भारत में जमीनी स्तर पर है सोशल ऑन्त्रप्रेन्योर्स की जरूरत
भारत में जमीनी स्तर पर काम कर रहे सोशल ऑन्त्रप्रेन्योर्स शिक्षा, गरीबी और सामाजिक असमानता जैसी समस्याओं का स्थानीय समाधान तैयार कर रहे हैं. यह लेख बताता है कि बदलाव दूर बैठकर नहीं, बल्कि समुदायों के बीच रहकर और उनके साथ मिलकर काम करने से आता है.
भारत में दशकों से सबसे मुश्किल समस्याओं को दूर बैठकर ही सुलझाने की कोशिश की जाती रही है. गाँवों के लिए योजनाएं दिल्ली में बैठकर ऐसे नीतिनिर्माताओं द्वारा बनाई गईं, जो उन गाँवों में कभी गए ही नहीं. मुंबई में बैठे पाठ्यक्रम निर्माताओं ने उन कक्षाओं के लिए पाठ्यक्रम बनाए, जिनमें बैठकर उन्होंने कभी पढ़ाई नहीं की. कुछ योजनाएं सफल हुईं, पर ज्यादातर योजनाएं विफल हो गईं क्योंकि जिन लोगों ने समाधान तैयार किए थे, वो उन लोगों से बहुत दूर थे, जो उन समस्याओं का सामना कर रहे थे.
पिछले दशक में भारत में गरीबी, शिक्षा, ग्रामीण विकास और पर्यावरण की सस्टेनेबिलिटी के लिए उद्देश्य पर केंद्रित इनोवेशन की वास्तविक लहर शुरू हुई है, जिसे इंपैक्ट इन्वेस्टर्स एवं इन्क्यूबेटर्स ने आगे बढ़ाया है. साल 2024 में इंपैक्ट इन्वेस्टर्स काउंसिल ने इस तरह के 438 उद्यमों में 5 बिलियन डॉलर की ईक्विटी को ट्रैक किया. सवाल यह है कि क्या यह पूंजी उन फाउंडर्स तक पहुँच रही है, जो सबसे महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं.
भारत की सबसे कठोर समस्याएं काल्पनिक नहीं हैं. वो इन जगहों की मिट्टी, बोली, वहाँ के मौसम, जाति और वर्ग में समाई हुई हैं. समाधान बहुत दूर से आयात किए जाते हैं, जो या तो देर से पहुँचते हैं या अधूरे होते हैं. भारत में और ज्यादा कार्यक्रमों की जरूरत नहीं है, बल्कि इन कार्यक्रमों में इन जगहों से ज्यादा नजदीकी होने की जरूरत है.
दूरी का स्पष्ट समाधान जमीनी स्तर पर सोशल ऑन्त्रप्रेन्योर प्रदान करते हैं. वो न केवल भौगोलिक स्थान को, बल्कि वहाँ के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को समझते हैं. ग्रामीण बहुआयामी गरीबी एक दशक में 32.6 प्रतिशत से गिरकर 19.3 तक पहुँच गई है, वहीं जमीनी स्तर पर किए गए काम ने इसमें अक्सर स्थिर और अदृश्य भूमिका निभाई है. ये ऑन्त्रप्रेन्योर उन्हीं जगहों पर रहते हैं, जहाँ काम किया जाता है. वो डोनर्स से पहले वहाँ के लोगों की भाषा बोलते हैं और समस्या पर ध्यान केंद्रित करते हुए उन्हीं लोगों के लिए समाधानों का विकास करते हैं.

क्षमतालय फाउंडेशन के विवेक कुमार ऐसे की एक ऑन्त्रप्रेन्योर हैं. उन्होंने कोटरा, उदयपुर के एक आदिवासी इलाके में साल 2016 में काम करना शुरू किया, जो बढ़ते-बढ़ते राजस्थान में गोगुंदा, बिहार में समस्तीपुर और दिल्ली के सरकारी स्कूलों तक पहुँच चुका है. क्षमतालय हर रोज 17,000 से अधिक बच्चों को सपोर्ट करता है. इसने अपने नजदीक के समुदायों में जमीनी स्तर पर एजुकेशन लीडर्स का विकास करने के लिए अपनी खुद की आईडिस्कवर फैलोशिप शुरू की है.
जलगाँव में अद्वैत दंडवते ने साल 2013 में वर्धिष्णु की सहस्थापना की. यह संस्था कचरा बीनने वाले बच्चों की सहायता करती है. वर्धिष्णु के आनंदघर केंद्र जलगाँव, चोपडा, और भुसावल में एक हजार से अधिक बच्चों को औपचारिक शिक्षा से जोड़ चुके हैं. इसका कम्युनिटी कलेक्टिव्स प्रोग्राम नजदीकी शहरों में अन्य छोटे जमीनी स्तर के समूहों का इन्क्यूबेशन करता है. अद्वैत ने एक प्रोग्राम का विस्तार करने की बजाय ऐसे लोगों का परिवेश बनाया, जो अलग-अलग स्तर पर काम करने में समर्थ है.
कोयम्बटूर में वैष्णवी श्रीनिवासन भूमि फैलोशिप का नेतृत्व करती हैं. वैष्णवी साल 2006 से भारतीय कक्षाओं में हैं, जहाँ वो और उनके कुछ दोस्त एक अनाथालय में बच्चों के लिए सैटरडे प्रोग्राम में वॉल्युनटीयर के रूप में भूमि से जुड़े. साल 2020 में उन्होंने टीएफआईएक्स के साथ एक दो-वर्षीय पेड फैलोशिप शुरू की, जो युवा ग्रेजुएट्स को सरकारी और कम आय वाले स्कूलों में फुल-टाईम एजुकेटर्स के रूप में भेजती है. आज कोयम्बटूर के 14 स्कूलों में 15 भूमि फैलो काम कर रहे हैं, जो 850 से अधिक बच्चों को पढ़ा रहे हैं, वहीं व्यापक स्तर पर भूमि से भारत में 25,000 से अधिक बच्चों को लाभ मिला है.
स्कॉलरीफाई की स्थापना विजय रॉय ने की थी. यह स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप प्राप्त करना आसान बनाता है. यह लड़कियों और टियर 2 से 4 शहरों एवं गाँवों के स्टूडेंट्स पर केंद्रित है. स्कॉलरीफाई का उद्देश्य अगले 5 सालों में 100,000 से अधिक स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप उपलब्ध कराना है.
बैंगलुरू में श्वेता गुहान और मंगल पांडे द्वारा स्थापित, की एजुकेशन फाउंडेशन वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों के लिए प्रारंभिक शिक्षा को फिर से तैयार कर रहा है क्योंकि कमी कक्षा 1 से बहुत पहले ही शुरू हो जाती है.
दिल्ली में मैनक रॉय और चांदनी चोपड़ा द्वारा स्थापित सिंपल एजुकेशन फाउंडेशन दिल्ली, पंजाब और उत्तराखंड सरकारों की मदद से हजारों टीचर्स और उनके स्टूडेंट्स के लिए टीचिंग की कला में सुधार लाने के लिए काम करती है.
छः संगठन, छः स्थान. उनमें से किसी की भी शुरुआत एक मॉडल के साथ नहीं हुई. हर एक की शुरुआत एक बच्चे, एक समुदाय और एक ऐसी समस्या के साथ हुई, जिससे उसके फाउंडर नजरंदाज नहीं कर सके. वो सिस्टम के थिंकर्स और लीडर्स हैं, जिनमें उन परिस्थितियों की समझ और समुदाय का विश्वास था, जो किसी बाहरी प्रोग्राम में होना संभव नहीं.
इसी के कारण टीएफआईएक्स और इनोवेटईडी का अस्तित्व है. ये दोनों इस तरह के फाउंडर्स को मदद देने की मजबूत स्थिति में हैं और शिक्षा में समानता के अधूरे काम को पूरा कर सकते हैं. शिक्षा क्षेत्र के ऑन्त्रप्रेन्योर्स के लिए टीच फॉर इंडिया इन्क्यूबेटर, टीएफआईएक्स द्वारा 18 राज्यों और केंद्रीय प्रांतों के 71 फाउंडर्स को सहयोग दिया जा चुका है. वो मिलकर 51 फैलोशिप चलाते हैं, लगभग 7,000 फैलो लीडर्स का विकास कर चुके हैं और छः लाख बच्चों तक पहुँच चुके हैं. इनोवेटईडी टीच फॉर इंडिया एलुमनी के लिए एक प्लेटफॉर्म है, जिसकी मदद से वो अपने खुद के संगठनों का निर्माण कर सकते हैं. यह साल 2017 से दिल्ली से लेकर चेन्नई तक कई शहरों में 70 एलुमनी फाउंडर्स को इनक्यूबेट कर चुका है. आज ये दोनों संगठन मिलकर भारत में शांति के साथ किए जा रहे उस प्रयास का प्रतिनिधित्व करते हैं, इंपैक्ट मार्केट अभी भी नहीं कर पा रहा है. ये प्रोजेक्ट के आगे बढ़ने का इंतजार करने की बजाय शुरू से ही फाउंडर पर भरोसा करते हैं.
ब्रिटिश काउंसिल के अनुसार भारत में 85 प्रतिशत सोशल ऑन्त्रप्रेन्योर्स के लिए फंडरेज़िंग अपने कमर्शियल साथियों के मुकाबले काफी मुश्किल होती है. मेट्रो शहरों से दूर तथा वेंचर पार्टनर्स से और अधिक दूर काम करने वाले जमीनी स्तर के फाउंडर्स के लिए यह अंतर और ज्यादा बड़ा है. दूसरी तरफ, बच्चों के लिए इंतजार करना संभव नहीं है. निपुण भारत का मानना है कि प्राथमिक स्कूल के पाँच करोड़ से अधिक बच्चे बुनियादी साक्षरता और अंकज्ञान भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं. वर्ल्ड बैंक के अनुसार भारत में शिक्षा की गरीबी 56 प्रतिशत है.
एक सेक्टर के रूप में हमारी भूमिका है कि इन फाउंडर्स तक जल्दी पहुँचा जाए, उन्हें अधिक साहस के साथ फंड दिया जाए और उनके साथ ज्यादा लंबा रास्ता तय किया जाए. लेकिन नजदीकी बनाना केवल फाउंडर का ही दायित्व नहीं, बल्कि हम सभी का दायित्व है.
हम सब उस देश में रह रहे हैं, जहाँ किसी दोपहर, किसी क्लासरूम में, एक बच्चा इंतजार कर रहा है कि कोई आकर उसे सिखाएगा. आपको उसे सिखाने के लिए किसी संगठन को शुरू करने की जरूरत नहीं है. आप किसी सरकारी स्कूल में वॉल्युनटीयर बनें. आप टीच फॉर इंडिया फैलो को मेंटर करें. आप हफ्ते में एक घंटे किसी बच्चे के साथ पढ़ें. अपने पास स्थित स्कूल में एक टीचर या स्कूल के प्रिंसिपल के साथ बैठें और उनकी बात सुनें. भविष्य के भारत का निर्माण केवल 200$ ऑन्त्रप्रेन्योर्स या वो फाउंडर्स नहीं करेंगे, जिनके बारे में हमने यहाँ बताया है. बल्कि अगले भारत का निर्माण वो लाखों लोग करेंगे, जो छोटे-छोटे तरीकों से वहाँ मौजूद रहेंगे, जहाँ पर समस्या है और उसे हल करेंगे. वो अपनी नजरें नहीं फेरेंगे.
गरीबी से मुक्त और स्नेह से भरा भारत किसी नीति या बजट से नहीं बनेगा. यह हम सबकी कोशिशों से बनेगा.
(images: AI generated)
(लेखक ‘टीच फॉर इंडिया’ के मूवमेंट बिल्डिंग विभाग के सीनियर डायरेक्टर हैं. आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं. YourStory का उनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है.)
Edited by Ravi Pareek




