Skyroot से Pixxel तक, कैसे भारत में खड़ी हो रही नई प्राइवेट स्पेस इकोनॉमी — सरकार ने बताया
भारत का प्राइवेट स्पेस सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है. देश में 400 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप सक्रिय हैं और निवेश $618.5 मिलियन तक पहुंच चुका है. IN-SPACe ने 108 मंजूरियां दी हैं. जानिए कैसे सरकारी नीतियां, ISRO की सुविधाएं और नई फंडिंग भारत की स्पेस इकोनॉमी को रफ्तार दे रही हैं...
भारत का स्पेस सेक्टर (अंतरिक्ष क्षेत्र) अब केवल सरकारी एजेंसियों तक सीमित नहीं रहा है. पिछले छह वर्षों में प्राइवेट कंपनियों और स्टार्टअप्स ने इस सेक्टर में तेजी से अपनी जगह बनाई है. निवेश बढ़ रहा है. नए सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहुंच रहे हैं. भारतीय कंपनियां लॉन्च व्हीकल, सैटेलाइट, अर्थ ऑब्जर्वेशन, स्पेस डेटा और दूसरी टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं.
सरकार के मुताबिक, जून 2020 में स्पेस सेक्टर को प्राइवेट कंपनियों के लिए खोलने के बाद इसके नतीजे अब साफ दिखाई देने लगे हैं. देश में सक्रिय स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या 2014 में सिर्फ एक थी. आज यह बढ़कर 400 से ज्यादा हो गई है.
निजी निवेश भी $600 मिलियन का आंकड़ा पार कर चुका है. 31 मार्च 2026 तक भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर में कुल फंडिंग $618.5 मिलियन तक पहुंच गई.
2026 में ही अब तक $187 मिलियन के निवेश की जानकारी सामने आई है.
यह जानकारी केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में दी. उनके पास प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन, परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष विभाग की जिम्मेदारी है.
प्राइवेट कंपनियों को अब तक 108 मंजूरियां
भारत में निजी अंतरिक्ष गतिविधियों को बढ़ावा देने में IN-SPACe की भूमिका अहम हो गई है. यह प्राइवेट कंपनियों और दूसरे गैर सरकारी संस्थानों के लिए अंतरिक्ष गतिविधियों को मंजूरी देने और उन्हें सुविधाएं उपलब्ध कराने का काम करता है.
सरकार के अनुसार, IN-SPACe अब तक Non Government Entities (NGEs) को 108 मंजूरियां दे चुका है. इनमें सैटेलाइट और पेलोड की स्थापना और संचालन से लेकर स्पेस ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम के लॉन्च जैसी गतिविधियां शामिल हैं.
इसके अलावा 17 स्टार्टअप्स को अलग-अलग अंतरिक्ष गतिविधियां करने की मंजूरी दी गई है.
प्राइवेट सेक्टर के बढ़ते दायरे के साथ सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों पर भी ध्यान दिया जा रहा है. IN-SPACe की ओर से जारी नियमों और प्रक्रियाओं के तहत मंजूरी के आवेदन का मूल्यांकन रणनीतिक, सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए किया जाता है.
IN-SPACe भारतीय संस्थाओं द्वारा की जाने वाली अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए सुरक्षा संबंधी दिशानिर्देशों पर भी काम कर रहा है. इसके लिए संबंधित पक्षों के साथ चर्चा की जा रही है.
2020 के बाद तेजी से बदली तस्वीर
जून 2020 में किए गए सुधारों ने भारत के स्पेस सेक्टर में प्राइवेट कंपनियों के लिए नए रास्ते खोले. छह साल बाद इसका असर लॉन्च से लेकर सैटेलाइट और निवेश तक दिखाई दे रहा है.
भारत की प्राइवेट कंपनियां वास्तविक लॉन्च और ऑर्बिटल क्षमताओं का प्रदर्शन कर चुकी हैं. दो कंपनियां नवंबर 2022 और मई 2024 में सब ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल उड़ा चुकी हैं.
NGEs अब तक 30 से ज्यादा सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहुंचा चुके हैं. वहीं PSLV Orbital Experimental Module (POEM) जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए करीब 45 पेलोड अंतरिक्ष में भेजे गए हैं.
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्पेस बिजनेस में किसी तकनीक को विकसित करना ही काफी नहीं होता. उसे अंतरिक्ष के वातावरण में सफलतापूर्वक साबित करना भी जरूरी होता है. POEM ने स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के लिए इस प्रक्रिया को ज्यादा सुलभ बनाया है.
$618.5 मिलियन की फंडिंग
भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर में निवेश की रफ्तार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है.
2021 और 2022 तक कुल फंडिंग $100.5 मिलियन के पार पहुंची थी. 2023 और 2024 तक यह बढ़कर $348.5 मिलियन हो गई. 31 मार्च 2026 तक यह आंकड़ा $618.5 मिलियन हो चुका था.
इस दौरान निवेश का स्वरूप भी बदला है. शुरुआती दौर में जहां छोटे सीड फंडिंग राउंड ज्यादा देखने को मिलते थे, वहीं अब ग्रोथ स्टेज की बड़ी फंडिंग भी सामने आ रही है.
भारतीय स्पेस कंपनियों में निवेश करने वालों का दायरा भी बढ़ा है. शुरुआती निवेशकों के साथ अब सॉवरेन वेल्थ फंड, ग्लोबल एसेट मैनेजर और बड़ी रणनीतिक कंपनियां भी इस सेक्टर में पैसा लगा रही हैं.
Skyroot Aerospace को GIC और BlackRock जैसे निवेशकों का समर्थन मिला है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार कंपनी सेक्टर की पहली यूनिकॉर्न बन चुकी है.
Digantara ने $50 मिलियन की फंडिंग हासिल की, जिसमें जापान की SBI Investment भी शामिल रही. वहीं Pixxel को Alphabet का समर्थन मिला है.
2026 में भी निवेश का सिलसिला जारी रहा.
Agnikul Cosmos ने $2.7 मिलियन की इक्विटी फंडिंग जुटाई. इसके साथ कंपनी को तमिलनाडु सरकार से 25 करोड़ रुपये का निवेश मिला.
GalaxEye ने साल की शुरुआत में अलग-अलग राउंड के जरिए $11 मिलियन से अधिक जुटाए.
Dhruva Space ने मई में 105 करोड़ रुपये यानी करीब $12.5 मिलियन की फंडिंग हासिल की. कंपनी इस फंडिंग का इस्तेमाल अपनी सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन क्षमताओं को तेजी से बढ़ाने में कर रही है.
ये उदाहरण बताते हैं कि भारतीय प्राइवेट स्पेस सेक्टर अब केवल शुरुआती प्रयोगों तक सीमित नहीं है. कंपनियां बड़े स्तर पर पूंजी जुटाकर व्यावसायिक क्षमता विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं.
भारतीय कंपनियां अंतरिक्ष में दिखा रहीं अपनी क्षमता
पिछले एक साल में कई भारतीय कंपनियों ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ अपनी टेक्नोलॉजी को अंतरिक्ष में साबित किया है.
जनवरी 2025 में Pixxel, Digantara और XDLINX Spacelabs के सैटेलाइट एक साथ ऑर्बिट में पहुंचे.
इसके बाद अगस्त में Pixxel ने Falcon 9 के जरिए तीन और सैटेलाइट लॉन्च किए. इसके साथ कंपनी ने अपने छह सैटेलाइट वाले Firefly कॉन्स्टेलेशन के पहले चरण को पूरा किया.
Dhruva Space ने Thybolt 3 और LEAP 1 मिशन पूरे किए. कंपनी MOI 1 और LACHIT जैसे सहयोगी मिशनों का भी हिस्सा रही है.
Bellatrix, GalaxEye, Grahaa Space, HEX 20, Takeme2space, OrbitAid और कई दूसरी कंपनियों ने भी अपनी ऑर्बिटल क्षमताओं का प्रदर्शन किया है.
लॉन्च व्हीकल और प्रोपल्शन सेक्टर में भी भारतीय स्टार्टअप आगे बढ़ रहे हैं. Agnikul Cosmos ने अपने 3D प्रिंटेड सेमी क्रायोजेनिक इंजन का परीक्षण किया. Skyroot Aerospace ने ISRO के कैंपस में अपने Vikram रॉकेट के लिए सॉलिड मोटर का परीक्षण किया.
POEM बना स्टार्टअप्स के लिए अहम प्लेटफॉर्म
POEM ने स्पेस स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के लिए अंतरिक्ष में तकनीक की जांच का एक नया रास्ता तैयार किया है.
इस प्लेटफॉर्म की मदद से कंपनियां अपेक्षाकृत कम लागत में अपनी तकनीक को वास्तविक अंतरिक्ष वातावरण में परख सकती हैं.
POEM के चौथे मॉड्यूल में GalaxEye, Bellatrix, Takeme2Space, PierSight Space, Manastu Space और NSpace Tech के पेलोड शामिल थे. इनके साथ ISRO और शैक्षणिक संस्थानों के प्रयोग भी अंतरिक्ष में भेजे गए.
स्टार्टअप्स के लिए यह सुविधा खास तौर पर महत्वपूर्ण है. अंतरिक्ष में सफल परीक्षण किसी तकनीक को व्यावसायिक स्तर तक पहुंचाने और ग्राहकों का भरोसा हासिल करने में मदद कर सकता है.
दुनिया के बाजार तक पहुंच रहीं भारतीय कंपनियां
भारतीय स्पेस कंपनियों की गतिविधियां अब देश की सीमाओं से बाहर भी बढ़ रही हैं.
Digantara अमेरिका और यूरोप में कार्यालय खोल रही है. कंपनी सिंगापुर और ब्रिटेन की एजेंसियों के साथ भी काम कर रही है.
Pixxel कई महाद्वीपों में ग्राहकों को हाइपरस्पेक्ट्रल डेटा उपलब्ध करा रही है.
IN-SPACe के 45 से ज्यादा देशों के साथ कामकाजी संबंध हैं. इसके साथ तीन विदेशी अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ सहयोग समझौते भी किए गए हैं.
सरकार का जोर अंतरराष्ट्रीय साझेदारी बढ़ाने के साथ भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार तक पहुंच दिलाने पर है. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्पेस इवेंट्स, बिजनेस फोरम और कंपनियों के बीच बैठकों में भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा रहा है.
उभरते अंतरिक्ष बाजारों के साथ सहयोग बढ़ाने पर भी काम हो रहा है. इसका मकसद निर्यात, तकनीकी साझेदारी और ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की भूमिका बढ़ाना है.
प्राइवेट कंपनियां बनाएंगी अर्थ ऑब्जर्वेशन कॉन्स्टेलेशन
भारत में प्राइवेट कंपनियों को बड़े अंतरिक्ष प्रोजेक्ट्स से जोड़ने की दिशा में भी काम हो रहा है.
IN-SPACe के Earth Observation PPP प्रोजेक्ट के तहत Pixxel, Dhruva Space, SatSure और PierSight ने Allied Orbits के रूप में साथ आने की योजना बनाई है.
इसका लक्ष्य भारत का पहला निजी स्वामित्व वाला अर्थ ऑब्जर्वेशन कॉन्स्टेलेशन तैयार करना है.
योजना के तहत पांच वर्षों में 12 मल्टीमोडल सैटेलाइट तैयार किए जाने हैं. इनका इस्तेमाल हाई रिजॉल्यूशन सॉवरेन डेटा उपलब्ध कराने के लिए किया जाएगा.
इस प्रोजेक्ट में प्राइवेट सेक्टर की प्रतिबद्धता करीब 1,200 करोड़ रुपये बताई गई है.
स्पेस स्टार्टअप्स के लिए 1,000 करोड़ रुपये का VC Fund
सरकार ने प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी बढ़ाने के लिए कई नीतियां और योजनाएं शुरू की हैं.
Indian Space Policy 2023 के जरिए स्पेस सेक्टर में अलग-अलग संस्थाओं की भूमिका और जिम्मेदारियां तय की गई हैं.
विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए FDI नीति को उदार बनाया गया है. प्राइवेट कंपनियों को ISRO की सुविधाओं तक पहुंच देने के लिए रियायती मूल्य नीति भी लाई गई है.
स्पेस स्टार्टअप्स को फंडिंग मुहैया कराने के लिए 1,000 करोड़ रुपये का Venture Capital Fund स्थापित किया गया है.
इसके अलावा 500 करोड़ रुपये का Technology Adoption Fund बनाया गया है. इसका उद्देश्य स्वदेशी अंतरिक्ष तकनीकों के विकास, प्रदर्शन और व्यावसायीकरण को तेज करना है.
IN-SPACe Seed Fund Scheme के जरिए शुरुआती विचारों को प्रोडक्ट्स में बदलने में मदद देने का प्रयास किया जा रहा है.
प्राइवेट कंपनियों को ISRO की सुविधाओं, तकनीकी विशेषज्ञता और मेंटरशिप तक पहुंच भी दी जा रही है.
टेक्नोलॉजी से लेकर स्किल तक पर फोकस
स्पेस सेक्टर में तेजी से बढ़ती गतिविधियों के साथ कुशल कर्मचारियों की जरूरत भी बढ़ रही है.
सरकार के मुताबिक, इंडस्ट्री की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए स्पेस से जुड़े कोर्स, स्टूडेंट इमर्शन प्रोग्राम और क्षमता निर्माण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं.
स्पेस सेक्टर के अलग-अलग क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए 14 शॉर्ट टर्म स्किल डेवलपमेंट कोर्स तैयार किए गए हैं.
एक Technical Centre भी स्थापित किया गया है. यहां अंतरिक्ष प्रणालियों के लिए टेस्टिंग, वैलिडेशन और सिमुलेशन जैसी सुविधाएं किफायती लागत पर उपलब्ध कराने का लक्ष्य है.
सरकार ISRO में विकसित तकनीकों को इंडस्ट्री को ट्रांसफर करने पर भी काम कर रही है. इसमें Small Satellite Launch Vehicle यानी SSLV जैसी तकनीक भी शामिल है.
Satellite Bus as a Service पर भी काम
सरकार ने Satellite Bus as a Service यानी SBaaS पहल भी शुरू की है.
इसका उद्देश्य देश में स्वदेशी सैटेलाइट प्लेटफॉर्म क्षमता को मजबूत करना और सैटेलाइट तैयार करने की प्रक्रिया को तेज करना है.
राज्य सरकारों को भी स्पेस मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. इससे घरेलू सप्लाई चेन मजबूत करने, निवेश आकर्षित करने और एक संगठित स्पेस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम बनाने की उम्मीद है.
सरकार अर्थ ऑब्जर्वेशन PPP और Proof of Concept कार्यक्रमों के जरिए बाजार में मांग पैदा करने पर भी काम कर रही है. साथ ही अलग-अलग सरकारी क्षेत्रों में स्पेस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश की जा रही है.
400 से ज्यादा सक्रिय स्टार्टअप्स, $618.5 मिलियन की फंडिंग, 108 मंजूरियां, 30 से ज्यादा निजी सैटेलाइट और करीब 45 पेलोड इस बदलाव के पैमाने को दिखाते हैं.
सरकार अब फंडिंग, टेक्नोलॉजी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्किल डेवलपमेंट और वैश्विक बाजार तक पहुंच को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है.
आने वाले वर्षों में असली परीक्षा इस बात की होगी कि ये स्टार्टअप्स और प्राइवेट कंपनियां तकनीकी उपलब्धियों को कितनी तेजी से बड़े और टिकाऊ कारोबार में बदल पाती हैं. फिलहाल निवेश, लॉन्च और सैटेलाइट मिशनों के आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि भारत की नई स्पेस इकोनॉमी में प्राइवेट सेक्टर की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है.



