कैसे फैक्ट्री में काम करने वाले शख्स ने शुरू किया कोल्ड प्रेस्ड सरसों तेल का कारोबार
बिजनौर के हरिश ने फैक्ट्री की नौकरी छोड़ ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान’ के तहत मिले लोन से कोल्ड प्रेस्ड सरसों तेल की मिल शुरू की. शुद्धता और सही प्रक्रिया पर भरोसा करते हुए उन्होंने धीरे धीरे आत्मनिर्भर बनने का रास्ता चुना.
बिजनौर जिले के रहने वाले हरिश ने कभी यह नहीं सोचा था कि वे खुद का बिजनेस शुरू करेंगे. कुछ महीने पहले तक वे एक फैक्ट्री में काम कर रहे थे, जहां कृषि उपकरण बनाए जाते थे. नौकरी से घर चलता था, लेकिन मन उसमें नहीं लगता था. सालों से उनके मन में अपना कुछ करने की इच्छा थी, लेकिन वह सोच अधूरी और दूर की लगती थी. रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियों के बीच वह कभी ठोस रूप नहीं ले पाई.
एक दिन फैक्ट्री में काम के दौरान ब्रेक में उन्होंने अपने मोबाइल पर एक छोटा सा वीडियो देखा. इसमें पहली बार बिज़नेस शुरू करने वालों के लिए सरकार की एक लोन योजना के बारे में बताया जा रहा था. शुरुआत में हरिश को भरोसा नहीं हुआ. उन्हें लगा कि ऐसी योजनाएं सुनने में अच्छी लगती हैं, लेकिन ज़मीन पर शायद काम नहीं करतीं.
फिर भी उन्होंने बात आगे बढ़ाई. साथ काम करने वाले लोगों से पूछा. स्थानीय दफ्तर में जाकर जानकारी ली. धीरे धीरे उन्हें समझ में आने लगा कि यह योजना सच में मौजूद है और इसमें मदद मिल सकती है. इसके बाद उन्होंने ज़रूरी कागज़ इकट्ठा करने शुरू किए. साथ ही यह भी सोचना शुरू किया कि वे ऐसा कौन सा काम कर सकते हैं जिसे लंबे समय तक संभाल सकें.
कुछ ही महीनों में उत्तर प्रदेश सरकार की ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान’ योजना (CM YUVA Yojana) के तहत उनका लोन मंजूर हो गया. जिस दिन लोन की मंजूरी मिली, उसी दिन उन्होंने नौकरी छोड़ दी. यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन वे अब पीछे नहीं हटना चाहते थे.
हरिश ने सरसों तेल का छोटा मिल लगाने का फैसला किया. यह ऐसा उत्पाद था जिसे वे खुद भी इस्तेमाल करते थे और अच्छी तरह समझते थे. उन्होंने देखा था कि आसपास बिकने वाला बहुत सा सरसों तेल साफ सुथरी जगहों पर नहीं बनता. इसी अनुभव ने उन्हें शुद्धता और सही प्रक्रिया पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया.
उनकी यूनिट में ठंडे तापमान पर बिना गर्म किए कोल्ड प्रेस्ड सरसों तेल तैयार किया जाता है, ताकि तेल के प्राकृतिक गुण बने रहें. काम का स्तर छोटा है. मशीनें सीमित हैं. यूनिट में सिर्फ दो लोग काम करते हैं, जिनमें हरिश खुद भी शामिल हैं.
सरसों के बीज वे स्थानीय मंडियों से खरीदते हैं. वहां गुणवत्ता में काफी फर्क होता है. हरिश खुद बीज चुनते हैं. उन्हें साफ करते हैं. यह काम उनका रोज़ सुबह जल्दी शुरू हो जाता है. तेल निकालने के बाद उसे छाना जाता है और सीधे दुकान से ही बेचा जाता है. वे किसी डिस्ट्रीब्यूटर या बड़े बाज़ार पर निर्भर नहीं हैं.
फिलहाल बिक्री पूरी तरह दुकान से ही होती है. ज़्यादातर ग्राहक मुंह से मुंह की पहचान से आते हैं. शुरुआत में डर जरूर था. एक तय नौकरी छोड़ना आसान नहीं होता. हरिश मानते हैं कि उन्हें चिंता थी कि बिज़नेस चलेगा या नहीं. इस दौरान परिवार का साथ बहुत अहम रहा. खासकर उनके बड़े भाइयों ने उन्हें हौसला दिया.
हरिश कहते हैं कि शुरुआत में डर लगा था, लेकिन यह भी पता था कि कोशिश किए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता.
अभी इस बिज़नेस को शुरू हुए कुछ ही महीने हुए हैं. हरिश अपनी सफलता को बढ़ा चढ़ाकर नहीं बताते. उनका कहना है कि मांग स्थिर है और रोज़ का उत्पादन सीमित रखा गया है. नियमित ग्राहकों से अच्छा फीडबैक मिल रहा है, लेकिन वे इसे सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा मानते हैं, मंज़िल नहीं.
खरीद, उत्पादन और बिक्री सब कुछ खुद संभालना उनके लिए नया अनुभव है. नौकरी के समय उन्होंने ऐसा कुछ नहीं देखा था. आगे चलकर वे इस मिल को एक पहचान दिलाना चाहते हैं, लेकिन तभी जब उन्हें पूरा भरोसा हो जाए. फिलहाल उनके लिए विस्तार से ज़्यादा ज़रूरी है स्थिरता.
हरिश की कहानी वेतन पर निर्भर रहने से खुद के काम की जिम्मेदारी उठाने तक के बदलाव को दिखाती है. यह बदलाव जल्दबाज़ी में नहीं हुआ. यह सोच समझकर लिया गया फैसला था. शुरुआती अनिश्चितता अब धीरे धीरे अपने काम पर नियंत्रण की भावना में बदल रही है, भले ही आगे का रास्ता अभी पूरी तरह साफ न हो.
Edited by रविकांत पारीक



