कैसे Dr. Faruk G Patel ने 1 लाख रु से खड़ा कर दिया 14,000 करोड़ रु का बिजनेस एम्पायर — KP Group की कहानी
गुजरात के छोटे से गांव से निकले डॉ. फारुक जी पटेल ने 1 लाख रु से बिजनेस शुरू किया. लॉजिस्टिक्स और टेलीकॉम से आगे बढ़ते हुए उन्होंने KP Group को सोलर, विंड, हाइब्रिड एनर्जी और ग्रीन हाइड्रोजन तक पहुंचाया. पढ़िए उनके तीन दशक लंबे कारोबारी सफर, चुनौतियों और भविष्य की योजनाओं की कहानी.
गुजरात के भरूच जिले के एक छोटे से गांव से निकले डॉ. फारुक जी पटेल (Dr. Faruk G Patel) ने 1994 में करीब ₹1 लाख की बचत के साथ कारोबार शुरू किया था. तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि लॉजिस्टिक्स से शुरू हुआ उनका सफर टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर और फिर रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) तक पहुंचेगा.
तीन दशक बाद, पटेल का KP Group सोलर, विंड, हाइब्रिड एनर्जी, इंजीनियरिंग, गैल्वनाइजिंग और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में काम कर रहा है. ग्रुप की तीन कंपनियां — KPI Green Energy, KP Energy और KP Green Engineering — शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं.
यह कहानी सिर्फ एक बिजनेस एम्पायर खड़ा करने की नहीं है. इसमें बाजार के बदलते रुझान को पहचानने, नए सेक्टर में उतरने और उस समय जोखिम लेने के कई मोड़ हैं, जब भविष्य उतना स्पष्ट नहीं था.
₹1 लाख से शुरू किया बिजनेस
डॉ. फारुक जी पटेल का शुरुआती जीवन गुजरात के भरूच जिले के सलादरा गांव में बीता. साधारण परिवार में पले-बढ़े पटेल के मुताबिक, शुरुआती जिंदगी ने उन्हें मेहनत और सीमित संसाधनों के बीच आगे बढ़ना सिखाया.
टेक्सटाइल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने कुछ समय मुंबई के टेक्सटाइल सेक्टर में काम किया. इसके बाद वह गुजरात लौट आए और हजीरा से भरूच के बीच सामान पहुंचाने का छोटा कार्टिंग कारोबार शुरू किया.
साल 1994 उनके कारोबारी सफर का अहम मोड़ बना. करीब ₹1 लाख की निजी बचत के साथ उन्होंने उस कारोबार की नींव रखी, जो आगे चलकर KP Group बना. शुरुआती दौर में कंपनी लॉजिस्टिक्स और रेजिडेंशियल कंस्ट्रक्शन से जुड़ी थी. इसके बाद पटेल ने मोबाइल टावर और टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर में कदम रखा. कंपनी के मुताबिक, अगले करीब 13 वर्षों में उसने 16 राज्यों में टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट पर काम किया.
YourStory से बात करते हुए डॉ. पटेल कहते हैं, “मैं एक साधारण परिवार से आया हूं और शुरुआती दिनों ने मुझे सबसे पहले मेहनत की अहमियत समझाई. 1994 में जब मैंने करीब ₹1 लाख की अपनी बचत से बिजनेस शुरू किया, तब हमारे पास बड़े संसाधन नहीं थे. जो कमाई होती थी, उसे अगले काम में लगाया जाता था. लॉजिस्टिक्स, कंस्ट्रक्शन और फिर टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर में काम करते हुए मैंने सीखा कि कारोबार में अनुशासन, धैर्य और लगातार काम करना बहुत जरूरी है.”
KPI Green Energy की लीडरशिप टीम में डॉ. फारुक जी पटेल फाउंडर और चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) हैं, जबकि अफ्फान पटेल और हसन पटेल कंपनी में Whole Time Director की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.

जब सोलर पर दांव लगाना आसान फैसला नहीं था
टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर में एक दशक से ज्यादा समय बिताने के बाद पटेल की नजर भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों पर गई. उनका मानना था कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में बिजली की मांग बढ़ेगी, लेकिन इसे पूरा करने के लिए लंबे समय तक केवल पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता.
इसी सोच के साथ उन्होंने 2008 में सोलर एनर्जी में कदम रखा और KPI Global Infrastructure की स्थापना की, जिसे आज KPI Green Energy के नाम से जाना जाता है.
कंपनी ने भरूच के सूडी गांव में करीब 220 एकड़ जमीन खरीदी और यहां निजी सोलर पार्क विकसित करने की शुरुआत की. उस समय भारत में सोलर पावर का बाजार आज की तुलना में काफी शुरुआती अवस्था में था.
इस बदलाव का अंदाजा सरकारी आंकड़ों से लगाया जा सकता है. नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के मुताबिक, मार्च 2014 तक भारत की स्थापित सोलर क्षमता महज 2.82 GW थी. 30 जून 2026 तक यह बढ़कर 162.15 GW हो चुकी है. इसी अवधि में विंड पावर क्षमता करीब 21 GW से बढ़कर 57.44 GW पर पहुंच गई. यानी जिस बाजार में पटेल ने शुरुआती दौर में कदम रखा था, वह अगले डेढ़ दशक में देश के ऊर्जा परिवर्तन के सबसे बड़े हिस्सों में से एक बन गया.
सोलर के दो साल बाद, 2010 में KP Energy के जरिए ग्रुप ने विंड एनर्जी में भी कदम रखा.
पटेल कहते हैं, “टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर में काम करते हुए मैं देख रहा था कि भारत की अर्थव्यवस्था के साथ ऊर्जा की जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है. मुझे लगा कि इस मांग को पूरा करने का रास्ता ऐसा होना चाहिए, जो पर्यावरण पर अतिरिक्त बोझ न डाले. 2008 में सोलर एनर्जी में उतरने का फैसला कई लोगों को जोखिम भरा लगा था. मेरा भरोसा था कि क्लीन एनर्जी सिर्फ पर्यावरण के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक तरक्की का अहम आधार भी बनेगी.”
IPP और EPC मॉडल से बढ़ाया कारोबार
समय के साथ KP Group ने सोलर और विंड से आगे हाइब्रिड पावर, स्ट्रक्चरल फैब्रिकेशन, गैल्वनाइजिंग और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में विस्तार किया.
ग्रुप की KPI Green Energy और KP Energy इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर (IPP) के साथ-साथ प्रोजेक्ट डेवलपमेंट और EPC (Engineering, procurement, and construction) से जुड़े मॉडल पर काम करती हैं. अपने सोलर, विंड और हाइब्रिड एसेट से बिजली बेचने के अलावा कंपनियां औद्योगिक और कमर्शियल ग्राहकों के लिए रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट भी विकसित करती हैं.
इस मॉडल में एक तरफ अपने पावर एसेट से लंबी अवधि के पावर परचेज एग्रीमेंट और कैप्टिव पावर व्यवस्था के तहत बिजली बेचकर नियमित आमदनी हासिल करने की कोशिश है. दूसरी तरफ ग्राहकों के लिए प्रोजेक्ट विकसित करने से प्रोजेक्ट आधारित रेवेन्यू आता है.
KP Green Engineering के जरिए ग्रुप फैब्रिकेशन और गैल्वनाइजिंग कारोबार में भी अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है.
पटेल बताते हैं, “हमारा बिजनेस मॉडल एसेट ओनरशिप और प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन, दोनों को साथ लेकर चलता है. एक तरफ हमारे अपने सोलर, विंड और हाइब्रिड एसेट हैं, जिनसे लंबे समय के समझौतों के तहत बिजली बेचकर नियमित आमदनी होती है. दूसरी तरफ हम औद्योगिक और कमर्शियल ग्राहकों के लिए रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करते हैं. अब फैब्रिकेशन, गैल्वनाइजिंग और ग्रीन हाइड्रोजन में विस्तार के साथ हमारी कोशिश वैल्यू चेन के ज्यादा हिस्सों को अपने कारोबार से जोड़ने की है.”
कंपनी के मुताबिक, KP Group का सालाना रेवेन्यू वित्त वर्ष 2020-21 में करीब ₹213 करोड़ था, जो अब ₹5,500 करोड़ से अधिक हो चुका है. KP Group की वेबसाइट पर उपलब्ध मई, 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, KP Group ₹14,255 करोड़ का बिजनेस एम्पायर है. कंपनी अपनी कुल रिन्यूएबल एनर्जी पोर्टफोलियो क्षमता 8.5 GW से अधिक बताती है. KP Group की वेबसाइट भी 8.5 GW से अधिक के कुल रिन्यूएबल एनर्जी पोर्टफोलियो का दावा करती है.
रिन्यूएबल एनर्जी का बढ़ता बाजार
KP Group की ग्रोथ को भारत के तेजी से बदलते एनर्जी सेक्टर के संदर्भ में देखना भी जरूरी है.
भारत ने जून 2025 में अपनी कुल स्थापित बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत के पार पहुंचा दी थी. यह उपलब्धि देश ने अपने Nationally Determined Contribution (NDC) के तहत तय 2030 की समयसीमा से पांच साल पहले हासिल की. भारत सरकार के मुताबिक, 30 जून 2026 तक कुल स्थापित बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी बढ़कर 54.18 प्रतिशत हो गई है.
यह बदलाव रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों के लिए बड़ा बाजार तैयार कर रहा है. लेकिन तेजी से बढ़ती क्षमता अपने साथ नई चुनौतियां भी लेकर आई है.
सोलर और विंड से बिजली उत्पादन मौसम और समय पर निर्भर करता है. ऐसे में केवल नई उत्पादन क्षमता जोड़ना पर्याप्त नहीं है. बिजली को उत्पादन स्थल से मांग वाले क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क, ग्रिड बैलेंसिंग और स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर भी उसी रफ्तार से बढ़ाना होगा.
पटेल के मुताबिक, ट्रांसमिशन की सीमाएं, जमीन का अधिग्रहण, बिजली उत्पादन में उतार-चढ़ाव और लंबी अवधि वाले प्रोजेक्ट की फाइनेंसिंग लागत सेक्टर की बड़ी चुनौतियां हैं.
वह कहते हैं, “भारत में रिन्यूएबल एनर्जी के लिए मौका बहुत बड़ा है, लेकिन क्षमता बढ़ाने के साथ बुनियादी ढांचे को भी उसी रफ्तार से तैयार करना होगा. ट्रांसमिशन नेटवर्क, जमीन, ग्रिड बैलेंसिंग और फाइनेंसिंग जैसे मुद्दे प्रोजेक्ट की रफ्तार को प्रभावित कर सकते हैं. सोलर और विंड की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ स्टोरेज बेहद अहम हो जाएगा. इसके लिए डेवलपर्स, ट्रांसमिशन कंपनियों, वित्तीय संस्थानों और नीति बनाने वाली एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत होगी.”
इसी जरूरत को देखते हुए सरकार रिन्यूएबल एनर्जी के साथ एनर्जी स्टोरेज को जोड़ने पर जोर दे रही है. फरवरी 2025 में Central Electricity Authority (CEA) ने सोलर प्रोजेक्ट्स के साथ Energy Storage Systems को co-locate करने की एडवाइजरी जारी की थी, जिसका मकसद ग्रिड की स्थिरता, विश्वसनीयता और ऊर्जा के बेहतर इस्तेमाल को बढ़ावा देना है.
अगला दांव ग्रीन हाइड्रोजन और स्टोरेज पर
सोलर और विंड के बाद KP Group अब ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन अमोनिया और एनर्जी स्टोरेज को अगले बड़े अवसर के रूप में देख रहा है.
ग्रुप 2030 तक 10 GW से अधिक क्लीन एनर्जी क्षमता के लक्ष्य की दिशा में काम कर रहा है. कंपनी के मुताबिक, गुजरात के मातर में सोलर पावर का इस्तेमाल कर ग्रीन हाइड्रोजन बनाने के लिए पायलट प्रोजेक्ट पर काम किया जा रहा है.
KP Green Engineering मातर में गैल्वनाइजिंग फैसिलिटी भी विकसित कर रही है. इसके जरिए कंपनी रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए स्ट्रक्चरल स्टील और संबंधित जरूरतों में अपनी क्षमता बढ़ाना चाहती है.
ग्रीन हाइड्रोजन पर यह दांव ऐसे समय में है, जब केंद्र सरकार भी इस सेक्टर को बड़े पैमाने पर विकसित करने की कोशिश कर रही है.
भारत सरकार ने जनवरी 2023 में ₹19,744 करोड़ के खर्च के साथ National Green Hydrogen Mission शुरू किया था. मिशन का लक्ष्य 2030 तक देश में कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन सालाना ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करना है. इसके साथ करीब 125 GW अतिरिक्त रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जुड़ने की उम्मीद है. सरकार का अनुमान है कि मिशन 2030 तक ₹8 लाख करोड़ से अधिक का निवेश आकर्षित कर सकता है और छह लाख से ज्यादा नौकरियां पैदा कर सकता है.
पटेल कहते हैं, “ग्रीन हाइड्रोजन और एनर्जी स्टोरेज मुझे अगली बड़ी संभावना दिखाई देते हैं. हमने ग्रीन हाइड्रोजन और अमोनिया के लिए अलग वेंचर बनाया है और मातर में पायलट स्तर पर काम कर रहे हैं. जैसे-जैसे रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी बढ़ेगी, स्टोरेज उस बिजली को चौबीसों घंटे इस्तेमाल के लायक बनाने में अहम भूमिका निभाएगा. आने वाले वर्षों में हमारा फोकस क्षमता बढ़ाने के साथ मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग और नई ऊर्जा तकनीकों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने पर रहेगा.”
कारोबार से आगे सामाजिक पहल
कारोबार के बाहर पटेल KP Human Development Foundation के जरिए शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सहायता से जुड़ी पहलों पर भी काम कर रहे हैं.
कंपनी के मुताबिक, फाउंडेशन वंचित परिवारों के बच्चों की शिक्षा के साथ बुजुर्गों, अनाथ बच्चों और दिव्यांग लोगों के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाता है. भरूच के झगड़िया में ‘प्रभु नु घर’ नाम से दिव्यांग बुजुर्गों के लिए एक वृद्धाश्रम भी तैयार किया जा रहा है.
तीन दशक में कई बार बदली कारोबार की दिशा
करीब तीन दशक पहले ₹1 लाख से शुरू हुआ फारुक पटेल का कारोबारी सफर लॉजिस्टिक्स से कंस्ट्रक्शन, टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर और फिर रिन्यूएबल एनर्जी तक पहुंचा है.
लेकिन इस कहानी का अगला अध्याय शायद पिछले अध्यायों से ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा.
भारत का रिन्यूएबल एनर्जी बाजार अब शुरुआती दौर में नहीं है. सोलर और विंड की स्थापित क्षमता तेजी से बढ़ चुकी है और अब मुकाबला सिर्फ अधिक मेगावाट जोड़ने का नहीं, बल्कि कम लागत, बेहतर स्टोरेज, मजबूत ग्रिड, समय पर प्रोजेक्ट पूरा करने और पूंजी का कुशल इस्तेमाल करने का भी है.
ग्रीन हाइड्रोजन में भी अवसर बड़ा है, लेकिन इसकी व्यावसायिक सफलता उत्पादन लागत, इलेक्ट्रोलाइजर टेक्नोलॉजी, सस्ती रिन्यूएबल बिजली, इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्याप्त मांग विकसित होने पर निर्भर करेगी.
ऐसे में KP Group के लिए अगली परीक्षा केवल 10 GW का लक्ष्य हासिल करने की नहीं होगी. असली चुनौती यह होगी कि तीन दशक में कई बार कारोबार की दिशा बदलने वाला यह समूह भारत के अगले ऊर्जा बदलाव में कितनी टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी जगह बना पाता है.




