भारत 'फैमिली प्‍लानिंग प्रोग्राम' शुरू करने वाला दुनिया का पहला देश था, लेकिन यह मुमकिन हुआ इस एक शख्‍स के प्रयास से

By Manisha Pandey
August 16, 2022, Updated on : Fri Aug 26 2022 08:43:07 GMT+0000
भारत 'फैमिली प्‍लानिंग प्रोग्राम' शुरू करने वाला दुनिया का पहला देश था, लेकिन यह मुमकिन हुआ इस एक शख्‍स के प्रयास से
दुनिया के लिए यह अचंभा ही था कि जो देश अभी पांच साल पहले दो सौ साल लंबी गुलामी के अंधेरों से बाहर निकला था, वह आधुनिकता की दिशा में इतनी तेजी से कदम बढ़ा रहा था.
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भारत दुनिया का पहला ऐसा देश था, जिसने 1952 में राष्‍ट्रव्‍यापी फैमिली प्‍लानिंग प्रोग्राम शुरू किया. प्‍लांड पैरेंटहुड को न सिर्फ महिलाओं, बल्कि राष्‍ट्र की जरूरत समझने और उस दिशा में आधिकारिक तौर पर कदम उठाने की जो कहानियां दुनिया के बाकी हिस्‍सों से आती हैं, वो दिल दहला देने वाली हैं. दुनिया के सबसे विकसित राष्‍ट्र का तमगा अपने माथे पर सजाए अमेरिका ने अपने देश में प्‍लांड पैरेंटहुड की शुरुआत करने वाली महिला मारग्रेट सेंगर को जेल में डाल दिया था. यूरोप में औरतों को 20 साल लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी कि उनके देश की सरकारें उन्‍हें गर्भनिरोध और गर्भपात जैसा बुनियादी संवैधानिक अधिकार दें. लेकिन भारत की कहानी उन सबसे अलग है. 


भारत दुनिया के उन उंगलियों पर गिने जो सकने वाले देशों में से है, जहां औरतों को इन बुनियादी अधिकारों के लिए पश्चिम की तरह लंबा संघर्ष नहीं करना पड़ा. लेकिन ऐसा नहीं है कि भारत में इस अधिकार की लड़ाई कोई लड़ ही नहीं रहा था.


एक पारसी महिला थीं. पेशे से वकील और मिजाज से सोशल वर्कर. नाम था अवाबाई बोमनजी वाडिया. आजादी के दो साल बाद 1949 में उन्‍होंने फैमिली प्‍लानिंग और प्‍लांड पैरेंटहुड के लिए काम करने वाले भारत के पहले संगठन ‘फैमिली प्‍लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ की शुरुआत की. साथ ही वह इंटरनेशनल प्‍लांड पैरेंटहुड फेडरेशन के फाउंडर्स में से एक थीं, जिसकी शुरुआत 1952 में हुई थी.

अवाबाई का शुरुआती जीवन

18 सितंबर, 1913 को श्रीलंका के कोलंबो शहर के एक समृद्ध और अंग्रेजीदां पारसी परिवार में अवाबाई का जन्‍म हुआ. परिवार की जड़ें हिंदुस्‍तान में थीं, लेकिन काम की जरूरतों के चलते परिवार श्रीलंका में बस गया था. पिता दोराबजी मुंछेरजी वाडिया सफल शिपिंग अधिकारी थे और मां फिरोजाबाई अर्शीवाला मेहता घरेलू महिला थीं. अवाबाई की शुरुआती स्‍कूलिंग कोलंबो में ही हुई थी, लेकिन 15 साल की उम्र में उन्‍हें आगे की पढ़ाई के लिए इंग्‍लैंड भेज दिया गया.


इंग्‍लैंड से कानून की पढ़ाई करने के बाद अवाबाई को पता चला कि श्रीलंका में तो औरतें वकालत ही नहीं करतीं. यहां तक कि श्रीलंका के लॉ कॉलेजों में महिलाओं को दाखिला भी नहीं मिलता था. 1933 में महज 19 साल की उम्र में जब उन्‍होंने इंग्‍लैंड में ऑनर्स के साथ कानून की परीक्षा पास की तो श्रीलंका के अखबारों की हेडलाइन बन गईं. इसके बाद ही श्रीलंका की सरकार ने अपने देश के लॉ कॉलेजों के दरवाजे महिलाओं के लिए खोल दिए.

india was world's first country to adopt nationwide family planning programme, due to efforts of avabai wadia

जब कोई उन्‍हें नौकरी देने को राजी नहीं था

अवाबाई ने कानून की परीक्षा तो अव्‍वल अंकों में पास कर ली थी, लेकिन इंग्‍लैंड की कोई लॉ फर्म उन्‍हें अपने यहां नौकरी देने को राजी नहीं थी. वजह थी उनकी राजनीतिक सक्रियता और मुखरता. कॉलेज के दिनों से ही वह कॉमनवेल्‍थ कंट्रीज लीग और इंटरनेशनल एलायंस और विमेन जैसे संगठनों की सदस्‍य बन गई थीं.


आए दिन सड़कों पर होने वाले जुलूस-प्रदर्शन में हिस्‍सा लेने के कारण अगले दिन के अखबारों में उनका नाम छपता. लंदन के हाइड पार्क में कोई राजनीतिक सभा हो रही हो तो क्‍लास छोड़कर वहां पहुंच जातीं. कई बार मंच पर चढ़कर भाषण भी देतीं. गांधी, नेहरू, जिन्‍ना जो भी लंदन जाता, अवाबाई उनसे मिलने वालों में सबसे आगे होतीं. इंग्‍लैंड में उनकी छवि अपने देश की आजादी और औरतों के हक-हुकूक के लिए लड़ने वाले लोगों की हो गई थी.


जब कहीं नौकरी नहीं मिली तो एक साल तक लंदन के हाईकोर्ट ऑफ जस्टिस में उन्‍होंने स्‍वतंत्र प्रैक्टिस की. फिर 1939 में कोलंबो लौट आईं और दो साल कोलंबो के सु्प्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस की.

परिवार की हिंदुस्‍तान वापसी

1941 में रिटायरमेंट के बाद पिता ने वतन लौटने का फैसला किया. वे लोग हिंदुस्‍तान लौट आए और मुंबई में रहने लगे. यहीं अवाबाई की मुलाकात बोमनजी खुर्शीदजी वाडिया से हुई और 1946 में दोनों ने विवाह कर लिया. जैसाकि अधिकांश आजाद दिल-दिमाग वाली औरतों के साथ होता है, वो शादी के पारंपरिक खांचे में फिट नहीं हो पातीं. अवाबाई तो सिर्फ राजनीतिक रूप से सक्रिय ही नहीं, बल्कि फेमिनिस्‍ट भी थीं. दुनिया भर की नारीवादी किताबें पढ़ने वाली लड़की, जो 17 साल की उम्र से ही इंटरनेशनल एलायंस ऑफ  विमेन जैसे संगठन का हिस्‍सा बन गई थी, मारग्रेट सेंगर से उसकी मित्रता थी. मारग्रेट, जो अमेरिका में गर्भनिरोध और फैमिली प्‍लानिंग जैसे महिलाओं के बुनियादी अधिकार के लिए लड़ रही थीं.


बोमनजी वाडिया को अंग्रेजी बोलने वाली, आधुनिक और वेस्‍टर्न पत्‍नी तो चाहिए थी, लेकिन भरी महफिल में औरतों के गर्भपात और कॉन्‍ट्रसेप्‍शन के अधिकार के सवाल पर बिफर पड़ने वाली नहीं. उनकी शादी सिर्फ तीन साल चली. 1952 में जब पहली प्रेग्‍नेंसी का अंत मिसकैरिज में हुआ तो उनके पास भी पति के साथ रहने की कोई वजह नहीं रह गई थी. हालांकि उन्‍होंने कभी तलाक नहीं लिया.  

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फेमिनिस्‍ट अवाबाई के फेमिनिस्‍ट सवाल

हम आज 2022 में भी गर्भपात, गर्भनिरोध जैसे शब्‍द सार्वजनिक रूप से बोलने में हिचकते हैं. अवाबाई ये सब सार्वजनिक मंचों और सार्वजनिक सभाओं में तब बोल रही थीं, जब इस देश की आधी आबादी अशिक्षा और जहालत के अंधेरे में थी. गांधी-नेहरू-पटेल के बुलावे पर औरतें आजादी की लड़ाई में तो झंडा लेकर चल पड़ी थीं, लेकिन उन्‍होंने कभी ये नहीं पूछा था कि इस आजादी से हमें क्‍या मिलेगा. हमारे हक और अधिकार की आजादी कहां है.


मुश्किल से 3 फीसदी महिलाएं तब शिक्षित थीं. औरतों को पिता की संपत्ति में हिस्‍सा नहीं मिलता था. शादी, बच्‍चे, तलाक जैसे जीवन के बुनियादी फैसलों में औरतों की कोई आवाज नहीं थी. नौकरियों में औरतों की हिस्‍सेदारी 6 फीसदी से भी कम थी. संविधान में लैंगिक बराबरी के दावे थे, लेकिन उस दावे को जमीनी हकीकत में बदलने की मंजिल अभी बहुत दूर थी.


अवाबाई वाडिया का मानना था कि औरत कब और कितने बच्‍चे पैदा करेगी, यह उसका अधिकार है. औरतों को यह आजादी और सुविधा कानून के जरिए दी जानी चाहिए कि वह मातृत्‍व से जुड़े फैसले ले सकें. 

आजाद भारत की पहली पंचवर्षीय योजना में फैमिली प्‍लानिंग को शामिल किया जाना   

पिता की मृत्‍यु के बाद अवाबाई को विरासत में ढेर सारी संपत्ति मिली. लेकिन उस विरासत का तीन चौथाई हिस्‍सा उन्‍होंने इस देश की औरतों के नाम कर दिया. 1949 में उन्‍होंने उस पैसे से फैमिली प्‍लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FPAI) की शुरुआत की और उसकी पहली प्रेसिडेंट बनीं. यह संगठन दो साल तक तक देश भर में घूम-घूमकर, सभाएं करके, महिला संगठनों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक पार्टियों के साथ मिलकर फैमिली प्‍लानिंग के मुद्दे पर जागरूकता फैलाने का काम करता रहा.


इस बीच भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से भी अवाबाई की मुलाकात होती रहती थी. उन्‍हें लंदन के दिनों की 17 साल की वो लड़की अभी भी याद थी, जो उनसे मिलने आया करती थी. जो हाइड पार्क की सभाओं में भाषण देती थी. जो नेहरू और गांधी से ढेर सारे सवाल पूछती थी, लेकिन जिसके सवाल सिर्फ देश की आजादी तक ही सीमित नहीं थे. उसके सवालों में ये सवाल भी था- “आजाद देश की औरतों के लिए आप क्‍या करने वाले हैं?”


यह अवाबाई की मेहनत और सतत लड़ाई का ही नतीजा था कि 1951 में जब नेहरू सरकार ने पहली पंचवर्षीय योजना की घोषणा की तो उसमें कृषि, उद्योग, शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य के साथ एक और चीज को जोड़ा गया- फैमिली प्‍लानिंग. इस तरह भारत 1951 में आधिकारिक तौर पर फैमिली प्‍लानिंग को लागू करने वाला दुनिया का पहला देश बना.


अवाबाई के संघर्ष ने भारत में जिस चीज को मुमकिन कर दिया था, अमेरिका में मारग्रेट सेंगर अब भी उसके लिए लड़ाई लड़ रही थीं. उनकी लड़ाई का नतीजा ये हुआ कि अमेरिका के पहले प्‍लांड पैरेंटहुड सेंटर की शुरुआत हो तो गई, लेकिन सरकारी योजनाओं में यह अब भी शामिल नहीं हुआ था.


भारत की इस उपलब्धि का श्रेय अवाबाई के साथ-साथ जवाहरलाल नेहरू को भी जाता है, जो अपनी बुनियादी सोच और दृष्टि में आधुनिक और स्‍त्री अधिकारों व बराबरी के पैरोकार थे. नेहरू शासन काल में एक के बाद एक वो कानून बने, जिन्‍होंने इस देश में महिला सशक्तिकरण की बुनियाद रखी. 1955 में हिंदू मैरिज एक्‍ट, 1956 में हिंदू सक्‍सेशन (उत्‍तराधिकार) एक्‍ट और हिंदू अडॉप्‍शन एंड मेन्‍टेनेंस एक्‍ट, 1954 में स्‍पेशल मैरिज एक्‍ट और 1961 में डॉउरी प्रोहिबिशन एक्‍ट जैसे कानून उनमें प्रमुख थे.

प्‍लांड पैरेंटहुड की तीसरी अंतर्राष्‍ट्रीय कॉन्‍फ्रेंस भारत में

नेहरू सरकार के समर्थन से पहली पंचवर्षीय योजना लागू होने के एक साल बाद 1952 में अवाबाई ने भारत में प्‍लांड पैरेंटहुड की तीसरी अंतर्राष्‍ट्रीय कॉन्‍फ्रेंस का आयोजन किया. मारग्रेट सेंगर तब इस कॉन्‍फ्रेंस में हिस्‍सा लेने हिंदुस्‍तान आई थीं. नॉर्वे से एजिले ऑटेसन जेनसन भी आईं, जो अपने देश में स्त्रियों की यौन शिक्षा, सुरक्षा और अधिकारों के लिए लड़ रही थीं.


दुनिया भर के अखबारों में इस कॉन्‍फ्रेंस की कवरेज हुई. दुनिया के लिए यह अचंभा ही था कि जो देश अभी पांच साल पहले दो सौ साल लंबी गुलामी के अंधेरों से बाहर निकला था, वह आधुनिकता की दिशा में इतनी तेजी से कदम बढ़ा रहा था.  

अवाबाई की विरासत

2005 में 91 साल की उम्र में दुनिया से रुखसत होने वाली अवाबाई ने अपना पूरा जीवन उस काम में लगा दिया, जिसमें उनका विश्‍वास था- समाज में स्त्रियों को मर्दों के बराबर मनुष्‍य का दर्जा मिले, उनके जीवन, उनकी देह पर उनका हक हो, उन्‍हें शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, नौकरी और संपदा का अधिकार मिले.


अवाबाई ने इन्‍हीं विषयों पर 10 से ज्‍यादा किताबें लिखी हैं. फैमिली प्‍लानिंग पर लिखी उनकी कई किताबों के अलावा एक किताब है- सम कॅरियर्स फॉर विमेन. उनकी एक और बहुत सुंदर किताब का नाम है- “द लाइट विल बिलांग टू अस.” सन् 2001 में उनका एक संस्‍मरण प्रकाशित हुआ- “द लाइट इज आवर्स.” इस किताब में उनकी जीवन यात्रा के साथ-साथ तत्‍कालीन सामाजिक-राजनीतिक विकास यात्रा के संबंध में भी अंतर्दृष्टि मिलती है.