होमाई व्यारावाला : कहानी भारत की पहली महिला फोटो जर्नलिस्‍ट उर्फ डालडा 13 की

By Manisha Pandey
December 09, 2022, Updated on : Fri Dec 09 2022 03:41:00 GMT+0000
होमाई व्यारावाला : कहानी भारत की पहली महिला फोटो जर्नलिस्‍ट उर्फ डालडा 13 की
लोगों को ये जानने में जमाने लग गए कि ये दोनों तस्‍वीरें दरअसल मानेकशॉ ने नहीं, बल्कि उनकी पत्‍नी होमाई व्‍यारवाला ने खीचीं थीं.
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जिस साल भारत को आजादी मिली, उस साल इलस्‍ट्रेटेड वीकली मैगजीन में एक ऐतिहासिक तस्‍वीर छपी. तस्‍वीर में लॉर्ड माउंटबेटेन सिर उठाकर हिंदुस्‍तान के झंडे को सलामी दे रहे हैं. पीछे उनकी पत्‍नी एडविना माउंटबेटन खड़ी झंडे को देखकर मुस्‍कुरा रही हैं और उनके बगल में खड़े हैं पंडित जवाहरलाल नेहरू. इसके साथ एक और तस्‍वीर भी छपी थी, जिसमें पंडित नेहरू लालकिले की प्राचीर से हजारों लोगों की भीड़ को संबोधित कर रहे हैं.


मैगजीन में इन दोनों तस्‍वीरों के नीचे फोटो क्रेडिट लिखा था- ‘मानेकशॉ व्‍यारावाला.’

लोगों को ये जानने में बहुत साल लग गए कि ये दोनों तस्‍वीरें दरअसल मानेकशॉ ने नहीं, बल्कि उनकी पत्‍नी होमाई व्‍यारवाला ने खीचीं थीं.


होमाई, जो हिंदुस्‍तान की पहली महिला फोटो जर्नलिस्‍ट थीं.

दुनिया औरतों को गंभीरता से नहीं लेती

शुरू-शुरू में जब उन्‍होंने फोटोग्राफी की शुरुआत की तो कोई अखबार और पत्रिका उनकी तस्‍वीरें छापने को तैयार नहीं हुआ क्‍योंकि वह एक स्‍त्री थीं. कोई स्त्रियों के काम को गंभीरता से नहीं लेता था. मैगजीन में छपने का एक ही रास्‍ता था कि वो तस्‍वीरें किसी पुरुष फोटोग्राफर के नाम से भेजी जाएं.

1995 में एक वीडियो इंटरव्‍यू में होमाई कहती हैं-


“लोग बहुत रूढ़िवादी थे. वे नहीं चाहते थे कि महिलाएं इधर-उधर घूमें और जब उन्होंने मुझे साड़ी में कैमरे के साथ घूमते हुए देखा तो उन्हें लगा कि यह एक बहुत ही विचित्र सा दृश्य है. और शुरुआत में उन्हें लगा कि मैं कैमरे लेकर लोगों को सिर्फ बेवकूफ बना रही हूं. मैं फोटोग्राफर तो नहीं हो सकती.  मैं सिर्फ दिखावा कर रही हूं. जो भी हो, उन्होंने मुझे गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन यह मेरे लिए फायदेमंद ही साबित हुआ.


"चूंकि कोई मुझे गंभीरता से नहीं लेता था तो मैं अपना कैमरा लिए कहीं भी घुस जाती थी. कई संवेदनशील इलाकों में भी तस्वीरें लेने जा सकती थी और कोई मुझे रोकता नहीं था. इसलिए मैं बेहतरीन तस्वीरें लेने और उन्हें छपवाने में कामयाब रही था. बहुत साल बाद जब लोगों को पता चला कि वो छपी हुई तस्‍वीरें दरअसल मेरी खींची तस्वीरें थीं, तब जाकर उन्‍हें एहसास हुआ कि मैं बेवकूफ नहीं बना रही थी. मैं अपने काम के प्रति काफी गंभीर थी.”

गुजरात के एक पारसी परिवार में जन्‍म और शुरुआती जीवन

होमाई व्यारवाला का जन्म 9 दिसंबर, 1913 को गुजरात के नवसारी में एक पारसी पारसी परिवार में हुआ था. पिता एक थिएटर कंपनी चलाते थे और अपने थिएटर ट्रूप को लेकर शहर-शहर घूमते रहते थे. परिवार भी उनके साथ एक जगह से दूसरी जगह जाता. स्‍कूली शिक्षा पूरी होने के बाद उन्‍हें आगे की पढ़ाई के लिए मुंबई भेज दिया गया, जहां उन्‍होंने मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज और जे.जे. स्‍कूल ऑफ आर्ट्स से पढ़ाई की.

homai vyarawalla india's first woman photojournalist who captured indian history

परिवार की माली हालत को देखते हुए उनके लिए बेटी को महंगे अंग्रजी स्‍कूलों में पढ़ाना आसान नहीं था. होमाई के माता-पिता खुद बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन शिक्षा के महत्‍व को समझते थे. लड़की को अंग्रेजी पढ़ाने पर उनका विशेष जोर था.

अपनी क्‍लास की अकेली लड़की

यह बात अलग से रेखांकित करना इसलिए जरूरी है कि उस जमाने में बहुत संभ्रांत कुलीन परिवारों को छोड़कर सामान्‍य मध्‍यवर्गीय घरों की लड़कियों को पढ़ाने का बहुत चलन नहीं था. खुद होमाई की क्‍लास में कुल छह लड़कियां थीं, जिनमें से पांच मुंबई के अमीर पारसी परिवारों से आती थीं. मैट्रिक की पढ़ाई के दौरान क्‍लास में 36 बच्‍चे थे, जिनमें होमाई अकेली लड़की थीं.   

फोटो जर्नलिज्‍म की शुरुआत

1930 के दशक में होमाई ने ‘द इलस्ट्रेटेड वीकली’ (टाइम्‍स ऑफ इंडिया ग्रुप की उस जमाने की प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका ) से बतौर फोटो जर्नलिस्‍ट अपने कॅरियर की शुरुआत की. उन्‍हें हर फोटो के लिए एक रुपया पारिश्रमिक मिलता था.


होमाई ने मानेकशॉ जनशेदजी व्‍यारवारा से शादी की थी, जो खुद टाइम्‍स ऑफ इंडिया में फोटोग्राफर थे. शुरू में होमाई की सारी तस्‍वीरें पत्रिका में उनके पति के नाम से छपती थीं.


परिवार ने लड़की शिक्षा और आत्‍मनिर्भर होने पर तो जोर दिया था, लेकिन फिर भी स्‍त्री होने के नियम और सीमाएं हमेशा उसके साथ रहे. एक रूढि़वादी समाज में एक लड़की का खादी की साड़ी पहनकर झोला लटकाए कैमरा लेकर दर-दर भटकना किसी को नहीं सुहाता था. लड़कियों से एक खास तरह के कमनीय व्‍यवहार की अपेक्षा की जाती थी. पारसी समाज भी इससे कुछ भिन्‍न नहीं था.

डालडा 13

होमाई का पूरा जीवन उन रूढि़यों को तोड़ने और अपना रास्‍ता खुद बनाने की कहानी है. हालांकि होमाई की तस्‍वीरें कभी उनके नाम से नहीं छपीं. पति के बाद वह उनके भाई के नाम से छपने लगीं. बाद के दिनों में उन्‍होंने अपने लिए एक बहुत ही विचित्र और यूनीक सा नाम ढूं लिया था- डालडा 13. उनके कॅरियर के आखिरी दशक की सभी तस्‍वीरें इसी नाम से छपी हैं.


1996 में मोनिका बेकर ने इसी नाम से होमाई के जीवन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्‍म भी बनाई- ‘डालडा 13,  पोर्ट्रेट ऑफ होमाई व्‍यारवाला.’

भारतीय इतिहास के अमूल्‍य यादगार क्षण

होमाई के कैमरे में कैद हुई अनेकों तस्‍वीरें भारतीय इतिहास की अमूल्‍य थाती हैं. उन्‍होंने उस क्षणों को अपने कैमरे में कैद किया है, जो इस भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास के बहुत मार्मिक, नाजुक और ऐतिहासिक पलों का गवाह है.


चाहे वह महात्‍मा गांधी की अंतिम यात्रा हो, लॉर्ड माउंटबेटन की तिरंगे को सलामी, आजाद भारत के पहले गणतंत्र दिवस की पहली परेड या वह ऐतिहासिक सम्‍मेलन, जहां भारत के विभाजन का फैसला लिया जा रहा था.


यह सारे क्षण उस महिला के कैमरे में हमेशा के लिए कैद हो गए. होमाई की जगह कोई पुरुष होता तो उसकी गौरव गाथा हजारों शब्‍दों में लिखी और गाई गई होती. उनकी तस्‍वीरों के बारे में तो बरसों तक लोग ये भी नहीं जानते थे कि यह उसी खादी वाली महिला के कैमरे से निकली हैं.

पपराजी का जमाना और फोटोग्राफी से संन्‍यास

1969 में मानेकशॉ की मृत्‍यु हो गई. होमाई तब 56 साल की थीं. उनके देखते-देखते दुनिया काफी बदल गई थी. अब पपराजी का जमाना था. फिल्‍मी सितारों की एक तस्‍वीर के पीछे फोटोग्राफर भागते नजर आते. यह बदलती दुनिया होमाई को रास नहीं आई और उन्‍होंने फोटोग्राफी छोड़ दी. अपने जीवन के आखिरी 40 सालों में उन्‍होंने कोई तस्‍वीर नहीं खींची.


सालों बाद अपने जीवन पर बनी डॉक्‍यूमेंट्री में होमाई फोटोग्राफी छोड़ने के बारे में कहती हैं-

homai vyarawalla india's first woman photojournalist who captured indian history

“यह जगह अब काम करने लायक नहीं रह गई थी. हमारे पास फोटोग्राफरों के लिए कुछ नियम थे. हमने ड्रेस कोड का भी पालन किया. हमने एक दूसरे के साथ सहकर्मियों की तरह सम्मान का व्यवहार किया. लेकिन फिर चीजें खराब हो गईं. वे लोग सिर्फ फटाफट पैसा बनाने में रुचि रखते थे. मैं इस भीड़ का हिस्‍सा नहीं बनना चाहती थी.”

होमाई को आखिरी विदा

बाद में वह अपने बेटे फारुख के साथ राजस्‍थान चली गईं, जो बिट्स पिलानी में पढ़ाते थे. जीवन के अंतिम दिन उन्‍होंने वड़ोदरा में अकेले ही गुजारे थे क्‍योंकि उनके बेटे की भी कैंसर से मृत्‍यु हो गई थी. 15 जनवरी, 2012 को 98 साल की उम्र में वड़ोदरा के एक अस्‍पताल में उनका निधन हुआ.


1956 में होमाई व्‍यारवाला सिक्किम गई थीं. चीन के साथ हुए विवाद के बाद भारत ने दलाई लामा को शरण दी थी और 14वें दलाई लामा हिंदुस्‍तान आ रहे थे. सिक्किम के नाथू ला में जब उन्‍होंने हिंदुस्‍तान की धरती पर पहली बार कदम रखा तो वो क्षण होमाई के कैमरे में कैद हो गया. बाद में यह तस्‍वीर लाइफ मैगजीन में छपी.


उस दुनिया से इस दुनिया में दलाई लामा के उस पहले कदम की तरह होमाई का जाना दूसरी दुनिया में रखा कदम था. लेकिन कुछ लोग जाते नहीं हैं. वो हमेशा रहते हैं मौजूद आपके आसपास. इंटरनेट पर होमाई की खींची बहुत सारी तस्‍वीरें हैं, जिनसे गुजरते हुए उस स्‍त्री की याद आपके साथ-साथ गुजरती है, जिसका नाम होमाई था.


आंखों के सामने एक दृश्‍य उभरता है. सफेद रंग की खादी की साड़ी, गाढ़े रंग का ब्‍लाउज, बॉब कट वालों वाली दुबली-पतली सी छोटे कद की लड़की हाथों में अपना कैमरा उठाए भीड़ के बीच भागी जा रही है. अंतिम संस्‍कार से पहले राजघाट पर गांधी का शव रखा है. वो लड़की भीड़ के बीच से जगह बनाती घुसती है और गांधी की वो अंतिम छवि अपने कैमरे में कैद कर लेती है.

वो औरत एक दिन दुनिया से चली जाती है. लेकिन गांधी की वो तस्‍वीर रह जाती है और वो इतिहास, जो हमारे भीतर कहीं बचा हुआ है. जिसके होने से हम हैं और हमारे होने से वो.