ISRO की नौकरी छोड़ शुरू की खजूर की खेती, कमा रहे 15 लाख का मुनाफा — दिवाकर चन्नप्पा की कहानी
दिवाकर चन्नप्पा ने ISRO की नौकरी छोड़ ऑर्गेनिक खजूर की खेती शुरू की. 4.5 लाख रुपये के निवेश से शुरू हुई यह खेती आज उन्हें सालाना 15 लाख रुपये तक का मुनाफा दे रही है. जानिए कैसे उन्होंने प्राकृतिक खेती से सफलता की नई मिसाल कायम की.
कर्नाटक के सगनहल्ली गांव के रहने वाले दिवाकर चन्नप्पा (Diwakar Channappa) की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो जिंदगी में कुछ अलग करना चाहते हैं. उन्होंने आरामदायक नौकरी छोड़ी और खेती का रास्ता चुना. आज वही फैसला उन्हें एक सफल ऑर्गेनिक किसान बना चुका है.
दिवाकर चन्नप्पा पहले बेंगलुरु स्थित Indian Space Research Organisation (ISRO) में प्रोजेक्ट साइंटिस्ट थे. उन्होंने सोशल वर्क में मास्टर्स की पढ़ाई भी की थी और तुमकुर यूनिवर्सिटी में विजिटिंग फैकल्टी के रूप में पढ़ाते भी थे. पढ़ाई और नौकरी दोनों अच्छी चल रही थीं, लेकिन उनके मन में हमेशा गांव और मिट्टी से जुड़ने की इच्छा थी.
उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव एक किताब की वजह से आया. जापान के प्रसिद्ध किसान और लेखक मसानोबू फुकुओका (Masanobu Fukuoka) की किताब ‘One Straw Revolution’ ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया. इस किताब में प्राकृतिक खेती और बिना रसायनों वाली खेती के बारे में बताया गया था. दिवाकर ने तय कर लिया कि वे खेती को नए तरीके से करेंगे.
जब उन्होंने खेती करने का फैसला लिया, तब परिवार ने इसका विरोध किया. उनके पिता खुद किसान थे और रागी, मक्का और तूर दाल की खेती करते थे. लेकिन खेती से कभी अच्छा मुनाफा नहीं हुआ था. ऐसे में परिवार को लगा कि अच्छी नौकरी छोड़ना सही फैसला नहीं है. फिर भी दिवाकर अपने फैसले पर टिके रहे.

शुरुआत में उन्होंने पारंपरिक खेती की. लेकिन बाद में उनका ध्यान खजूर की खेती की तरफ गया. बेंगलुरु में आयोजित एक कृषि मेले में उन्होंने तमिलनाडु में हो रही खजूर की खेती के बारे में जाना. उन्हें लगा कि कर्नाटक के उनके इलाके का मौसम भी काफी हद तक वैसा ही है. यहीं से उन्होंने कुछ नया करने का फैसला लिया.
साल 2009 में उन्होंने 2.5 एकड़ जमीन पर 150 बरही खजूर के पौधे लगाए. इसके लिए उन्होंने करीब 4.5 लाख रुपये का निवेश किया. उन्होंने अपने फार्म का नाम ‘मराली मन्निगे’ रखा, जिसका मतलब होता है ‘मिट्टी की ओर लौटना’.
दिवाकर ने शुरुआत से ही ऑर्गेनिक खेती पर भरोसा किया. उन्होंने खेती में किसी तरह के रासायनिक खाद या कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया. वे पंचगव्य और जीवामृत जैसे प्राकृतिक घोल खुद तैयार करते हैं. इससे मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है और फसल भी अच्छी होती है.
कई साल की मेहनत के बाद साल 2013 में उनकी पहली फसल तैयार हुई. उस समय 650 किलो खजूर का उत्पादन हुआ. उन्होंने इसे 375 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा. पहली कमाई ने उनका आत्मविश्वास बढ़ा दिया.
धीरे-धीरे उनका फार्म लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगा. अगस्त 2023 तक उनके फार्म में 102 खजूर के पेड़ थे. हर पेड़ से करीब 45 से 50 किलो तक ऑर्गेनिक बरही खजूर का उत्पादन हुआ. उस सीजन में कुल 4.2 टन खजूर की पैदावार हुई.
आज उनकी सालाना कुल कमाई करीब 15 लाख रुपये तक पहुंच जाती है.

दिवाकर की सफलता का सबसे बड़ा कारण उनकी सीधी बिक्री की रणनीति है. वे बीच के व्यापारियों पर निर्भर नहीं रहते. ग्राहक सीधे उनके फार्म से खरीदारी करते हैं. इससे किसानों और ग्राहकों के बीच भरोसा भी बनता है.
उनके फार्म में साल में दो बार हार्वेस्ट फेस्टिवल भी आयोजित होता है. इसमें बड़ी संख्या में लोग आते हैं. लोग खेती को करीब से देखते हैं और ऑर्गेनिक फार्मिंग को समझते हैं. इससे लोगों का जुड़ाव खेती और प्रकृति से बढ़ता है.
दिवाकर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं हैं. वे बच्चों को भी खेती और मिट्टी से जोड़ने का काम कर रहे हैं. वे बेंगलुरु के एक वैकल्पिक स्कूल ‘उद्भव’ के साथ मिलकर छात्रों को अपने फार्म पर बुलाते हैं. यहां बच्चे प्राकृतिक खेती को करीब से सीखते हैं.
आज दिवाकर चन्नप्पा उन लोगों के लिए मिसाल बन चुके हैं जो मानते हैं कि खेती में भविष्य नहीं है. उन्होंने दिखाया कि अगर नई सोच, धैर्य और मेहनत हो, तो खेती भी सम्मान और अच्छी कमाई का जरिया बन सकती है.



