Duroflex Success Story: कार सीट से मिला आइडिया, आज है 1150 करोड़ रुपये का बिजनेस
सिर्फ 3 लाख रुपये से शुरू हुई Duroflex आज 1,150 करोड़ रुपये रेवेन्यू वाली बड़ी स्लीप सॉल्यूशन कंपनी बन चुकी है. जानिए कैसे पीसी मैथ्यू ने जर्मनी से मिले एक आइडिया को भारत के सफल मैट्रेस ब्रांड में बदल दिया और कैसे कंपनी ने पूरे देश में अपनी पहचान बनाई.
भारत में आज मैट्रेस और स्लीप प्रोडक्ट्स का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. लोग अब अच्छी नींद को अपनी सेहत से जोड़कर देखने लगे हैं. लेकिन एक समय ऐसा भी था जब भारत में बेहतर मैट्रेस को लेकर ज्यादा जागरूकता नहीं थी. उसी दौर में एक व्यक्ति ने बड़ा सपना देखा और उस सपने ने आगे चलकर Duroflex जैसी बड़ी कंपनी को जन्म दिया.
की शुरुआत साल 1963 में हुई थी. इस कंपनी की नींव पीसी मैथ्यू (PC Mathew) ने केरल के अल्लेप्पी शहर में रखी थी. उस समय उन्होंने सिर्फ 3 लाख रुपये के निवेश से अपना कारोबार शुरू किया था. यह सफर आसान नहीं था, लेकिन उनके विजन और मेहनत ने धीरे धीरे इस छोटे बिजनेस को देश की बड़ी स्लीप सॉल्यूशन कंपनी बना दिया.
दरअसल, पीसी मैथ्यू के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब वह 1960 के दशक में जर्मनी गए. वहां उन्होंने देखा कि रबराइज्ड कोयर का इस्तेमाल कार सीट बनाने में किया जा रहा है. उसी समय उनके मन में विचार आया कि इस तकनीक का इस्तेमाल मैट्रेस बनाने में भी किया जा सकता है.
भारत लौटने के बाद उन्होंने इस आइडिया पर काम शुरू किया. उन्होंने अल्लेप्पी की एक शांत जगह पर, नहर के किनारे अपना छोटा सा यूनिट लगाया. उस दौर में लोगों को यह भरोसा दिलाना आसान नहीं था कि कोयर मैट्रेस भी आरामदायक हो सकते हैं. बाजार में इसकी मांग बहुत कम थी. लेकिन मैथ्यू अपने फैसले को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थे.
उन्होंने ऑस्ट्रिया से मैट्रेस बनाने की मशीनें मंगवाईं. उस समय भारत में इंपोर्ट से जुड़े कई नियम और सीमाएं थीं. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने मशीनों को स्थानीय स्तर पर फिर से डिजाइन करके अपने हिसाब से तैयार किया. यही जज्बा आगे चलकर Duroflex की सबसे बड़ी ताकत बना.
शुरुआती दिनों में भारतीय सरकार ने भी Duroflex को बड़ा समर्थन दिया. कंपनी को अस्पतालों के बेड, युद्धक टैंकों की सीट और रेलवे कोच की फर्निशिंग के ऑर्डर मिलने लगे. इन ऑर्डर्स ने कंपनी को बाजार में पहचान दिलाई और कारोबार को स्थिरता मिली.
समय के साथ Duroflex ने लगातार खुद को बदलते बाजार के अनुसार ढाला. कंपनी ने केवल मैट्रेस तक खुद को सीमित नहीं रखा. उसने फर्नीचर, बेड लिनेन, पिलो और कई अन्य स्लीप प्रोडक्ट्स की कैटेगरी में भी कदम रखा.

मैथ्यू जॉर्ज, Executive Director, Duroflex
आज कंपनी की कमान तीसरी पीढ़ी के उद्यमी मैथ्यू जॉर्ज (Mathew George) के हाथों में है. उन्होंने Duroflex को आधुनिक सोच और नई रणनीतियों के साथ आगे बढ़ाया. डिजिटल प्लेटफॉर्म और नए ग्राहकों की जरूरतों को समझते हुए कंपनी ने अपने प्रोडक्ट्स को लगातार अपडेट किया.
साल 2018 में Duroflex को बड़ा निवेश भी मिला. Lighthouse Fund ने कंपनी में 22 मिलियन डॉलर का निवेश किया. इस फंडिंग ने कंपनी को तेजी से विस्तार करने में मदद की.
आज Duroflex का नाम भारत के बड़े मैट्रेस ब्रांड्स में लिया जाता है. क्रिकेट स्टार विराट कोहली भी इस ब्रांड का प्रचार करते हैं. कंपनी अपने प्रोडक्ट्स वेबसाइट, ऑफलाइन स्टोर्स और ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म जैसे Amazon, Flipkart और Pepperfry के जरिए बेचती है.
Duroflex के पास आज करीब 800 कर्मचारियों की टीम है. साथ ही पूरे देश में 6000 से ज्यादा रिटेल पार्टनर्स का मजबूत नेटवर्क भी है. यही वजह है कि कंपनी ने छोटे शहरों से लेकर बड़े महानगरों तक अपनी पहुंच बना ली है.
अगर कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन की बात करें तो 31 मार्च 2025 को खत्म हुए वित्त वर्ष में Duroflex ने 1,150 करोड़ रुपये का रेवेन्यू हासिल किया. यह उपलब्धि दिखाती है कि कंपनी ने सही रणनीति, मजबूत लागत प्रबंधन और ग्राहकों के भरोसे के दम पर खुद को लगातार मजबूत बनाया है.
Duroflex की कहानी सिर्फ एक कंपनी की सफलता नहीं है. यह उस सोच की कहानी है जिसमें एक व्यक्ति ने नया आइडिया देखा, जोखिम लिया और कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी. यही वजह है कि आज Duroflex भारत की स्लीप इंडस्ट्री में एक बड़ा नाम बन चुकी है.



