दिल्ली की झुग्गी से UN तक: कैसे देवेंद्र कुमार ने संवारी 30 लाख लोगों की जिंदगी
दिल्ली के स्लम से उठकर देवेंद्र कुमार ने कैसे लाखों जिंदगियां बदलीं? लाडली फाउंडेशन की यह प्रेरक कहानी बताती है कि संघर्ष, हिम्मत और सेवा के जरिए कैसे समाज में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है.
“जो तूफ़ानों में पलते जा रहे हैं
वही दुनिया बदलते जा रहे हैं”
उर्दू के प्रसिद्ध शायर जिगर मुरादाबादी का ये शेर इस कहानी की शख़्सियत पर सटीक बैठता है.
दिल्ली के दक्षिणपुरी की गलियों में एक दो साल का बच्चा. साथ में उसकी तीन दिन की छोटी बहन. माता-पिता उन्हें वहीं छोड़कर चले गए. यह कहानी किसी फिल्म की नहीं, बल्कि लाडली फाउंडेशन (Ladli Foundation) के फाउंडर देवेंद्र कुमार (Devendra Kumar) की असली जिंदगी की है.
इतनी छोटी उम्र में जब बच्चे ठीक से बोलना भी नहीं सीखते, तब देवेंद्र को जिंदगी की सबसे बड़ी जंग लड़नी पड़ी. वह खुद बच्चा था, लेकिन जिम्मेदारी एक बड़े इंसान जैसी थी. बहन की देखभाल और खुद को बचाना, दोनों साथ-साथ चल रहे थे.
वह इलाका अपराध से भरा हुआ था. डर, हिंसा और असुरक्षा वहां आम बात थी. लेकिन इसी अंधेरे में एक ऐसी कहानी जन्म ले रही थी, जो आगे चलकर लाखों लोगों की जिंदगी में रोशनी भरने वाली थी. उनका भविष्य संवारने वाली थी.
अपराध, डर और बचने की जंग
दक्षिणपुरी सिर्फ एक स्लम नहीं था. वह एक ऐसा इलाका था जहां बच्चों को संगठित तरीके से अपराध की तरफ धकेला जाता था. उन्हें नशे का आदी बनाया जाता था ताकि उनसे गलत काम करवाए जा सकें.
देवेंद्र भी इस माहौल में पले-बढ़े. लेकिन उन्होंने एक अलग रास्ता चुना.
हाल ही में YourStory और The Bharat Project की फाउंडर और सीईओ श्रद्धा शर्मा से हुई बातचीत में देवेंद्र कहते हैं, “वहां बच्चों को पहले नशे की आदत लगाई जाती थी. ताकि उनसे अपराध कराया जा सके. मेरे ऊपर भी वही साया था. लेकिन शायद कोई ताकत थी जिसने मुझे बचा लिया.”
उनकी इस जिद की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी. उन्हें मारा गया. पीटा गया. कई बार पैसे छीन लिए गए. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.
उन्होंने खुद को बचाने के लिए एक अनोखा रास्ता चुना. उन्होंने पुलिस के साथ वॉलंटियर बनकर काम करना शुरू किया. यह कदम उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया.
वॉलंटियरिंग से बदली जिंदगी
वॉलंटियरिंग उनके लिए सिर्फ सेवा नहीं थी. यह उनके लिए सुरक्षा भी थी और पहचान भी. धीरे-धीरे इलाके के लोग उन्हें जानने लगे. बच्चों के माता-पिता अपने बच्चों को उनके साथ भेजने लगे. यह भरोसा उनकी सबसे बड़ी पूंजी बन गया.
देवेंद्र बताते हैं, “जब लोगों ने मुझ पर भरोसा करना शुरू किया, वही मेरी जिंदगी का असली मकसद बन गया. मुझे लगा कि मैं कुछ अच्छा कर सकता हूं.”
उन्होंने बच्चों को खेलों से जोड़ा. उन्हें नशे से दूर किया. धीरे-धीरे एक छोटी सी टीम बनी, जो आगे चलकर हजारों युवाओं की ताकत बन गई.
साल 2007 तक उन्होंने हजारों बच्चों को नशे से बाहर निकालकर खेल और काम की दिशा में लगाया.
बहन की जिम्मेदारी और लड़कियों के लिए संघर्ष
देवेंद्र की जिंदगी में एक और बड़ी जिम्मेदारी थी - उनकी बहन. उन्होंने उसे बाल विवाह से बचाया. यह आसान नहीं था. गरीबी में अक्सर लड़कियों की जल्दी शादी कर दी जाती है. कई बार यह शादी शोषण का रास्ता बन जाती है.
देवेंद्र ने यह देखा और समझा कि यह सिर्फ उनकी बहन की कहानी नहीं है. यह हजारों लड़कियों की हकीकत है.
यहीं से एक बड़े बदलाव की शुरुआत हुई.
लाडली फाउंडेशन की स्थापना
साल 2012 में देवेंद्र कुमार ने लाडली फाउंडेशन की नींव रखी. इसका मकसद था लड़कियों को सुरक्षित जीवन देना. उन्हें शिक्षा देना. उन्हें आत्मनिर्भर बनाना.
आज यह संस्था देश के करीब 50 जिलों में और लगभग 10 से 12 राज्यों में काम कर रही है. साल 2020 में इस संस्था को United Nations Economic and Social Council (ECOSOC) से स्पेशल कंसल्टेटिव स्टेटस मिला. यह किसी भी सामाजिक संस्था के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. लाडली फाउंडेशन को भारत सरकार की तरफ से राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है.
यह संस्था बालिका सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्किल डेवलपमेंट और जेंडर समानता जैसे मुद्दों पर काम करती है. खास बात यह है कि यह उन लोगों तक पहुंचती है, जहां अक्सर सरकारी योजनाएं और बड़ी संस्थाएं नहीं पहुंच पातीं.
देवेंद्र ने सामूहिक विवाह का मॉडल शुरू किया. लेकिन उसमें एक खास बात थी. हर लड़के का बैकग्राउंड चेक किया जाता था. ताकि कोई लड़की गलत हाथों में न जाए.
देवेंद्र बताते हैं, “संस्था ने अब तक करीब 2100 गरीब परिवारों की लड़कियों की शादी भी करवाई है. हमने सिर्फ लड़कियों की शादी नहीं करवाई. हमने लड़कियों को सक्षम बनाया. उन्हें शिक्षा दी. स्किल दी. हेल्थ इंश्योरेंस दिया. ताकि वे सम्मान से जी सकें.”
समाज सेवा का नया मॉडल
देवेंद्र ने एक और अनोखा प्रयोग किया. उन्होंने कहा कि सिर्फ पैसे दान करना काफी नहीं है. असली बदलाव तब आता है जब लोग खुद जुड़ते हैं. लाडली फाउंडेशन ने कई ऐसे काम किए हैं जो अलग नजर आते हैं.
साल 2017 में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में “रन फॉर लाडली” मैराथन का आयोजन हुआ. इसमें करीब 25 हजार पुरुष शामिल हुए. इसका मकसद था महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुरुषों को आगे लाना.
देवेंद्र कहते हैं कि अक्सर शादी के बाद अगर लड़की बीमार हो जाए तो उसे ही दोष दिया जाता है. वे इस सोच को बदलना चाहते हैं.
उन्होंने “सस्टेनेबल कन्या पूजन” पहल के जरिए कन्या पूजन की परंपरा को नया रूप दिया. इसकी शुरुआत 10 अगस्त 2019 को हुई. इसमें लोगों से कहा जाता है कि वे सिर्फ एक दिन के लिए नहीं, बल्कि नौ साल तक एक बच्ची की जिम्मेदारी लें. उसकी पढ़ाई और स्वास्थ्य का ध्यान रखें.
यह मॉडल बहुत सफल हुआ. कई परिवारों ने इस पहल को अपनाया और उन बच्चियों को अपनी बेटी की तरह मानने लगे. उनकी पढ़ाई और भविष्य की जिम्मेदारी ली.
देवेंद्र कहते हैं, “हम लोगों से कहते हैं कि पैसे देने से ज्यादा जरूरी है समय देना. अगर आप खुद जुड़ेंगे तो असली बदलाव आएगा.”
30 लाख लोगों की ज़िंदगी बदली
आज लाडली फाउंडेशन का असर 30 लाख से ज्यादा बच्चों और महिलाओं तक पहुंच चुका है. यह आंकड़ा सिर्फ नंबर नहीं है. यह लाखों कहानियों का संग्रह है.
इस काम के लिए उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली. लेकिन उनके लिए असली सफलता कुछ और है.
वे कहते हैं, “सफलता यह नहीं है कि आप कितने बड़े बन गए. सफलता यह है कि आपने कितनी जिंदगियां बदलीं. और कितनी मुस्कानें कायम रखीं.”
लाडली फाउंडेशन ने USAID और राज्य सरकारों के साथ मिलकर कई काम किए हैं. इसमें टीकाकरण अभियान, कोविड वैक्सीनेशन और टीबी जैसी बीमारियों के खिलाफ जागरूकता शामिल है. स्कूलों में पुलिस के साथ मिलकर जेंडर संवेदनशीलता पर भी काम किया गया है ताकि लड़कियों को सुरक्षित माहौल मिल सके.
अब यह संस्था और आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है. बताया जा रहा है कि यह UN में जनरल कंसल्टेटिव स्टेटस पाने की दिशा में काम कर रही है. साथ ही अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में भी विस्तार की योजना है.
युवाओं के लिए खास संदेश
देवेंद्र अपनी जिंदगी के दर्द को भूलना नहीं चाहते. उनके लिए वह दर्द ही उनकी ताकत है. वे कहते हैं, “वह संघर्ष ही मेरी पूंजी है. अगर मैं उसे भूल जाऊं, तो शायद मैं खुद को भी भूल जाऊंगा. वही संघर्ष मुझे जमीन से जोड़े रखता है.”
उनकी यही सोच उन्हें बाकी लोगों से अलग बनाती है. वह कभी अपने अतीत से भागते नहीं. बल्कि उसी से सीख लेते हैं.
आज के युवाओं के लिए देवेंद्र का साफ संदेश है. वे कहते हैं, “सौ पौधे लगाने की जरूरत नहीं है. एक पौधा लगाइए, लेकिन उसे पेड़ बनाइए. वही असली बदलाव है. बड़ा काम करने के बारे में मत सोचो. बस एक अच्छा काम करो. एक जिंदगी बदलो. वही काफी है.”
उनका मानना है कि अगर हर व्यक्ति एक इंसान की मदद कर दे, तो समाज खुद बदल जाएगा.
देवेंद्र कुमार की कहानी हमें यह सिखाती है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर इरादा मजबूत हो तो बदलाव संभव है.
एक बच्चा जिसे जिंदगी ने शुरुआत में ही ठुकरा दिया था, आज वही बच्चा लाखों लोगों के लिए सहारा बन गया है.
यह कहानी सिर्फ प्रेरणा नहीं है. यह एक आईना है. जो हमें दिखाती है कि असली सफलता क्या होती है. और शायद यही वजह है कि देवेंद्र जैसे लोग हमें यह याद दिलाते हैं कि इंसानियत अभी जिंदा है.



