फीस न भर पाने वाली लड़की ने संवारा हज़ारों बच्चों का भविष्य: श्वेता अग्रवाल की कहानी
जब खुद की पढ़ाई रुकी, तब श्वेता अग्रवाल ने हज़ारों बच्चों के सपनों को उड़ान दी. जानिए कैसे एक लड़की ने गरीबी, तलाक, डिप्रेशन, अकेलेपन और तमाम मुश्किलों को पछाड़कर Unmukt Foundation के जरिए हज़ारों बच्चों का भविष्य संवारा.
श्वेता अग्रवाल (Shweta Agarwal) आज उन्मुक्त फाउंडेशन (Unmukt Foundation) की फाउंडर हैं. लेकिन उनकी कहानी सिर्फ एक एनजीओ की कहानी नहीं है. यह एक औरत की कहानी है जिसने अपने बचपन का दर्द, अपने करियर की ऊँचाइयाँ और अपनी आत्मा की खोज को मिलाकर एक ऐसा सपना गढ़ा, जिसमें हर बच्चा अपने सपनों को जी सके.
भुवनेश्वर की गलियों से लेकर बच्चों की आँखों में बसे सपनों तक—श्वेता का सफर संघर्ष, साहस और सेवा से भरा है.
जब श्वेता सातवीं कक्षा में थीं, उनके परिवार के पास स्कूल की फीस देने के पैसे नहीं थे. उन्हें अपना स्कूल बदलना पड़ा. उसी दिन उन्होंने मन ही मन कसम खाई—“कोई बच्चा पैसों और हालात की वजह से अपना भविष्य खराब करने पर मजबूर न हो.” यही वादा बाद में Unmukt का बीज बना.
आर्किटेक्ट से बदलाव की तलाश तक
श्वेता ने आर्किटेक्ट बनने का सपना पूरा किया. भारत की शीर्ष कंपनियों के साथ काम किया. बड़े-बड़े अस्पताल डिजाइन किए. करियर चमकदार था, लेकिन दिल बेचैन. बाहर से सब कुछ परफेक्ट लग रहा था. लेकिन अंदर खालीपन था. सवाल बार-बार उठते—"लोग बीमार क्यों हो रहे हैं? इतने विकास के बाद भी कैंसर और दूसरी बीमारियाँ क्यों बढ़ रही हैं? और मैं अपनी सफलता से संतुष्ट क्यों नहीं हूँ?"
उन्होंने नौकरी छोड़ दी. बैग उठाया और भारत-नेपाल घूमने निकल पड़ीं. ट्रक ड्राइवरों के साथ लिफ्ट ली, किसानों के घरों में रहीं, फोटोग्राफर बनीं. इस सफर में उन्हें असली सीख मिली. लद्दाख की एक किसान महिला ने बताया—“भोजन, प्यार और प्रकृति का सम्मान ही असली दवा है.” एक छोटी बच्ची ने सिखाया—“एक दिया बाँटने से रोशनी बढ़ती है.” और मानस नाम के एक लड़के ने दिखाया कि कैसे सिस्टम उसके पायलट बनने के सपने को ऑटो चलाने तक सीमित कर देगा.
उन्हें अहसास हुआ कि गरीबी, बीमारी, हिंसा और पर्यावरण संकट—सबकी जड़ एक ही है: खुशहाल और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी.
TFIx और Freedom Fellowship
Unmukt की शुरुआत तो हो गई थी, लेकिन दिशा साफ नहीं थी. तब Teach For India से जुड़े TFIx प्रोग्राम ने उन्हें नया दृष्टिकोण दिया.
श्वेता कहती हैं, “मैंने देखा कि युवा, जोश और लगन के साथ बच्चों के लिए काम कर रहे हैं. यह देखकर यक़ीन हुआ कि बदलाव संभव है. भले ही टियर-2 शहर हो, भले ही मुश्किलें हों, लेकिन अगर सिस्टमेटिक काम किया जाए तो शिक्षा बदल सकती है.”
यहीं से Freedom Fellowship की शुरुआत हुई.

श्वेता अग्रवाल, Unmukt Foundation की फाउंडर
PEACE Model
Freedom Fellowship दो साल का प्रोग्राम है. इसमें युवा साथी (Fellows) स्कूलों और समुदायों में जाकर बच्चों को पढ़ाते हैं और लीडरशिप भी सीखते हैं.
Unmukt का अपना PEACE मॉडल है—
P – Physical (शारीरिक सीख)
E – Emotional (भावनात्मक सीख)
A – Academic (शैक्षणिक सीख)
C – Creative (रचनात्मक सीख)
E – Environmental (पर्यावरणीय सीख)
यह सिर्फ गणित और अंग्रेज़ी नहीं है. इसमें कला, मूल्य, सहानुभूति और हिम्मत भी शामिल है. श्वेता का मानना है, “शिक्षा सिर्फ दिमाग़ की नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा की भी होती है.”
संघर्ष और जीत
शुरुआत आसान नहीं थी. श्वेता ओडिशा से नहीं थीं. कुछ लोगों ने अफवाह फैलाई कि वह बच्चों का अपहरण करेंगी या उनके अंग निकाल लेंगी. लोग दरवाज़ा बंद कर देते. लेकिन धीरे-धीरे भरोसा बना.
कोविड के समय तो बच्चे सुबह 5:30 बजे उनके दरवाज़े पर आ जाते. पार्क बंद थे तो फुटपाथ पर क्लास होती. PCR वैन आने से पहले बच्चे भाग जाते. लेकिन सीखना रुका नहीं.
आज Unmukt के बच्चों की कहानियाँ उम्मीद की मिसाल हैं—
- मानस जिसने हवाई अड्डा पेंट किया और पायलट बनने का सपना देखा.
- त्रुप्तिमयी जो बार-बार बेहोश होकर भी प्रैक्टिस करती रही. 2023 में, 5000 बच्चों में से चुनी गई स्टेट टेलेंट हंट में. आज, उसका सपना है—जूडो में ओलंपिक्स खेलना और इंडियन आर्मी ज्वाइन कर देश की सेवा करना.
- रिंकी, अपने परिवार की पहली लड़की जिसने दसवीं पास की.
- पायल, जिसने कोडिंग से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई.
- प्रबोध, जिसने रोबोट और ऐप बनाए और ओडिशा के टॉप इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया.
श्वेता कहती हैं, “एक लड़की गिरी, फिर उठी. और क्योंकि वो उठी—कई और उठ खड़े हुए.”
आगे का रास्ता
श्वेता चाहती हैं कि आने वाले सालों में सैकड़ों फ़ेलो बच्चों के साथ काम करें. और Fellowship पूरा करने के बाद भी 90% युवा शिक्षा से जुड़े रहें—चाहे Unmukt से, अपनी NGO से, CSR से या सरकार से. यह सिर्फ एक प्रोग्राम नहीं है. यह एक आंदोलन है.
2014-15 में श्वेता हर चीज़ में हाथ आज़मा रही थीं—आर्किटेक्चर, फोटोग्राफी, खेती, आर्ट, आध्यात्मिक कोर्स. तब एक साधु ने उनसे कहा, “दिल जो चाहता है, सब करो. कुछ छोड़ दोगी, कुछ छूट जाएगा. लेकिन जो सचमुच तुम्हारे दिल का है, वही टिकेगा.”
फिर ज़िंदगी ने कठिन मोड़ लिया—तलाक़ और डिप्रेशन (अवसाद). करीब 9–10 महीने उन्होंने Unmukt के छोटे दफ़्तर में बिताए. आज भी, भुवनेश्वर में अकेली रहती हैं. लेकिन एक पल के लिए भी हार मानने का ख़्याल उनके मन में नहीं आया.
श्वेता कहती हैं, “अब मैं सचमुच Unmukt महसूस करती हूँ—मुक्त. क्योंकि यही मेरा मक़सद है: हर बच्चा दिखाई दे, सुरक्षित हो और अच्छी शिक्षा पाए.”
श्वेता अग्रवाल की कहानी यह दिखाती है कि व्यक्तिगत दर्द भी किसी बड़े उद्देश्य में बदल सकता है. Unmukt Foundation आज बच्चों को सिर्फ किताबें नहीं देता, बल्कि उन्हें उड़ने के लिए पंख देता है.
जैसा श्वेता कहती हैं, “NGO मत बनाओ. भविष्य बनाओ.”



