पति की हैवानियत झेली, आत्महत्या का ख्याल... फिर सविता प्रधान बनीं PCS अफसर
सविता प्रधान की कहानी हिम्मत और संघर्ष की मिसाल है. घरेलू हिंसा, गरीबी और अपमान झेलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. लगातार दो बार MPPSC परीक्षा पास कर PCS अफसर बनीं और आज बतौर कमिश्नर मध्य प्रदेश के सिंगरौली में अपनी सेवाएं दे रहीं हैं.
कभी कभी जिंदगी इंसान को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां आगे सिर्फ अंधेरा नजर आता है. हर तरफ दर्द होता है. अपमान होता है. और सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है, जब अपने ही लोग साथ छोड़ देते हैं. उस समय इंसान या तो टूट जाता है, या फिर खुद को नया बनाकर खड़ा करता है. सविता प्रधान (Savita Pradhan) की कहानी इसी दूसरे रास्ते की कहानी है.
यह कहानी सिर्फ एक लड़की के अफसर बनने की नहीं है. यह कहानी है उस लड़की की, जिसने भूख सही, मार सही, अपमान सहा, लेकिन फिर भी अपने सपनों को मरने नहीं दिया. यह कहानी है उस हिम्मत की, जो सबसे मुश्किल समय में भी जिंदा रही.
मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले के मडई गाँव में एक गरीब आदिवासी परिवार में जन्मी सविता का बचपन बेहद साधारण था. घर में पैसे नहीं थे. लेकिन उनके अंदर पढ़ने की चाह थी. वह जानती थीं कि पढ़ाई ही उनकी जिंदगी बदल सकती है. उन्होंने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की और जब दसवीं में अच्छे नंबर आए, तो पहली बार परिवार को उन पर गर्व हुआ.
लेकिन आगे का रास्ता आसान नहीं था. दूसरे कस्बे के स्कूल तक पहुंचने के लिए उन्हें रोज कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था. बस का किराया भी उनके लिए बड़ा खर्च था. लेकिन उन्होंने कभी शिकायत नहीं की. उनके कदम थकते जरूर थे, लेकिन रुकते नहीं थे.
धीरे-धीरे उम्र बढ़ी और समाज का दबाव भी. 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, महज 16 साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गई. उन्हें भरोसा दिलाया गया कि वह शादी के बाद भी पढ़ाई कर सकेंगी. लेकिन शादी के बाद उनका जीवन एक दर्दनाक कहानी बन गया.
ससुराल में उन्हें इंसान की तरह नहीं, बल्कि एक बोझ की तरह रखा गया. खाना तक नहीं दिया जाता था. दिन रात उनसे काम कराया जाता था. छोटी-छोटी बातों पर मारपीट होती थी.
वह दर्द सिर्फ शरीर का नहीं था, आत्मा तक पहुंच चुका था.
तब तक वह दो बच्चों की मां बन चुकी थीं लेकिन उनकी स्थिति वैसी ही थी. उन पर अत्याचार कम नहीं हुए. एक दिन उन्होंने अपने पिता से मदद मांगी. उनसे कहा कि उन्हें यहां से ले जाएं. पिता ने वादा किया कि वह शाम को आएंगे. लेकिन वह कभी नहीं आए. उस दिन सविता ने एक कड़वा सच समझा कि अब उन्हें खुद ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी.
हालात इतने बिगड़ गए कि उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला कर लिया. वह फांसी लगाने जा रही थीं. लेकिन तभी उनकी नजर खिड़की पर पड़ी. उनकी सास सब देख रही थीं. लेकिन उनके चेहरे पर कोई भावना नहीं थी. उस पल सविता को एहसास हुआ कि उनकी जिंदगी की कीमत सिर्फ उन्हें खुद समझनी होगी.
उन्होंने फांसी का फंदा छोड़ दिया. और जिंदगी को एक और मौका दिया.
वह घर छोड़कर निकल गईं. उन्होंने अपनी रिश्तेदार के घर में शरण ली. वहां से उन्होंने अपनी जिंदगी फिर से शुरू की. पार्लर में काम किया. बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया. धीरे-धीरे अपनी पढ़ाई पूरी की.
इस दौरान भी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं. उनका पति उन्हें बच्चों के सामने पीटता था. एक दिन एक बाल्टी में पेशाब किया और सविता पर फेंक दिया. उस समय वे परीक्षा देने जा रही थी. लेकिन उस दिन सविता ने एक अलग फैसला लिया. उन्होंने खुद को संभाला, नहाया, कपड़े बदले और वापस परीक्षा देने चली गईं. अब वह टूटने वाली नहीं थीं.
एक दिन उन्हें मध्य प्रदेश राज्य सिविल सेवा (MPPSC) परीक्षा के बारे में पता चला. उन्हें ज्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन उन्होंने तय किया कि यही उनका रास्ता है. यही वह मौका है, जो उनकी जिंदगी बदल सकता है.
उन्होंने अपने बच्चों की जिम्मेदारी अकेले संभालते हुए सिविल सेवा की तैयारी जारी रखी. हालात आसान नहीं थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने बिना किसी कोचिंग, बिना संसाधनों के तैयारी शुरू की. दिन में काम करतीं, रात में पढ़ाई करतीं. हर दिन एक नई चुनौती होती थी, लेकिन हर दिन वह खुद को थोड़ा और मजबूत बनाती थीं.
लगातार संघर्ष और कठिनाइयों के बीच भी उन्होंने अपने लक्ष्य पर पूरा ध्यान बनाए रखा. उनकी मेहनत रंग लाई और साल 2005 में उन्होंने मध्य प्रदेश राज्य सिविल सेवा (MPPSC) परीक्षा सफलतापूर्वक पास कर ली. उन्होंने 2006 में फिर से परीक्षा दी और एक बार फिर पास हुईं. लेकिन उनकी असली जीत सिर्फ परीक्षा पास करना नहीं था. उनकी असली जीत थी खुद के लिए खड़ा होना.
पहली कोशिश में ही उन्हें पुलिस सर्विस में जगह मिल गई. यह किसी भी तरह से एक बड़ी कामयाबी थी, लेकिन सविता ने एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस पर अपना ध्यान लगाया था. वह वापस गईं, फिर से तैयारी की और दूसरी कोशिश में पूरे राज्य में 83वीं रैंक हासिल की, जिससे उन्हें मध्य प्रदेश एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस ऑफिसर के तौर पर जगह मिली.
उन्होंने नरसिंहपुर जिले की गोटेगांव म्युनिसिपल काउंसिल से अपना करियर शुरू किया. इसके बाद वह ग्वालियर में अर्बन एडमिनिस्ट्रेशन एंड डेवलपमेंट डिपार्टमेंट में जॉइंट डायरेक्टर के तौर पर काम करने लगीं.
आज सविता प्रधान बतौर कमिश्नर मध्य प्रदेश के सिंगरौली नगर निगम में अपनी सेवाएं दे रहीं हैं. वह उन लाखों महिलाओं की आवाज हैं, जो आज भी चुपचाप सब सह रही हैं. उनकी कहानी बताती है कि हालात कितने भी खराब क्यों न हों, अगर हिम्मत जिंदा है, तो उम्मीद भी जिंदा रहती है.
यह कहानी हमें सिखाती है कि किसी और के आने का इंतजार मत करो. खुद अपने लिए खड़े हो जाओ. क्योंकि जब इंसान खुद बदलने का फैसला करता है, तभी उसकी जिंदगी सच में बदलती है.
(नोट: इस लेख को तथ्यात्मक सुधार के साथ पुन: प्रकाशित किया गया है)



