भारत को रिसर्च में करना होगा बड़ा निवेश, GDP का 2% R&D पर खर्च करने की जरूरत: नीति आयोग
भारत को वैज्ञानिक और तकनीकी महाशक्ति बनाने के लिए R&D निवेश बढ़ाना जरूरी है. नीति आयोग ने अगले 4 से 5 साल में रिसर्च पर खर्च GDP के 0.64% से बढ़ाकर 2% करने की सिफारिश की है. रिपोर्ट में निजी निवेश, GST राहत और आसान रिसर्च प्रक्रियाओं पर जोर दिया गया है.
भारत को आने वाले वर्षों में रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर अपना खर्च तेजी से बढ़ाने की जरूरत है. नीति आयोग (Niti Aayog) ने कहा है कि अगर देश को विज्ञान, तकनीक और इनोवेशन के क्षेत्र में मजबूत बनना है, तो अगले चार से पांच साल में R&D पर निवेश बढ़ाकर GDP का कम से कम 2 प्रतिशत करना होगा. अभी भारत इस क्षेत्र में अपनी GDP का सिर्फ 0.64 प्रतिशत ही खर्च करता है.
नीति आयोग ने सोमवार को जारी अपनी रिपोर्ट Ease of Doing Research & Development in India: Removing Obstacles, Promoting Enablers में यह बात कही. रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि भारत का रिसर्च इकोसिस्टम अभी भी कई चुनौतियों से जूझ रहा है. फंडिंग की कमी, जटिल प्रक्रियाएं, धीमी मंजूरी और रिसर्चरों के सामने आने वाली प्रशासनिक परेशानियां देश में शोध की गति को प्रभावित कर रही हैं.
रिपोर्ट के अनुसार भारत में रिसर्च के लिए सरकारी फंडिंग पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता है. निजी कंपनियों और परोपकारी संस्थाओं की भागीदारी अभी बहुत सीमित है. नीति आयोग का मानना है कि अगर भारत को दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करनी है, तो निजी क्षेत्र को रिसर्च में ज्यादा निवेश के लिए प्रोत्साहित करना होगा.
इसी को ध्यान में रखते हुए रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सरकार निजी कंपनियों को समयबद्ध और अतिरिक्त टैक्स लाभ दे सकती है. इससे कंपनियां रिसर्च और इनोवेशन में ज्यादा पैसा लगाने के लिए प्रेरित होंगी. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कंपनियों के बैलेंस शीट में R&D खर्च को अलग से दिखाने की व्यवस्था की जानी चाहिए. इससे यह पता चल सकेगा कि निजी क्षेत्र रिसर्च पर कितना निवेश कर रहा है.

नीति आयोग ने रिसर्च से जुड़े उपकरणों और जरूरी सामान की खरीद पर GST कम करने की भी सिफारिश की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि R&D खरीद के लिए 5 प्रतिशत GST स्लैब को फिर से लागू करने पर विचार होना चाहिए. इससे रिसर्च संस्थानों और वैज्ञानिकों पर आर्थिक बोझ कम होगा.
रिपोर्ट में CSR फंडिंग को भी रिसर्च से जोड़ने की जरूरत बताई गई है. आयोग का कहना है कि कंपनियों के CSR फंड का बेहतर इस्तेमाल रिसर्च और डेवलपमेंट में किया जा सकता है. साथ ही, रिसर्च को दान देने वाले लोगों और संस्थाओं को ज्यादा टैक्स छूट देने की भी सिफारिश की गई है. इससे इस क्षेत्र में परोपकारी निवेश बढ़ सकता है.
नीति आयोग ने यह भी कहा कि विज्ञान और तकनीक मंत्रालय के भीतर एक इंटर डिपार्टमेंटल कमेटी बनाई जानी चाहिए. यह कमेटी अलग अलग विभागों की योजनाओं में तालमेल बैठाने का काम करेगी. इससे एक जैसी योजनाओं की दोहराव वाली समस्या कम होगी और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा.
रिपोर्ट में रिसर्चरों को होने वाली परेशानियों का भी विस्तार से जिक्र किया गया है. इसमें कहा गया है कि वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को कई अलग अलग पोर्टल पर आवेदन करना पड़ता है. फंड मिलने में काफी देरी होती है. कई बार प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद भी पैसा समय पर नहीं पहुंचता. इससे रिसर्च प्रभावित होती है.
इसके अलावा खरीद प्रक्रिया और अकाउंटिंग नियम भी काफी जटिल हैं. वैज्ञानिकों को रिसर्च से ज्यादा समय कागजी कामों में लगाना पड़ता है. कई संस्थानों में जरूरी पद खाली पड़े हैं और भर्ती प्रक्रिया बहुत धीमी है. फेलोशिप मिलने में देरी भी युवा रिसर्चरों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है.
नीति आयोग ने कहा कि भारत के पास युवा प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन देश में शोधकर्ताओं की संख्या अभी भी काफी कम है. खासकर पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च का ढांचा कमजोर है. इससे रिसर्च की गुणवत्ता और निरंतरता दोनों प्रभावित होती हैं.
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि अगर भारत को विकसित राष्ट्र बनना है और तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना है, तो रिसर्च और इनोवेशन में बड़े स्तर पर निवेश करना ही होगा. बेहतर फंडिंग, आसान प्रक्रियाएं और मजबूत रिसर्च माहौल भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है.
(images: AI generated)



