सरकार ने रेयर अर्थ मैग्नेट फैक्ट्रियां बनाने के लिए 7,280 करोड़ रु की योजना को दी मंजूरी
भारत सरकार ने 7,280 करोड़ रुपये की Rare Earth Permanent Magnet योजना को मंजूरी दी है, जिसका लक्ष्य देश में पहली बार पूरी तरह घरेलू वैल्यू चेन विकसित करना है. इससे EV, नवीकरणीय ऊर्जा, रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को मजबूत सप्लाई मिलेगी और आयात पर निर्भरता कम होगी.
भारत सरकार ने हाई टेक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए ₹7,280 करोड़ की योजना मंजूर की है. इस योजना का उद्देश्य देश में सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) के उत्पादन के लिए पूरी तरह से घरेलू वैल्यू चेन तैयार करना है. इस योजना के तहत छह हजार मीट्रिक टन सालाना मैग्नेट बनाने की क्षमता विकसित की जाएगी. यह भारत के लिए पहली बार होगा.
सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) ने बताया कि ये मैग्नेट दुनिया के सबसे मजबूत परमानेंट मैग्नेट्स में से हैं. इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा तकनीक, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस सिस्टम और रक्षा क्षेत्र में होता है. उन्होंने कहा कि यह योजना ऑक्साइड से लेकर मेटल और मेटल से लेकर एलॉय और फिर तैयार मैग्नेट तक पूरी मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया भारत में ही स्थापित करेगी.
रेयर अर्थ मैग्नेट क्यों जरूरी हैं
रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (Rare Earth Permanent Magnets) आधुनिक तकनीक के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. ये मैग्नेट इलेक्ट्रिक वाहन, ड्रोन, विंड टर्बाइन, मेडिकल उपकरण, रोबोट, स्मार्टफोन और सैटेलाइट में इस्तेमाल होते हैं. भारत में इन मैग्नेट्स की मांग दो हजार तीस तक दोगुनी होने की उम्मीद है. इसका कारण क्लीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक वाहनों और इलेक्ट्रॉनिक्स के तेजी से बढ़ते सेक्टर हैं.
फिलहाल भारत इन मैग्नेट्स के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है. दुनिया के कुछ चुनिंदा देश ही रेयर अर्थ प्रोसेसिंग और मैग्नेट बनाने की सप्लाई चेन को नियंत्रित करते हैं. इससे भारत को रणनीतिक जोखिम का सामना करना पड़ता है. खासकर तब जब दुनिया में सप्लाई में रुकावट या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ जाता है.
सरकार की यह नई योजना भारत में पहली बार पूरी तरह से एकीकृत रेयर अर्थ मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करेगी. इससे आयात पर निर्भरता कम होगी और देश की तकनीकी क्षमता और सुरक्षा मजबूत होगी.
योजना की मुख्य बातें
सरकार छह हजार मीट्रिक टन उत्पादन क्षमता को पांच कंपनियों को देगी. हर कंपनी बारह सौ मीट्रिक टन तक की यूनिट स्थापित कर सकती है. इसके लिए वैश्विक स्तर पर बिडिंग कराई जाएगी. यह योजना सात साल तक चलेगी. पहले दो साल प्लांट लगाने और सेटअप के लिए होंगे.
यह योजना केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए नहीं है. इसका उद्देश्य भारत में रेयर अर्थ का पूरा वैल्यू चेन बनाना है. इससे खनन, मेटल रिफाइनिंग, एलॉय प्रोडक्शन और एडवांस्ड मैटेरियल के क्षेत्र में भी निवेश बढ़ेगा.
दीर्घकालिक और रणनीतिक असर
यह योजना आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य से सीधे जुड़ी है. साथ ही यह भारत को नेट ज़ीरो दो हजार सत्तर के लक्ष्य तक पहुंचाने में भी मदद करेगी. इलेक्ट्रिक वाहन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसी क्लीन टेक इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा. भारत की विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता कम होगी.
विशेषज्ञों के अनुसार इस योजना से कई सेक्टर्स पर बड़ा सकारात्मक असर पड़ेगा.
- इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को मजबूत मैग्नेट की घरेलू सप्लाई मिलेगी.
- विंड टर्बाइन के लिए जरूरी मैग्नेट भारत में बनेंगे.
- एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र को रणनीतिक फायदा मिलेगा.
- इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और मजबूत होगी.
समय के साथ भारत आयात पर निर्भर रहने के बजाय हाई टेक मैग्नेट का वैश्विक सप्लायर भी बन सकता है.
आगे क्या?
आगे किन बातों पर ध्यान देना जरूरी होगा:
- पहला, सरकार पांच कंपनियों का चयन ग्लोबल बिडिंग के जरिए करेगी. यह देखना अहम होगा कि किन कंपनियों को चुना जाता है.
- दूसरा, दो साल की सेटअप अवधि में काम कितनी तेजी से आगे बढ़ता है, यह भी बड़ा संकेत होगा.
- तीसरा, क्या भारत में रेयर अर्थ से जुड़ा बड़ा इकोसिस्टम विकसित होता है जिसमें माइनिंग, रिफाइनिंग और एलॉय बनाने जैसे उद्योग शामिल हों.
- चौथा, इस योजना का इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग, नवीकरणीय ऊर्जा सेक्टर और रक्षा मैन्युफैक्चरिंग की लागत और सप्लाई चेन पर क्या असर पड़ेगा, यह भी देखने योग्य होगा.
कुल मिलाकर, यह योजना भारत को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. इससे भारत वैश्विक रेयर अर्थ वैल्यू चेन में अपनी मजबूत जगह बना सकेगा. यह साफ संकेत है कि भारत अब अगली पीढ़ी की मैन्युफैक्चरिंग और क्लीन एनर्जी इनोवेशन का नेतृत्व करना चाहता है.
Edited by Ravi Pareek



