स्टार्टअप को चाहिए सही CXO? जानिए कैसे Grassik Search हायर करती है कंपनियों के लिए सीनियर लीडर
1993 में एक बेडरूम से शुरू हुई Grassik Search की दिलचस्प कहानी. कंपनी ने Coca Cola और McDonald's जैसी बड़ी कंपनियों के लिए हायरिंग की. आज साहिल ठाकुर की अगुवाई में यह स्टार्टअप्स के लिए CXO और सीनियर लीडर्स की हायरिंग करती है. जानिए कंपनी का अब तक का सफर और आगे की योजनाएं.
किसी कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ एक अच्छा आइडिया, मजबूत प्रोडक्ट या पर्याप्त फंडिंग ही काफी नहीं होती. जैसे-जैसे बिजनेस बड़ा होता है, उसके सामने एक नई चुनौती खड़ी होती है कि अब उसे आगे ले जाने के लिए किस तरह के लोगों की जरूरत होगी.
शुरुआती दौर में एक स्टार्टअप को ऐसे लोगों की जरूरत हो सकती है जो तेजी से फैसले लें और एक साथ कई जिम्मेदारियां संभाल सकें. लेकिन जब वही कंपनी बड़े बिजनेस में तब्दील होने लगती है, तो प्रॉफिटेबिलिटी, गवर्नेंस, कैपिटल एफिशिएंसी और बड़े लेवल पर ऑपरेशंस को मैनेज करने वाले सीनियर लीडर्स की जरूरत बढ़ जाती है.
यहीं से एग्जीक्यूटिव सर्च (executive search) की भूमिका अहम हो जाती है. सवाल सिर्फ किसी खाली पद को भरने का नहीं होता, बल्कि यह समझने का होता है कि कंपनी जिस दौर में है, उसके अगले पड़ाव के लिए उसे किस तरह की लीडरशिप की जरूरत है.
दिल्ली की एक जॉइंट फैमिली में पले-बढ़े साहिल ठाकुर ने बिजनेस और लीडरशिप से जुड़े इन सवालों को काफी करीब से देखा है. माता-पिता को अपना बिजनेस शुरू करते, संघर्ष करते और उसे आगे बढ़ाते देखने के बाद उन्होंने भी बिजनेस की दुनिया को अपना करियर बनाया.
आज साहिल ठाकुर Grassik Search में डायरेक्टर और हेड ऑफ टेक-एनेबल्ड बिज़नेसेज़ की भूमिका निभा रहे हैं. उनके माता-पिता ने 1993 में एक बेडरूम से इस कंपनी की शुरुआत की थी. तीन दशक बाद Grassik Search का सफर भारत के बदलते कॉर्पोरेट और स्टार्टअप इकोसिस्टम के साथ-साथ लीडरशिप हायरिंग में आए बदलाव की भी कहानी बन चुका है.
करियर और फैमिली बिजनेस
साहिल ने स्कूल की पढ़ाई के बाद बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में ग्रेजुएशन किया और फिर MBA किया.
उनकी पहली नौकरी ITC Hotels के HR डिपार्टमेंट में थी. करीब दो साल काम करने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि न तो होटल इंडस्ट्री और न ही HR फील्ड उनकी मंजिल है.
MBA के दौरान उन्हें दो प्री-प्लेसमेंट ऑफर मिले. एक ग्लोबल लिकर ब्रांड से और दूसरा अमेरिकी स्टार्टअप Groupon से. साहिल ने Groupon को चुना. उस समय कंपनी भारत में अपना बेस तैयार कर रही थी और उनके लिए यह तेजी से बढ़ते बिजनेस को करीब से देखने का मौका था.
करीब तीन साल बाद उन्होंने फैमिली बिजनेस से जुड़ने का फैसला किया.
YourStory से बात करते हुए साहिल बताते हैं, “मेरे लिए Grassik Search में आना सिर्फ फैमिली बिजनेस से जुड़ना नहीं था. मैं यह समझना चाहता था कि ऑन्त्रप्रेन्योरशिप वास्तव में कैसे काम करती है. Groupon में मैंने तेजी से बढ़ते बिजनेस को देखा था, लेकिन खुद का बिजनेस चलाने की जिम्मेदारी अलग होती है. जब मैंने Grassik जॉइन किया, तब समझ आया कि किसी कंपनी को सफल बनाने के लिए सिर्फ अच्छे आइडिया नहीं, बल्कि लगातार फैसले, धैर्य और सही लोगों की जरूरत होती है.”

बेडरूम से शुरू हुई Grassik Search
Grassik Search की शुरुआत 1 फरवरी 1993 को राजीव ठाकुर और उनकी पत्नी गीता ने की थी. शुरुआत एक बेडरूम से हुई थी.
राजीव ठाकुर पहले मरीन इंजीनियर थे और मर्चेंट नेवी में 16 साल काम कर चुके थे. इसके बाद उन्होंने होटल और इंजीनियरिंग सेक्टर में काम किया. वह Holiday Inn Crowne Plaza New Delhi जैसे प्रोजेक्ट से भी जुड़े रहे और बाद में Gillette में इंजीनियरिंग की जिम्मेदारी संभाली.
इसके बाद राजीव ठाकुर ने अपनी टेक्निकल कंसल्टेंसी शुरू की. एक डच कंपनी के लिए भारत में ऑटोमेटिक मशरूम प्लांट लगाने के प्रोजेक्ट पर काम किया. इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी के साथ सर्च बिजनेस शुरू किया.
कंपनी ने हॉस्पिटैलिटी और मीडिया सेक्टर में हायरिंग से शुरुआत की. शुरुआती वर्षों में उसे कई बड़े अवसर मिले. Grassik ने Coca Cola की भारत में एंट्री के दौरान हायरिंग में मदद की. बाद में McDonald's के लिए भी काम किया.
1996 में टेलीकॉम इंडस्ट्री का प्राइवेटाइजेशन होने के बाद कंपनी ने इस सेक्टर में भी सर्च असाइनमेंट किए. वर्ष 2000 में Grassik ने डिफेंस कॉलोनी में अपने कॉर्पोरेट ऑफिस खोला और 2006 में प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनी.
साहिल कहते हैं, “मेरे माता-पिता ने जिस दौर में यह कंपनी शुरू की थी, उस समय भारत में एग्जीक्यूटिव सर्च आज जितना विकसित नहीं था. उन्होंने अलग-अलग इंडस्ट्री के लिए विशेषज्ञता तैयार की. शुरुआत से ही बिजनेस को केवल हायरिंग तक सीमित नहीं रखा गया. आइडिया यह था कि हर कंपनी को उसके बिजनेस और जरूरत के हिसाब से सही लीडर मिले. यही सोच समय के साथ हमारी लाइफस्टाइल का अहम हिस्सा बन गई.”
स्टार्टअप्स के लिए कैसे होती है लीडरशिप की हायरिंग?
साहिल 2014 में फैमिली बिजनेस से जुड़े. इसके बाद 2015 में उन्होंने टेक्नोलॉजी से जुड़े बिजनेस की प्रैक्टिस शुरू की. उनका फोकस तेजी से बढ़ते स्टार्टअप्स और टेक बिजनेस पर था. आज इस डिविजन को साहिल मैनेज करते हैं, जबकि कंपनी का पारंपरिक कारोबार उनके बड़े भाई सिद्धार्थ संभालते हैं.
Grassik का काम मुख्य रूप से सीनियर और लीडरशिप लेवल की हायरिंग से जुड़ा है. कंपनी के मुताबिक, प्रक्रिया केवल जॉब डिस्क्रिप्शन देखकर उम्मीदवार ढूंढने तक सीमित नहीं है. इसमें कंपनी के बिजनेस, उसकी मौजूदा स्थिति और उस रोल की वास्तविक जरूरत को समझना शामिल होता है.
इसके बाद ऐसे उम्मीदवारों तक पहुंचने की कोशिश की जाती है, जिनका अनुभव और काम करने का तरीका उस रोल से मेल खा सकता हो.
साहिल कहते हैं, “हमारे लिए एग्जीक्यूटिव सर्च केवल किसी खाली पद को भरने की प्रक्रिया नहीं है. हमें पहले यह समझना पड़ता है कि कंपनी किस दौर से गुजर रही है और उसे किस तरह की लीडरशिप की जरूरत है. कई बार सबसे अच्छा उम्मीदवार वह नहीं होता जिसके पास सबसे बड़ा ब्रांड नाम हो. सही व्यक्ति वह होता है जिसकी क्षमता, अनुभव और काम करने का तरीका कंपनी की मौजूदा जरूरत से मेल खाता हो.”
कंपनी पूरी तरह बूटस्ट्रैप्ड रही है और यानि इसने अब तक किसी भी बाहरी इन्वेस्टर से फंडिंग नहीं जुटाई है. इसका बिजनेस अपने आंतरिक संसाधनों और कमाई के आधार पर बढ़ा है. कंपनी रिटेनर-बेस्ड और कंटिजेंट सर्च वाले हाइब्रिड मॉडल पर काम करती है.
कंपनी प्रोफिटेबल होने का दावा करती है और पिछले वर्षों में करीब 15 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज कर रही है.

Grassik Search की टीम
स्टार्टअप्स में CXO की बदलती भूमिका
भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में पिछले एक दशक के दौरान लीडरशिप हायरिंग में काफी बदलाव आया है.
2015 और 2016 के आसपास कई स्टार्टअप शुरुआती प्रयोग के दौर में थे. उस समय ऐसे लोगों की मांग ज्यादा थी, जो तेजी से काम कर सकें और एक साथ कई जिम्मेदारियां संभाल सकें. प्रतिष्ठित संस्थानों की डिग्री और टेक्नोलॉजी की समझ को भी काफी महत्व दिया जाता था.
लेकिन जैसे-जैसे स्टार्टअप बड़े हुए, निवेशकों और बोर्ड की अपेक्षाएं भी बदलने लगीं. अब केवल तेज ग्रोथ काफी नहीं है. मुनाफा, गवर्नेंस, रिस्क मैनेजमेंट और फंडिंग का सही इस्तेमाल भी उतना ही अहम हो गया है. कंपनियां अब ऐसे लीडर्स को तलाश रही हैं, जो बिजनेस की बारीकियों को समझते हों और बड़े लेवल पर ऑपरेशंस मैनेज कर सकें.
साहिल कहते हैं, “आज फाउंडर्स और इनवेस्टर्स ऐसे लीडर्स की तलाश में हैं जो जमीन से जुड़े हों और एग्जीक्यूशन को समझते हों. सिर्फ बड़ी रणनीति बनाना काफी नहीं है. CXO को प्रॉफिटेबिलिटी, कैपिटल एफिशिएंसी और मार्जिन्स की साफ समझ होनी चाहिए. उन्हें बड़ी कंपनी की संस्थागत सोच और स्टार्टअप की तेजी, दोनों के साथ काम करना आना चाहिए.”
उनके मुताबिक, लीन टीम्स, ऑटोमेशन और AI का इस्तेमाल भी अब लीडरशिप की क्षमता का अहम हिस्सा बनता जा रहा है.
सीनियर लीडर्स के लिए भावनात्मक मजबूती भी जरूरी हो गई है. बाजार तेजी से बदलता है, बोर्ड की अपेक्षाएं बढ़ती हैं और कंपनियों को कई बार अलग-अलग चरणों से गुजरना पड़ता है. ऐसे में लीडर को यह समझना होता है कि कंपनी किस दौर में है और उस समय किस तरह के फैसले जरूरी हैं.
AI के दौर में भी इंसानी समझ क्यों जरूरी है?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने एग्जीक्यूटिव हायरिंग की प्रक्रिया को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है. उम्मीदवारों की प्रोफाइलिंग, टैलेंट मैपिंग और शुरुआती आकलन जैसे काम अब टेक्नोलॉजी की मदद से तेजी से किए जा सकते हैं.
कंपनियां डेटा के जरिए उम्मीदवारों के अनुभव और क्षमता को बेहतर तरीके से समझने की कोशिश कर रही हैं.
हालांकि साहिल मानते हैं कि AI पूरी प्रक्रिया का विकल्प नहीं बन सकता.
सीनियर लीडरशिप की हायरिंग में अनुभव, व्यवहार, सोच और व्यक्ति की परिस्थितियों को समझने के लिए इंसानी नजरिया जरूरी है. खासकर तब, जब किसी कंपनी को ऐसे व्यक्ति की तलाश हो, जो मुश्किल परिस्थितियों में फैसले ले सके.
साहिल कहते हैं, “AI एग्जीक्यूटिव हायरिंग को तेज और ज्यादा डेटा-ड्रिवन बना रहा है, लेकिन लीडरशिप असेसमेंट को पूरी तरह मशीन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. टेक्नोलॉजी उम्मीदवारों के बारे में पैटर्न और जानकारी दे सकती है. लेकिन किसी व्यक्ति की सोच, उसकी मैच्योरिटी, दबाव में फैसले लेने की क्षमता और कंपनी के साथ उसका वास्तविक तालमेल समझने के लिए ह्यूमन इंटरवेंशन जरूरी है. खासकर सीनियर लीडरशिप हायरिंग में यह गहराई बहुत अहम होती है.”
आगे की राह और नई चुनौतियां
Grassik के सामने कई चुनौतियां भी आई हैं. कंपनी के लिए अलग-अलग सेक्टर से सही लोगों को टीम में शामिल करना और उन्हें एग्जीक्यूटिव सर्च के काम के लिए तैयार करना आसान नहीं रहा. इसमें समय लगता है.
आने वाले वर्षों में Grassik नए इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स को टीम से जोड़ने की योजना बना रही है. कंपनी एक या दो नए वर्टिकल्स में कदम रखने की तैयारी कर रही है. इसके साथ ही टियर 1 शहरों के बाहर बढ़ती मांग पर भी फोकस है.
साहिल कहते हैं, “जो लोग स्टार्टअप में काम करना चाहते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि वहां हर काम के लिए पहले से तय नियम या स्पष्ट योजना नहीं होती. कई बार आपको ऐसी परिस्थितियों में काम करना पड़ता है, जहां आगे का रास्ता पूरी तरह साफ नहीं होता. साथ ही, कई मौकों पर आपकी जिम्मेदारियां आपके तय KRA से भी ज्यादा बड़ी हो सकती हैं.”
उनके मुताबिक, स्टार्टअप लीडरशिप में फर्स्ट प्रिंसिपल्स थिंकिंग और लगातार सीखने की क्षमता काफी महत्वपूर्ण है.
तीन दशक पहले एक बेडरूम से शुरू हुई Grassik Search की यात्रा आज भारत के बदलते कॉर्पोरेट और स्टार्टअप इकोसिस्टम के साथ आगे बढ़ रही है.
आने वाले वर्षों में AI और ऑटोमेशन एग्जीक्यूटिव हायरिंग की प्रक्रिया को और बदल सकते हैं. लेकिन किसी कंपनी की दिशा तय करने वाले व्यक्ति की सोच, उसके फैसलों और उसके काम करने के तरीके को समझने की जरूरत शायद बनी रहेगी.



