में ही खाना बनाने और सामान रखने की पूरी व्यवस्था है. फ्रिज है. ओवन है. इंडक्शन और गैस सिलेंडर है. सब्जी काटने और तैयारी का सारा काम वहीं होता है.
अर्चित इस ठेले को एक सहायक के साथ चलाते हैं. वह सहायक पूरे दिन उनके साथ रहता है और खाना बनाने में मदद करता है. काम शुरू करने का फैसला पक्का तब हुआ जब उनकी बहन दीक्षा ने उन्हें हिम्मत दी. उन्होंने कागजी प्रक्रिया और पैसों की व्यवस्था समझाने में मदद की.
यूपी सरकार की ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान’ योजना (CM YUVA Yojana) के तहत अर्चित को लोन मिला. वह बताते हैं कि प्रक्रिया ज्यादा मुश्किल नहीं रही. सही तरीके से समझाया गया तो काम आसान हो गया. उनके अनुसार यह योजना शुरुआत में सहारा देती है. लेकिन रोज की कमाई मेहनत और अनुशासन पर ही निर्भर करती है.
अर्चित का दिन एक तय लय में चलता है. वह सुबह कार्ट पर पहुंचते हैं. फिर सामान की जरूरत देखते हैं. अपने सहायक के साथ हाथ से लिखी सूची बनाते हैं. इसके बाद खुद बाजार जाकर सब्जियां और बाकी सामान खरीदते हैं.
दोपहर के समय खाना बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है. शाम होते होते ग्राहक आने लगते हैं. रात करीब दस या साढ़े दस बजे तक बिक्री चलती है. अर्चित बताते हैं कि सबसे ज्यादा मांग मोमोज की रहती है. लोग नए प्रयोग से ज्यादा स्वाद और सही दाम को महत्व देते हैं.
दाम उन्होंने जानबूझकर आसपास के बाजार से थोड़े कम रखे हैं. इससे ग्राहक दोबारा आते हैं. उनके पिता पास ही अपनी दुकान संभालते हैं. जरूरत पड़ने पर अर्चित दोनों जगह आते जाते रहते हैं. इस तरह वह परिवार और अपने काम के बीच संतुलन बनाए रखते हैं.
अभी अर्चित तेजी से विस्तार के बारे में नहीं सोच रहे हैं. उनका ध्यान स्थिरता पर है. वह जानते हैं कि एक व्यक्ति को रोजगार देना जिम्मेदारी है. इसलिए पहले नियमित आमदनी जरूरी है.
वह मानते हैं कि सीएम युवा योजना ने शुरुआत में मदद की. लेकिन कारोबार रोज की मेहनत से ही चलता है. अर्चित कहते हैं कि काम छोटा हो या बड़ा, अपना होना चाहिए. वह दूसरों को भी स्वरोजगार के बारे में सोचने की सलाह देते हैं. लेकिन बिना किसी दिखावे के.
पिता की दुकान में मदद करने से लेकर अपना फूड कार्ट चलाने तक का यह सफर अर्चित के लिए विकास से ज्यादा भरोसे का है. शुरुआत की घबराहट अब रोज की दिनचर्या में बदल चुकी है. जाने पहचाने ग्राहक हैं. तय समय है. और घर के पास सम्मानजनक कमाई का सुकून है.
Edited by रविकांत पारीक



