Waste is Gold: यह स्टार्टअप बना रहा है भारत को जीरो वेस्ट देश
भारत में बढ़ते कचरे की समस्या का अनोखा समाधान. क्लाइमेट टेक स्टार्टअप Waste is Gold शहरी कचरे को जीरो एमिशन के साथ प्रोसेस करता है. सिर्फ आठ घंटे में ऑर्गेनिक वेस्ट को पौष्टिक कम्पोस्ट में बदलने वाली हाई स्पीड मशीन जानें कैसे बदल रही है कचरा प्रबंधन का भविष्य.
भारत में 2400 से ज्यादा डम्पसाइट्स हैं. इन जगहों पर हर साल 2,33 करोड़ टन से ज्यादा कचरा जमा होता है. यह संख्या बहुत डराती है. यही आंकड़ा जानकर संदीप तिवारी (Sandeep Tiwari) ने कदम उठाने की ठानी. साल 2018 में उन्होंने Waste is Gold Technologies की स्थापना की. उनका उद्देश्य था कि कोई भी कचरा लैंडफिल में न जाए.
YourStory से बात करते हुए, तिवारी कहते हैं कि उनका लक्ष्य दुनिया भर में डीसेंट्रलाइज्ड वेस्ट मैनेजमेंट को बढ़ावा देना है. वे ऐसी टेक्नॉलजी बनाना चाहते थे जो हर समुदाय को अपना कचरा खुद प्रभावी और जिम्मेदारी से मैनेज करने में सक्षम बनाए.
यह स्टार्टअप बेंगलुरु में स्थित है. कंपनी की भारत में 25 सदस्यों की टीम है. इनके पास अपना मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भी है. यहीं पर यह अपने प्रोडक्ट्स की डिजाइनिंग और डेवलपमेंट करते हैं.
टेक्नोलॉजी के जरिए कचरा अब बन रहा है सोना
वेस्ट इज गोल्ड का सबसे प्रमुख प्रोडक्ट एक ऑर्गेनिक वेस्ट कन्वर्टर (Organic Waste Converter - OWC) है. यह एक हाई स्पीड और तेज प्राकृतिक कम्पोस्टिंग मशीन है. यह मशीन कमर्शियल और नगरपालिका दोनों तरह के इस्तेमाल के लिए बनाई गई है. कंपनी का दावा है कि यह मशीन जीरो एमिशन पैदा करती है.
तिवारी के अनुसार यह मशीन केवल आठ घंटे में ऑर्गेनिक वेस्ट को प्रोसेस कर देती है. अब तक यह तीन सौ तिरासी दशमलव बावन मिलियन किलोग्राम से ज्यादा कचरे को लैंडफिल में जाने से रोक चुकी है. पारंपरिक तरीकों में बहुत श्रम और ऊर्जा लगती है. लेकिन यह तकनीक सरल चलन, तेज काम और बेहतर दक्षता के लिए बनाई गई है. मशीन से तैयार होने वाला कम्पोस्ट पोषक तत्वों से भरपूर होता है और इसे बागवानी तथा लैंडस्केपिंग में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है.
तिवारी बताते हैं कि इस मशीन की विश्वसनीयता को सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने भी प्रमाणित किया है. कंपनी एक Automatic Waste Segregation Machine (AWSM) भी बना रही है. यह मशीन नगरपालिका ठोस कचरे को पूरी तरह अपने आप छांटने में सक्षम होगी. इससे मानव हस्तक्षेप कम होगा और दक्षता बढ़ेगी.
इसके अलावा कंपनी एडवांस्ड बायोगैस टेक्नोलॉजी पर भी काम कर रही है. यह तकनीक ऑर्गेनिक वेस्ट को नवीकरणीय ऊर्जा में बदलने में मदद करेगी. इसकी खासियत यह होगी कि इस प्रक्रिया में कोई बदबू नहीं होगी.
कंपनी पोर्टेबल होम कम्पोस्टर भी बना रही है. यह मशीन घरों में रखा जा सकता है. लोग अपने घर का ऑर्गेनिक कचरा वहीं पर कम्पोस्ट में बदल सकते हैं. इससे लोग अपना पर्यावरणीय प्रभाव कम कर सकते हैं और जीरो वेस्ट लाइफस्टाइल अपना सकते हैं. घर का बना कम्पोस्ट पौधों को उगाने में भी उपयोगी होता है.
बढ़ता कारोबार
सात साल में ही वेस्ट इज गोल्ड ने भारत में तीन सौ से ज्यादा लोकेशनों पर अपनी उपस्थिति बना ली है. कंपनी अगले पांच साल में एशिया पैसिफिक, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मध्य पूर्व, उत्तर अमेरिका और यूरोप में विस्तार की तैयारी कर रही है.
कंपनी इस समय 300 से ज्यादा लाइव प्रोजेक्ट पर काम कर रही है. इसके क्लाइंट में प्रेस्टिज ग्रुप, डीएलएफ, लोढ़ा, एल एंड टी, शापूरजी, कैटरपिलर, माईहोम्स और आदित्य बिड़ला शामिल हैं. इनके प्रोजेक्ट की कीमत 3.5 लाख रुपये से लेकर कई करोड़ रुपये तक होती है. इस समय कंपनी 100 करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर काम कर रही है.
भारत के वेस्ट मैनेजमेंट सेक्टर का बाजार वर्ष 2035 तक बढ़कर $29.71 बिलियन तक पहुंचने की संभावना है. तिवारी बताते हैं कि इस परिवर्तन के पीछे 2016 के ठोस कचरा प्रबंधन नियमों ने बड़ी भूमिका निभाई. इन नियमों ने सभी शहरी स्थानीय निकायों और आयोजनों को कचरा प्रबंधन के दायरे में शामिल किया.
2016 के नियमों में यह अनिवार्य किया गया है कि कचरे को घर से ही अलग करना होगा. इसे कम से कम तीन श्रेणियों में बांटना होगा. पहली बायोडिग्रेडेबल दूसरी सूखा और तीसरी घरेलू खतरनाक श्रेणी. जिन कचरों में 1,500 किलो कैलोरी प्रति किलोग्राम से ज्यादा कैलोरी वैल्यू होती है उन्हें लैंडफिल में डालने के बजाय ऊर्जा उत्पादन में उपयोग करने को बढ़ावा दिया गया है.
तिवारी बताते हैं कि कई चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं. जैसे कि सैनिटरी लैंडफिल के लिए उपयुक्त जमीन ढूंढना बहुत मुश्किल है. कई शहरी संस्थाएं वित्तीय रूप से सक्षम नहीं हैं. यूजर फीस वसूली भी एक बड़ी समस्या है. इसके अलावा कचरे की स्रोत पर सही छंटाई नहीं हो पाती. इससे रीसाइक्लिंग और ट्रीटमेंट प्लांट की आर्थिकता और संचालन पर असर पड़ता है.
कंपनी अब तक बिना किसी बाहरी निवेश के चली है. तिवारी कहते हैं कि उन्होंने शुरू से ही राजस्व उत्पन्न करने पर ध्यान रखा ताकि कभी नकदी की कमी न हो. उनके क्लाइंट्स का भरोसा कंपनी को चलाने में बहुत मददगार रहा है.
आगे की राह
कंपनी आने वाले समय में परियोजना आधारित 100-200 करोड़ रुपये तक की फंडिंग जुटाने की योजना बना रही है. इस फंडिंग से पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप और समुदाय आधारित कचरा प्रबंधन परियोजनाओं को बढ़ावा मिलेगा. कंपनी का लक्ष्य ऐसे परोपकारी व्यक्तियों और इंपैक्ट निवेशकों के साथ काम करना है जो जलवायु परिवर्तन समाधान में विश्वास करते हैं. यह फंडिंग तकनीक के विस्तार, अनुसंधान और विकास तथा बड़े पैमाने पर स्केलिंग में लगाई जाएगी.
कंपनी की प्रतिस्पर्धा पुणे की ग्रीन प्लैनेट सॉल्यूशन्स और हरियाणा की केल्विन वॉटर टेक्नॉलजीज जैसी कंपनियों से है. हालांकि तिवारी मानते हैं कि उनकी कंपनी के सीधे प्रतियोगी बहुत कम हैं.
वे कहते हैं कि उनकी असली खासियत हाई स्पीड नैचुरल एरोबिक कम्पोस्टिंग है जो ऊर्जा कुशल है और जीरो एमिशन के साथ काम करती है. यही बात उन्हें भारतीय और वैश्विक वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम में अलग पहचान देती है.
Edited by रविकांत पारीक



