अगले साल चीन से ज़्यादा हो जायेगी भारत की जनसंख्या

By Prerna Bhardwaj
July 12, 2022, Updated on : Tue Jul 12 2022 12:07:25 GMT+0000
अगले साल चीन से ज़्यादा हो जायेगी भारत की जनसंख्या
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
Share on
close

संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) ने 'विश्व जनसंख्या दिवस’ (World Population Day) के मौके पर सोमवार को रिपोर्ट जारी कर नवंबर 2022 के मध्य तक दुनिया की आबादी 8 अरब हो जाने का अनुमान व्यक्त किया है. इसके साथ ही इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि साल 2023 तक भारत की आबादी चीन से भी ज्यादा हो जाएगी, चीन अभी तक सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है.  


संयुक्‍त राष्‍ट्र ने रिपोर्ट में यह भी अनुमान व्यक्त किया है कि विश्‍व की जनसंख्‍या साल 2030 तक 8.5 अरब और साल 2050 तक 9.7 अरब तक हो सकती है.  माना जा रहा है कि दुनिया की आबादी साल 2080 में अपने चरम पर पहुंच जाएगी. इस दौरान दुनिया की कुल आबादी 10.4 अरब तक पहुंच जाएगी और इस स्‍थान पर साल 2100 तक बनी रहेगी. आबादी बढ़ने के कारणो में संयुक्त राष्ट्र ने फर्टिलिटी रेट, अर्बनाइजेशन और माइग्रेशन को प्रमुख बताया है. 

एशिया और जनसंख्या 

दुनिया की 61 फीसदी आबादी एशिया में रहती है. उसके बाद अफ्रीका में 1.3 अरब लोग यानी 17 फीसदी, यूरोप में 75 करोड़ यानी 10 फीसदी और लैटिन अमेरिका व कैरेबियाई देशों में 65 करोड़ यानी 8 फीसदी लोग रहते हैं जबकि उत्तरी अमेरिका में 37 करोड़ और ओसिनिया में 4.3 करोड़ लोग रहते हैं. 

s
भारत और चीन

भारत की बढती जनसंख्या एक गंभीर चिंता का विषय है. अटकलें लगायीं जा रही थीं कि जनसंख्या में चीन को पीछे छोड़ने में भारत को अभी 5 से 10 साल का वक़्त लग सकता है. लेकिन इस रिपोर्ट के मुताबिक़ 2023 में ही चीन से ज्यादा जनसंख्या वाला देश बन जाएगा.

क्या कारण हो सकते हैं भारत में जनसंख्या विस्फोट का और चीन में जनसंख्या नियंत्रण का?

  • 1950-1980 दशक के बीच चीन ने शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त की, खासकर महिलाओं की साक्षरता पर विशेष ध्यान दिया. 80 के दशक में ही चीन अपना आर्थिक विकास भी कर रहा था जिससे वहां के आम लोगों को फायदा मिला. साक्षरता और आर्थिक विकास का असर ये हुआ कि लोगों को स्वयं महसूस होने लगा की कम बच्चे पैदा करने से फायदा है. भारत में परिवार का आकार आज़ादी के बाद छोटा हुआ है लेकिन उसमें कई सांस्कृतिक जटिलताएँ भी हैं. 


  • चीन ने अपनी स्वास्थ्य सेवाओं में भी तेजी से सुधार किया. जिसका असर जनसंख्या नियंत्रण पर भी दिखा क्योंकि वहां के आम आदमी, ग्रामीण इलाकों के लोगों को या हर परिवार को ये महसूस होने लगा कि अगर हमारे परिवार में बच्चा पैदा होगा तो जिंदा बचेगा. कम मोर्टालिटी रेट (mortality rate) लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने से हतोत्साहित करता है. भारत में भी यह हुआ, आज़ादी के समय भरतीयों में शिशु मृत्यु दर और वयस्कों की औसत उम्र दोनों बेहद चिंताजनक थे. वहाँ से आज तक सुधार हुआ है लेकिन वो पर्याप्त नहीं रहा है. 


  • चीन में अपने देश के अस्सेट्स का डिस्ट्रीब्यूशन सभी वर्ग के लोगों में किया जिसकी वजह से वहां ग़रीबी मिटी. उसके अलावा दोनों देशों की शासन प्रणालियों में भी मूलभूत अंतर रहा है. चीन में सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण के कारण राज्य अपनी नीतियों को बलपूर्वक लागू करने में कामयाब रहा है. कई शोधों से यह पता चला है कि समाज के ग़रीब तबको में जनसंख्या में वृद्धि दर ज्यादा पाई जाती है. इसके पीछे की प्रमुख वजह बच्चे के मर जाने का डर होता है. अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने के कारण बच्चों की मोर्टालिटी रेट ज्यादा होती है, मतलब जन्म के एक साल के अंतराल में  उनके मर जाने की संभावना ज्यादा होती है. इस डर की वजह से वो अधिक बच्चे पैदा करने की तरफ़ जाते हैं. ग़रीब तबकों में शिक्षा, खासकर महिलाओं की स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाकर उन्हें उनके बच्चे की मृत्यु न होने का विश्वास आए इस दिशा में भारत में और प्रयास किए जाने की ज़रूरत है.