कैसे ‘Memoirs of India’ बना भारत की किताबों का ख़ज़ाना
1967 में एक पारसी डॉक्टर से खरीदी गई किताब से शुरू हुआ Memoirs of India आज भारत का सबसे प्रतिष्ठित दुर्लभ किताबों का घर है. तीन पीढ़ियों की लगन और इतिहास के प्रति प्रेम ने इसे किताब प्रेमियों का तीर्थ बना दिया है.
दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन की एक शांत गली में जब आप कदम रखते हैं, तो शोर-शराबे से दूर एक अलग ही दुनिया खुलती है. यहां न कोई तेज़ म्यूज़िक है, न चमकते डिस्प्ले. बस हवा में घुली हुई पुराने कागज़ और स्याही की ख़ुशबू, लकड़ी की अलमारियों में सजी मोटी किताबें, और उनके पन्नों में बंद सदियों पुरानी कहानियाँ और इतिहास.
यह जगह है Memoirs of India—जहां किताबें सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं, महसूस की जाती हैं.
हर किताब के कवर पर वक्त का असर है, हर पन्ने पर बीते ज़माने की ख़ामोश आवाज़ें हैं. यहां आने वाला हर शख़्स सिर्फ खरीददार नहीं होता, बल्कि इतिहास का यात्री बन जाता है.
दिल्ली जैसे तेज़-रफ़्तार शहर में, जहां डिजिटल स्क्रीन पर सबकुछ सेकंडों में बदल जाता है, Memoirs of India हमें धीमेपन और गहराई की खूबसूरती याद दिलाता है. यह सिर्फ एक दुकान नहीं, बल्कि एक ऐसी विरासत का घर है जो 1967 से आज तक तीन पीढ़ियों के जुनून और समर्पण से पली-बढ़ी है.
यह कहानी है उस परिवार की जिसने किताबों में सिर्फ शब्द नहीं देखे. बल्कि देश की आत्मा, इतिहास और पहचान देखी. यह कहानी है Memoirs of India की. एक ऐसे ख़ज़ाने की, जहां हर किताब अपने अंदर एक बीता हुआ दौर समेटे हुए है.
शुरुआत: एक डॉक्टर, कुछ किताबें और एक सपना
Memoirs of India की कहानी शुरू होती है राजीव जैन के पिता से, जिन्होंने 1967 में एक पारसी डॉक्टर से कुछ दुर्लभ किताबें खरीदीं. उस वक्त उन्हें शायद अंदाज़ा भी नहीं था कि यह छोटा-सा सौदा जीवनभर का जुनून बन जाएगा.
कोलकाता के उन दिनों में, किताबें सिर्फ पढ़ने की चीज़ नहीं थीं; वे इतिहास की सांसें थीं. धीरे-धीरे यह जुनून बढ़ता गया. 1980 में जैन परिवार इस शौक़ को बिज़नेस में बदलने के इरादे से दिल्ली आ गया. बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और नई संभावनाओं की तलाश उन्हें राजधानी दिल्ली तक ले आई.
आज वही छोटा सा बिज़नेस बन चुका है Memoirs of India, एक ऐसा नाम जो दुर्लभ किताबों और कलेक्टिबल्स की दुनिया में सम्मान से लिया जाता है.

(L-R) रिषभ जैन (को-फाउंडर और कैटलॉगर), राशी जैन दुगर (सेल्स हेड), राजीव जैन (फाउंडर) – Memoirs of India
तीसरी पीढ़ी की ज़िम्मेदारी और प्यार
कहते हैं कि किसी विरासत को आगे बढ़ाना आसान नहीं होता, खासकर जब वो किताबों जैसी नाज़ुक चीज़ से जुड़ी हो.
YourStory हिंदी से बात करते हुए, रिषभ जैन, जो अब इस विरासत के तीसरी पीढ़ी के हिस्से हैं, कहते हैं, “हमारे लिए यह सिर्फ बिज़नेस नहीं, एक जिम्मेदारी है. हम अपने ग्राहकों के साथ रिश्ते बनाते हैं, जो कई पीढ़ियों तक चले हैं.”
समय के साथ तकनीक बदली, लोग बदले, पर Memoirs of India की आत्मा वही रही, इतिहास को उसकी असल शक्ल में बचाने की लगन.
Memoirs of India के को-फाउंडर और कैटलॉगर रिषभ बताते हैं कि अब उन्होंने अपने ग्राहकों तक पहुँचने के लिए ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म शुरू किया है, ताकि कोई भी किताब प्रेमी घर बैठे दुर्लभ किताबें खरीद सके.
वे मुस्कुराते हुए कहते हैं, “हम कोशिश करते हैं कि ऑनलाइन अनुभव भी उतना ही व्यक्तिगत हो जितना हमारी दुकान पर आता है.”
Memoirs of India के लिए अपनी वेबसाइट लॉन्च करना एक टर्निंग पॉइंट था. रिषभ बताते हैं, “हमारा मक़सद था ज़्यादा लोगों तक पहुँचना, लेकिन उस आत्मीयता को बनाए रखना जो हमारी पहचान है.”
उनके अनुसार, हर लिस्टिंग में सटीक विवरण, असली तस्वीरें और ईमानदार ग्रेडिंग होती है, ताकि ग्राहक को पता रहे कि वह क्या खरीद रहा है.
ईमेल और चैट के ज़रिए जवाबदेही, आसान रिटर्न पॉलिसी और हर ग्राहक से सीधी बातचीत इस ब्रांड की ताक़त है.
रिषभ कहते हैं, “हमने किताबों को ऑनलाइन बेचना शुरू ज़रूर किया, लेकिन हमारी दिल्ली की दुकान आज भी किताब प्रेमियों का तीर्थ बनी हुई है.”
कौन सी किताबें सबसे ज़्यादा पसंद की जाती हैं?
Memoirs of India के कैटलॉग में हजारों किताबें हैं, लेकिन कुछ कैटेगरी हमेशा सबसे आगे रहती हैं. पहला संस्करण (First Editions), साइन की हुई किताबें और शुरुआती प्रिंटिंग्स—ये सब कलेक्टर्स के लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं.
भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास, संस्कृति, साहित्य, वास्तुकला, पुरातत्व, वस्त्र, यात्रा, प्रकृति, मानवशास्त्र और औपनिवेशिक भारत पर आधारित किताबें हमेशा मांग में रहती हैं.
रिषभ कहते हैं, “हमारे कलेक्टर्स को किताबों में सिर्फ शब्द नहीं दिखते. उन्हें उनमें अपने देश का अतीत, पहचान और कहानी दिखती है.”
दुर्लभ ख़ज़ाने: जब 400 साल पुरानी किताब हाथ लगी
रिषभ मुस्कुराते हैं जब उनसे उनकी सबसे दुर्लभ खोज के बारे में पूछा जाता है. वे बताते हैं, “हमारे पास एक बार 1599 में प्रकाशित ‘Voyages of the East Ship’ आई थी. इसे Jan Huygen van Linschoten ने लिखा था.”
यह किताब उस समय के यूरोपियों की भारत के प्रति जिज्ञासा और आश्चर्य को दिखाती है. इसमें सुंदर नक्शे और चित्र हैं जो आज भी देखने वाले को 16वीं सदी में ले जाते हैं.
रिषभ कहते हैं, “ऐसी किताब को हाथ में लेना ऐसा है जैसे आप समय के पार चले गए हों. यह किताब सिर्फ एक वस्तु नहीं, बल्कि इतिहास का जीवित टुकड़ा है.”
ग्राहक: पुरानी पीढ़ी से लेकर नए शौक़ीन तक
Memoirs of India के ग्राहक सिर्फ बुज़ुर्ग या शोधकर्ता नहीं हैं. रिषभ बताते हैं, “हमारे पास अनुभवी कलेक्टर्स के साथ-साथ युवा पेशेवर और उद्यमी भी आते हैं. बहुत से लोग हर महीने अपनी लाइब्रेरी बनाने के लिए बजट तय करते हैं.”
कुछ लोग पुरानी किताबें सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि इंटीरियर डेकोरेशन का हिस्सा बनाने के लिए भी खरीदते हैं.
रिषभ कहते हैं, “चाहे वो इतिहास के लिए हो या सजावट के लिए, हर ग्राहक किताबों के ज़रिए एक कहानी अपने घर ले जाता है.”
किताबों की असलियत पहचानने की कला
दुर्लभ किताबों की दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती है असली और नकली में फर्क करना. रिषभ बताते हैं, “हमारे लिए ऑथेंटिसिटी ही सब कुछ है. हर किताब को हम कई स्तरों पर परखते हैं—कागज़, प्रिंटिंग प्रोसेस, बाइंडिंग, टाइपफेस, स्याही—सब कुछ समय और जगह के हिसाब से बदलता है.”
इसके साथ ही वे Provenance यानी किताब के पुराने मालिकों के निशानों को भी जांचते हैं. Memoirs of India के पास 40 साल से ज़्यादा का अनुभव है, जो उन्हें किसी भी विसंगति को पहचानने में मदद करता है.
रिषभ कहते हैं, “जब कोई हमारे पास से किताब खरीदता है, तो वो सिर्फ एक वस्तु नहीं, बल्कि सत्यापित इतिहास घर ले जाता है.”
भारतीय बाजार की स्थिति और भविष्य
रिषभ स्वीकार करते हैं कि भारत का दुर्लभ किताबों का बाज़ार अभी शुरुआती दौर में है. वे कहते हैं, “अमेरिका और ब्रिटेन में यह उद्योग सैकड़ों साल पुराना है, जबकि भारत में अब जागरूकता बढ़ रही है.”
लेकिन वे इस बाज़ार की असीम संभावनाओं को लेकर बेहद उत्साहित हैं. रिषभ कहते हैं, “भारत का इतिहास, उपनिवेश काल, और सांस्कृतिक धरोहर इतनी समृद्ध है कि दुनिया भर के कलेक्टर्स इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं.”
Memoirs of India इस दिशा में एक सांस्कृतिक राजदूत की तरह काम कर रहा है, जो भारत की कहानियों को दुनिया तक पहुँचा रहा है.
भविष्य की बात करते हुए रिषभ की आँखों में चमक आ जाती है. वे कहते हैं, “हमारा सपना है कि Memoirs of India को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाए.”
वे दिल्ली से बाहर भी अपनी मौजूदगी बढ़ाने की योजना बना रहे हैं, ताकि और शहरों में लोग इस अनुभव का हिस्सा बन सकें. इसके अलावा वे बुक एग्ज़िबिशन, लेक्चर और पॉप-अप इवेंट्स के ज़रिए लोगों में दुर्लभ किताबों के प्रति जागरूकता फैलाना चाहते हैं.
रिषभ कहते हैं, “हम चाहते हैं कि लोग सिर्फ किताबें खरीदें नहीं, बल्कि उनकी कहानी समझें. हर किताब एक ज़िंदा दस्तावेज़ है जो अतीत को वर्तमान से जोड़ती है.”
एक विरासत जो आज भी ज़िंदा है
Memoirs of India सिर्फ एक दुकान नहीं, एक जीवंत संग्रहालय है जहां हर किताब एक कहानी कहती है. यह कहानी है उस परिवार की जिसने तीन पीढ़ियों तक इतिहास को थामे रखा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उसे महसूस कर सकें. कभी एक डॉक्टर से खरीदी गई किताब ने जो शुरुआत की थी, आज वो बन चुकी है भारत के किताब प्रेमियों का तीर्थ. Memoirs of India हमें याद दिलाता है कि समय बीत सकता है, पर शब्दों की खुशबू अमर रहती है.



