कभी साइकिल से की दवाइयों की डिलीवरी, आज हैं मेडिकल बिज़नेस के मालिक—हापुड़ के प्रेमचंद सैनी की कहानी
हापुड़ के प्रेमचंद सैनी की प्रेरक कहानी, जिन्होंने मेहनत और सीख के दम पर मेडिकल स्टोर शुरू किया. उत्तर प्रदेश सरकार की CM YUVA Yojana से मिले लोन ने स्टॉक और सप्लाई मजबूत की. पढ़िए छोटे शहर में स्थिर कारोबार खड़ा करने का सफर.
हापुड़ ज़िले के रहने वाले प्रेमचंद सैनी ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद साइंस की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान उन्हें लगा कि नियमित नौकरी के मौके बहुत सीमित हैं. घर चलाने की ज़रूरत थी, इसलिए उन्होंने एक मेडिकल स्टोर पर काम करना शुरू किया. तनख्वाह कम थी, लेकिन काम ने बहुत कुछ सिखाया.
धीरे धीरे उन्होंने समझा कि दवाइयां कहां से आती हैं. सप्लाई कैसे होती है. मुनाफा कैसे निकलता है. ग्राहक और सप्लायर के साथ भरोसा कैसे बनता है. यह नौकरी उनके लिए क्लासरूम बन गई. बिना किसी किताब के, ज़मीनी सीख.
कुछ समय बाद उन्होंने तय किया कि अब इस सीख को औपचारिक रूप देना ज़रूरी है. उन्होंने बी फार्मा में दाखिला लिया और कई सालों में यह कोर्स पूरा किया. डिग्री मिलने के बाद भी नौकरी आसान नहीं थी. तब तक एक बात साफ हो चुकी थी. अगर ज़िंदगी में स्थिरता चाहिए, तो खुद ही बनानी होगी.
मेडिकल स्टोर खोलना आसान नहीं था. लाइसेंस के लिए पैसे चाहिए थे. दवाइयों का स्टॉक पहले से खरीदना था. सप्लायर भरोसा चाहते थे. लेकिन पूंजी नहीं थी. प्रेमचंद ने जान पहचान वालों से थोड़ा थोड़ा उधार लिया. परिवार की बचत भी लगाई.
शुरुआती दिन बहुत कठिन थे. सप्लायर छोटे ऑर्डर देने से कतराते थे. ट्रांसपोर्ट भरोसेमंद नहीं था. डिलीवरी की कोई सुविधा नहीं थी. तब प्रेमचंद ने वही किया, जो उनके पास था. वे साइकिल से दवाइयां पहुंचाने लगे. घर से दुकान और दुकान से ग्राहक तक.
कई दिन ऐसे भी आए जब सिर्फ एक या दो ग्राहक आए. कुछ दिन बिल्कुल शांत रहे. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उनका ध्यान भीड़ पर नहीं, नियमितता पर था. वे कहते हैं कि पहले उन्होंने बुनियादी बातें सीखने पर ध्यान दिया, क्योंकि आगे बढ़ने के लिए वही ज़रूरी होती हैं.
आज उनका मेडिकल स्टोर आसपास के लोगों की रोज़मर्रा की ज़रूरत पूरी करता है. यह कोई बड़ी दुकान नहीं है. लेकिन भरोसे की दुकान है. यहां ग्राहक संख्या से नहीं, रिश्तों से कारोबार चलता है.
मार्च 2025 में बैंक से बातचीत के दौरान उन्हें यूपी सरकार की ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान’ योजना (CM YUVA Yojana) योजना के बारे में पता चला. उन्होंने बैंक के ज़रिए आवेदन किया. शिक्षा और खाते से जुड़े सामान्य दस्तावेज़ लगाए. कुछ ही महीनों में उनके खाते में पांच लाख रुपये आ गए.
इस रकम से उन्होंने दवाइयों का स्टॉक मजबूत किया. सप्लाई की दिक्कत कम हुई. ग्राहक को ज़रूरी दवा समय पर मिलने लगी. भरोसा और बढ़ा. दुकान की रफ्तार अब पहले से ज़्यादा स्थिर है.
प्रेमचंद आज भी खर्च को लेकर सतर्क हैं. वे इस लोन को मंज़िल नहीं मानते. उनके लिए यह सिर्फ़ सांस लेने की जगह है. थोड़ा सहारा, ताकि काम सही तरीके से आगे बढ़ सके.
पीछे मुड़कर देखें तो उनकी कहानी किसी एक फैसले की नहीं है. यह लगातार सीखने, देखने और खुद को ढालने की कहानी है. साइकिल से की गई डिलीवरी और धीमे दिन उनके लिए रुकावट नहीं थे. वही नींव थे, जिन पर आज उनका मेडिकल स्टोर खड़ा है.
Edited by रविकांत पारीक



