भारत में घटता भूजल भंडार: पुनर्भरण की चुनौतियां और समाधान
हर साल हमारे पास जितना पानी होता है, उसका सिर्फ़ 39% हिस्सा ही दोबारा ज़मीन में डालकर (पुनर्भरण करके) भूजल बनाया जा सकता है. लेकिन पीने और खेती के लिए हम ज़्यादातर इसी भूजल पर निर्भर हैं. यानी भूजल की मांग बहुत ज़्यादा है, लेकिन उसे फिर से भरने का स्रोत सीमित है.
भारत की पेयजल और खाद्य सुरक्षा के लिए भूजल पर अत्यधिक निर्भरता एक गंभीर वास्तविकता है, जिसे वैश्विक स्तर पर भी स्वीकार किया गया है. भारत उन कुछ देशों में से एक है जहां हर साल सरकार द्वारा पूरे देश में भूजल पुनर्भरण (रीचार्ज) का मूल्यांकन सावधानीपूर्वक किया जाता है. हर साल हमारे पास जितना पानी होता है, उसका सिर्फ़ 39% हिस्सा ही दोबारा ज़मीन में डालकर (पुनर्भरण करके) भूजल बनाया जा सकता है. लेकिन पीने और खेती के लिए हम ज़्यादातर इसी भूजल पर निर्भर हैं. यानी भूजल की मांग बहुत ज़्यादा है, लेकिन उसे फिर से भरने का स्रोत सीमित है.
भारत में 1960 के दशक में हरित क्रांति के समय भूजल की अपार संभावनाएं सामने आईं. उस समय यह आम मान्यता थी कि भूजल हमारे लिए पर्याप्त है और सूखे या कम वर्षा के दौरान भी इसकी कोई कमी नहीं होगी. हालांकि सरकार द्वारा दी गई सब्सिडी वाली बिजली, सस्ती ड्रिलिंग तकनीक, कुएं बनाने की सामग्री की उपलब्धता और भूजल निकासी पर किसी भी तरह के नियम के अभाव ने भूजल के अत्यधिक दोहन को बढ़ावा दिया.
‘जल जीवन मिशन’ जैसी नई सरकारी योजनाएं, तेज़ी से हो रहा शहरीकरण और सिंचाई का विस्तार करने की कोशिशें आने वाले दशकों में हमारे भूजल पर निर्भरता को और बढ़ाएंगी. वहीं, जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के वितरण में अनिश्चितता और तापमान में वृद्धि से भूजल के सतत उपयोग के लिए नीतियों और योजना-निर्माण की प्रक्रिया और भी जटिल और चुनौतीपूर्ण हो जाएगी.
हर साल भूजल संसाधन का पुनर्भरण मुख्य रूप से मानसून और गैर-मानसून वर्षा से होता है. 2004 से 2024 के बीच, केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) ने नौ बार पुनर्भरण का आकलन किया, जिससे यह पता चला कि पुनर्भरण योग्य संसाधन 431 से 449 घन किमी (औसतन 438.4 घन किमी) के बीच रहा. यदि वार्षिक निकासी इस सीमा के भीतर रहती है तो यह पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित है. हालांकि, 2024 में भारत का लगभग 11% क्षेत्र ऐसा था जहां भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा था, यानी निकासी, पुनर्भरण से अधिक थी. अन्य 4% क्षेत्र में स्थिति गंभीर थी, क्योंकि वहां वार्षिक निकासी, पुनर्भरण का 90% से अधिक थी. अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों में भूजल गहराई से निकाला जाता है. चिंता की बात यह है कि गहरे भूजल का पुनर्भरण अत्यंत धीमी प्रक्रिया है, जो प्रायः सैकड़ों या हजारों वर्षों में संभव होता है.

सांकेतिक चित्र
अत्यधिक दोहन के कई दुष्प्रभाव हैं. सबसे तत्काल प्रभाव है मानसून से पहले और बाद के समय में जलस्तर में व्यापक उतार-चढ़ाव और लंबे समय में जलस्तर में गिरावट. अन्य प्रमुख प्रभाव हैं—गर्मियों के महीनों में कुओं की कम उत्पादकता और जल गुणवत्ता में गिरावट. अत्यधिक दोहन सिंचाई और पीने के पानी की आपूर्ति को प्रभावित करता है, साथ ही गहरे स्तर से पानी खींचने में अधिक ऊर्जा खर्च होने से कार्बन फुटप्रिंट भी बढ़ता है. यह कई सामाजिक समस्याओं को जन्म देता है, जैसे—किसानों के बीच बढ़ती असमानता. दरअसल, जब भूजल स्तर गिरता है, तो गरीब और सीमांत किसानों के उथले कुएं पहले सूख जाते हैं, जबकि समृद्ध किसानों के गहरे बोरवेल लंबे समय तक जल देते रहते हैं. इससे जल तक पहुंच में भारी भेदभाव उत्पन्न होता है. इसके साथ ही जल की गुणवत्ता गिरने से स्वास्थ्य समस्याएं सामने आती हैं और विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों के बीच प्रतिस्पर्धी मांग के कारण संघर्ष उत्पन्न होता है.
प्राचीन काल से ही दुनिया भर की सभ्यताएं जल संकट से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन पर निर्भर रही हैं. भारत में भी सैकड़ों वर्षों से प्रचलित अनेक जल संचयन पद्धतियां देखने को मिलती हैं. इनमें केरल के पठारी लेटराइट क्षेत्र में 'सुरंगम', बिहार के सीमा-स्थित जलोढ़ क्षेत्रों में 'अहर-पइन' प्रणाली, मध्य प्रदेश के बुरहानपुर की पहाड़ियों में भूमिगत सुरंगों से जुड़े 'कुओं की श्रृंखला', राजस्थान में 'टांका', और कर्नाटक में 'टैंक' आदि प्रमुख उदाहरण हैं.
हालांकि, सार्वजनिक विमर्श और सरकारी नीति हस्तक्षेपों ने वर्ष 1990 से 2010 के बीच घटते जलभृतों (Aquifers) के पुनर्भरण पर जोर देना शुरू किया, जबकि बड़े भूभागों को 'अतिदोहन' (Over-exploited) श्रेणी में चिह्नित किया गया. वर्ष 2009 में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन में पंजाब-हरियाणा और पाकिस्तान के सटे क्षेत्रों को वैश्विक भूजल दोहन के हॉटस्पॉट के रूप में दर्शाया गया. वर्ष 1992 से 2012 के दौरान, केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) ने विभिन्न प्रकार के जलभृत क्षेत्रों में 2599 प्रोटोटाइप कृत्रिम पुनर्भरण संरचनाएं बनाईं, जिन पर 1419.1 मिलियन रुपये (141.91 करोड़ रुपये) का निवेश किया गया, ताकि विभिन्न संरचनाओं की प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जा सके और उन्हें राज्य सरकारों के समक्ष प्रदर्शित किया जा सके. वर्ष 2009 में CGWB द्वारा 'कृत्रिम पुनर्भरण दिशानिर्देश पुस्तिका' (Manual of Artificial Recharge) प्रकाशित की गई, जिससे इन प्रोटोटाइप डिज़ाइनों को व्यापक रूप से साझा किया जा सके.
भारत सरकार ने 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) लागू किया, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका सुरक्षा बढ़ाना है, जिसके तहत परिवार के किसी एक सदस्य को एक वित्तीय वर्ष में 100 दिनों का मजदूरी कार्य दिया जाता है. MGNREGA के तहत स्वीकृत कार्यों में से लगभग 75% कार्य वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण से जुड़े हुए हैं.
एक अन्य योजना 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि (2007-12) के दौरान शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य सिंचाई कुओं के माध्यम से भूजल का पुनर्भरण करना था और इसका लाभ छोटे और सीमांत किसानों को देना था. इस योजना के तहत हार्ड रॉक जलभृत क्षेत्रों में 1180 अत्यधिक दोहन, गंभीर और अर्द्ध-गंभीर खंडों को शामिल किय गया और कुल अनुमानित लागत 17,980 मिलियन रुपये (1,798 करोड़ रुपये) थी.

सांकेतिक चित्र
भूजल संसाधन के पुनर्जीवन की दिशा में गति तब और तेज़ हुई जब सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों और निजी संगठनों ने विशेष रूप से कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) फंडिंग के माध्यम से मिलकर प्रयास करने शुरू किए. जल प्रबंधन के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाली अनेक सिविल सोसायटियों ने जल बजटिंग के ज़रिए गांव-स्तर पर विकेंद्रीकृत जल संसाधन प्रबंधन को सशक्त किया, जिसका उद्देश्य जल संरक्षण और जलभृत पुनर्भरण भी था. अब पूरे भारत में भूजल संसाधनों के प्रबंधन में हितधारकों की भागीदारी और समुदाय की सक्रिय सहभागिता का महत्व व्यापक रूप से महसूस किया जा रहा है.
ऐसी पहलों का असर दिखने लगा है और भूजल में सकारात्मक सुधार दिखाई देने लगे हैं. सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण-आधारित उपग्रह डेटा और स्थल पर जल स्तर विश्लेषण के आधार पर किए गए अनुसंधान में यह संकेत मिला कि जल स्तर में गिरावट की प्रवृत्ति में उलटफेर आया है. गुजरात जैसे राज्यों में जहां 1996 से 2001–2002 के बीच भूजल स्तर गिर रहा था, वहीं 2002–03 से 2014 के बीच उसमें औसतन 2.04±0.20 घन किमी प्रतिवर्ष की दर से सुधार दर्ज किया गया. हालांकि, ऐसे सुधार स्थानीय स्तर पर सीमित और खंडित (patchy) रूप में ही दर्ज किए गए हैं. देशभर से प्राप्त अवलोकनों के आधार पर यह राय बन रही है कि कृत्रिम पुनर्भरण पर किया गया निवेश अपेक्षित लाभ नहीं दे रहा है और इसके परिणाम सीमित हैं.
भारत सरकार ने वर्ष 2012 में 'राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण एवं प्रबंधन कार्यक्रम' (NAQUIM) की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य 1:50000 के स्केल पर जलभृत की आकृति की त्रि-आयामी समझ विकसित करना, जल स्तर के स्थानिक व्यवहार, भूजल गुणवत्ता, जलभृत की हाइड्रोलिक विशेषताओं तथा पुनर्भरणीय व स्थैतिक भूजल संसाधनों की गतिशीलता का आकलन करना था. यह कार्यक्रम 2.59 मिलियन वर्ग किलोमीटर के लक्ष्य क्षेत्र में वर्ष 2023 तक पूर्ण कर लिया गया. अकादमिक अनुसंधानों के परिणामों से मेल खाते इस साक्ष्य-आधारित कार्यक्रम के निष्कर्षों के आधार पर अब नीति-निर्माण में यह मान्यता उभर रही है कि जल आपूर्ति से संबंधित उपायों के साथ-साथ, बल्कि उनसे भी अधिक, जल मांग को नियंत्रित करने वाले उपायों की आवश्यकता है. प्रमुख मांग-आधारित हस्तक्षेपों में कम जल-खपत वाली फसलों की ओर फसल चक्र में बदलाव और सिंचाई दक्षता में सुधार की सिफारिश की गई है. इन निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2018 में 'अटल भूजल योजना' (ABY) की शुरुआत की, जिसे सात अति-दोहन ग्रस्त राज्यों—हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश—में लागू किया गया. इस योजना के तहत प्रत्येक गांव में समुदाय की भागीदारी से 'जल सुरक्षा योजना' तैयार और अपनाई जाती है, जिसमें मांग-आधारित उपायों को प्राथमिकता दी जाती है.
NAQUIM का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भूजल पुनर्भरण के लिए स्रोत जल की भारी कमी है. वर्ष 2013 में तैयार और 2020 में अपडेट किए गए 'कृत्रिम पुनर्भरण हेतु मास्टर प्लान' ने इस समस्या को विशेष रूप से रेखांकित किया. भारत में असंतृप्त जलभृतों को पूरी तरह से फिर से भरने के लिए उपयुक्त गुणवत्ता वाले जल की मात्रा का अनुमान 716.92 घन किलोमीटर लगाया गया है, जबकि पुनर्भरण के लिए उपलब्ध गैर-प्रतिबद्ध सतही जल की मात्रा मात्र 185.09 घन किलोमीटर है. यह स्थिति उन राज्यों में और भी गंभीर है जहां भूजल का अति-दोहन हो रहा है. उदाहरण के लिए हरियाणा और कर्नाटक को लें, जहां क्रमशः उच्च संभावनाशील सॉफ्ट रॉक और निम्न संभावनाशील हार्ड रॉक जलभृत पाए जाते हैं, तथा औसत वार्षिक वर्षा क्रमशः 590 मिमी और 1248 मिमी है.
असंतृप्त जलभृतों को पूरी तरह से पुनर्भरित करने के लिए हरियाणा को 103.69 घन किमी और कर्नाटक को 13.61 घन किमी जल की आवश्यकता है, जबकि वास्तव में उपलब्ध गैर-प्रतिबद्ध जल मात्र 0.68 घन किमी (हरियाणा) और 12.87 घन किमी (कर्नाटक) है, जिसे पुनर्भरण के लिए विशेष रूप से उपयोग में लाया जा सकता है.
अन्य मुद्दा यह है कि पुनर्भरण संरचनाओं का रख-रखाव न होने के कारण उनका लाभ घट जाता है. वर्षा जल संचयन संरचनाओं में जो सतही प्रवाह एकत्र किया जाता है या पुनर्भरण संरचनाओं की ओर मोड़ा जाता है, वह अक्सर गाद और मिट्टी से भरा होता है जिसे पर्याप्त रूप से साफ नहीं किया जाता, जिससे संरचनाएं जाम हो जाती हैं.
हालांकि मांग-आधारित हस्तक्षेपों की महत्ता को हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते, फिर भी वर्षा जल संचयन की क्षमता को कम नहीं आंका जाना चाहिए, क्योंकि इसमें पुनर्भरण एक अतिरिक्त लाभ के रूप में मिलता है. कृत्रिम पुनर्भरण भी भारत में सतत भूजल उपयोग के लिए आवश्यक है. शोधकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा में समय आधारित अस्थिरता बढ़ने के चलते प्राकृतिक पुनर्भरण में कमी का संकेत दिया है. यह परिस्थिति कृत्रिम पुनर्भरण द्वारा नवीकरणीय भूजल संसाधन को बढ़ाने की आवश्यकता को दोहराती है.
स्रोत जल की कमी को आंशिक रूप से उपचारित अपशिष्ट जल (treated wastewater) के उपयोग से हल किया जा सकता है, जिसे शहरी क्षेत्रों के आसपास पुनर्भरण के लिए एकत्र किया जा सकता है. ये शहरी क्षेत्र आज कई मामलों में “भूजल सिंक” बन चुके हैं. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 2021 के अनुमान के अनुसार, शहरी क्षेत्रों से 29,219 MLD अपशिष्ट जल उत्पन्न होता है. शहरी अपशिष्ट जल के उपयोग को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नीति रूपरेखा अब तक विकसित नहीं हो सकी है, हालांकि कर्नाटक जैसे कुछ अग्रणी राज्यों ने इस दिशा में पहल की है. कर्नाटक में बेंगलुरु महानगर से प्रतिदिन लगभग 440 मिलियन लीटर उपचारित अपशिष्ट जल को कोलार ज़िले तक पहुँचाया जा रहा है, जो कि भूजल के अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों में शामिल है. यह उपचारित जल वहां के 137 सिंचाई टैंकों को भरने के काम आता है, जिससे न केवल सिंचाई को सहयोग मिलता है, बल्कि भूजल पुनर्भरण को भी बढ़ावा मिलता है. यह पहल सतत जल प्रबंधन की दिशा में एक प्रभावी उदाहरण के रूप में उभर रही है.
उपचारित जल की गुणवत्ता नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के मानकों के भीतर पाई गई है, जिसमें जल निकायों और भूमि निपटान के लिए मानक तय किए गए हैं. शोध से पता चला है कि इससे भूजल पुनर्भरण में सुधार हुआ है और भूजल गुणवत्ता में कोई गिरावट नहीं आई है. हालांकि, विभिन्न जलभृत प्रकार और वाडोज़ ज़ोन (मृदा जल क्षेत्र) की विविध मोटाई को ध्यान में रखते हुए इस दिशा में और विस्तृत शोध की आवश्यकता है. उपचारित अपशिष्ट जल को सीधे जलभृतों में नहीं भेजना चाहिए.
वर्षा जल संचयन या भूजल पुनर्भरण संरचनाएं प्रायः एकल इकाई के रूप में विकसित की जाती हैं, जबकि समूचे जलग्रहण क्षेत्र (वॉटरशेड) को एक इकाई मानकर समग्र योजना नहीं बनाई जाती. इस कारण, ऊपरी और निचले क्षेत्रों (upstream-downstream) के बीच जल वितरण को लेकर टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. पुनर्भरण प्रयासों से सभी को अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने के लिए समन्वित और विज्ञान-आधारित योजना अपनाना आवश्यक है, जिसमें पूरे जलग्रहण क्षेत्र को शामिल कर रणनीति बनाई जाए.
समुदाय और हितधारकों की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है, जो ABY योजना क्षेत्रों में प्रमुख विचार है. यदि समुदाय योजना और कार्यान्वयन चरणों में भाग लेता है, तो न केवल संरचनाओं के प्रति स्वामित्व की भावना पैदा होती है, बल्कि उनके रख-रखाव के लिए एक वित्तीय मॉडल भी तैयार होता है.
अंतिम और महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि पुनर्भरण संरचनाओं के प्रकार और डिज़ाइन में आवश्यक बदलाव स्थानीय हाइड्रोजियोलॉजिकल परिस्थिति और भूजल स्तर के अनुसार किए जाने चाहिए, ताकि मानवीय हस्तक्षेप द्वारा भूजल पुनर्भरण के लाभों को पूरी तरह प्राप्त किया जा सके.
(images: AI generated)
(लेखक 'वॉटर फॉर पीपल इंडिया' नाम के एक एनजीओ के बोर्ड अध्यक्ष हैं और पूर्व में केंद्रीय भूजल बोर्ड के सदस्य भी रहे हैं. आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं. YourStory का उनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है.)
Edited by Ravi Pareek



