किराना से क्लिक तक: कैसे छोटे शहर बदल रहे भारत का ग्रॉसरी मार्केट
खरीदारी के इस बदलते मिजाज ने एक नए 'हाइब्रिड रिटेल मॉडल' को जन्म दिया है, जिसमें पुराने किराना स्टोर का भरोसा और मॉडर्न रिटेल सिस्टम की सुविधाओं का शानदार मेल देखने को मिल रहा है.
भारत के ग्रॉसरी मार्केट (किराना बाजार) में चुपचाप लेकिन बहुत बड़ा बदलाव आ रहा है, और खास बात यह है कि इसकी कमान अब सिर्फ बड़े महानगरों के हाथ में नहीं है. पहले ऑर्गेनाइज्ड रिटेल और ऑनलाइन शॉपिंग की शुरुआत दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहरों से हुई थी, लेकिन आज असली रफ्तार छोटे शहरों (टियर 2 और टियर 3) से मिल रही है. इन छोटे शहरों में लोगों की बढ़ती उम्मीदें, इंटरनेट की पहुंच और लोकल ऑन्त्रप्रेन्योरशिप के नए आइडियाज ने ग्रॉसरी खरीदने और बेचने के पुराने तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है.
दशकों से छोटे शहरों में राशन और किराने के सामान के लिए 'किराना दुकान' ही बैकबोन रही हैं. भरोसे, आपसी रिश्तों और घर के पास होने की वजह से ये दुकानें लोगों की हर छोटी-बड़ी जरूरत को बखूबी पूरा करती आई हैं. अब बदलते लाइफस्टाइल, ऑर्गेनाइज्ड फॉर्मेट के एक्सपोजर, इंटरनेट और स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल ने ग्राहकों की सोच बदल दी है. आज छोटे शहरों के खरीदार अपनी पुरानी जान-पहचान वाली दुकानों से तो जुड़े रहना चाहते हैं, लेकिन साथ ही वे बेहतर साफ-सफाई, सामान का सही प्राइस, ज्यादा वैरायटी और डिजिटल सुविधाओं की उम्मीद भी करते हैं.
खरीदारी के इस बदलते मिजाज ने एक नए 'हाइब्रिड रिटेल मॉडल' को जन्म दिया है, जिसमें पुराने किराना स्टोर का भरोसा और मॉडर्न रिटेल सिस्टम की सुविधाओं का शानदार मेल देखने को मिल रहा है.
इस बड़े बदलाव की सबसे अहम वजह है डिजिटल टेक्नोलॉजी का तेजी से अपनाना. सस्ते स्मार्टफोन, हर गांव-शहर तक इंटरनेट की पहुंच और डिजिटल पेमेंट के आसान होने से छोटे शहरों के ग्राहक शॉपिंग के नए और स्मार्ट तरीके अपनाने के लिए एम्पावर हुए हैं. अब ऑनलाइन ऑर्डर करना, डिजिटल बिल लेना और अलग-अलग जगहों पर प्राइस कंपेयर करना सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रह गया है. इसका नतीजा यह है कि अब टियर-2 और टियर-3 सिटी का ग्रॉसरी मार्केट पहले से कहीं ज्यादा ऑर्गेनाइज, टेक्नोलॉजी से लैस और कंज्यूमर की जरूरतों पर फोकस्ड होता जा रहा है.
डिजिटल शिफ्ट के बावजूद, छोटे शहरों के कंज्यूमर के लिए आज भी "किफायती होना" (वैल्यू) सबसे ज्यादा मायने रखती है. मेट्रो सिटीज के खरीदार जहां स्पीड और सुविधा को प्रायोरिटी देते हैं, वहीं छोटे शहरों के ग्राहक प्राइस को लेकर बहुत सेंसेटिव रहते हैं और अपनी पसंदीदा दुकान के प्रति वफादार होते हैं. वे कम कीमत में अच्छी क्वालिटी की उम्मीद करते हैं. यही वजह है कि छोटे शहरों में ऐसे मॉडल सबसे ज़्यादा सफल हो रहे हैं जो लोकल शॉप को बंद करने के बजाय उन्हें मॉडर्न बना रहे हैं. इसमें दुकानों का लेआउट बेहतर करना, सामान की सही सप्लाई चेन बनाना और आसान डिजिटल टूल्स देना शामिल है. इससे लोकल स्टोर बड़े रिटेल स्टोर से मुकाबला करने में सक्षम हो रहे हैं और ग्राहकों को वही पुराना भरोसा अब मॉडर्न सुविधाओं के साथ मिल रहा है.
महानगरों से इतर ग्रॉसरी मार्केट के इस बूम में ऑन्त्रप्रेन्योरशिप एक बहुत बड़ी 'की फोर्स' बनकर उभरी है. भारत के छोटे शहरों में ऐसे बहुत से उभरते हुए ऑन्त्रप्रेन्योर हैं, जो एक स्टेबल और स्केलेबल बिजनेस शुरू करना चाहते हैं. हालांकि, दुकान शुरू करने में आने वाला भारी खर्चा और फ्रेंचाइजी मॉडल के कड़े नियम अक्सर उनके रास्ते की रुकावट बन जाते हैं. ऐसे में अब ग्रॉसरी मार्केट में ऐसे नए इकोसिस्टम आ रहे हैं, जो कम खर्च में बिजनेस शुरू करने का मौका देते हैं और सामान की सप्लाई से लेकर पूरी टेक्निकल हेल्प भी खुद मुहैया कराते हैं. इससे छोटे शहरों के युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर बिजनेस के नए रास्ते खुल रहे हैं.
ये मॉडल लोकल ऑन्त्रप्रेन्योर को अपना मालिकाना हक खोए बिना, प्रोफेशनल तरीके से किराना स्टोर चलाने की आजादी देते हैं. इससे उन्हें कम्युनिटी में अपनी पहचान बनाए रखने और लोगों का भरोसा जीतने में मदद मिलती है. इन नए सिस्टम की वजह से अब कम समय में नए स्टोर खोलना आसान हो गया है, जहां ग्राहकों को हर बार एक जैसा शानदार एक्सपीरिएंस मिलता है. साथ ही, मुनाफे का सही तालमेल होने की वजह से अब छोटे शहरों और कस्बों में भी ऑर्गेनाइज्ड ग्रॉसरी रिटेल को लंबे समय तक सफलतापूर्वक चलाना मुमकिन हो गया है.
सप्लाई चेन में होने वाला मॉडर्नाइजेशन भी इस फील्ड में बहुत अहम भूमिका निभा रहा है. पहले छोटे शहरों में अक्सर सामान की सप्लाई समय पर नहीं होती थी, वैरायटी बहुत कम मिलती थी और दुकानदारों को पूरी तरह लोकल डिस्ट्रीब्यूटर्स पर निर्भर रहना पड़ता था. आज सेंट्रलाइजिंग सोर्सिंग और बेहतर लॉजिस्टिक्स ने दुकानों की आर्थिक स्थिति को बदल दिया है. खासकर 'प्राइवेट लेबल्स' (खुद के ब्रांड का सामान) अब ग्रोथ का बड़ा जरिया बन रहे हैं. ये ब्रांड लोगों की पसंद और हैबिट्स को ध्यान में रखते हुए अच्छी क्वालिटी का सामान किफायती दामों पर उपलब्ध कराते हैं. इससे न केवल ग्राहकों को सस्ता और अच्छा सामान मिलता है, बल्कि दुकानदारों को भी पहले से कहीं ज़्यादा मुनाफा हो रहा है.
सिर्फ व्यापार ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों में ग्रॉसरी ट्रांसफॉर्मेशन बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक सुधार भी ला रहा है. हर एक ऑर्गेनाइज्ड किराना स्टोर अपने साथ डायरेक्ट और इनडायरेक्ट रूप से एम्प्लॉयमेंट के कई नए मौके लेकर आता है, जिसमें दुकान के स्टाफ और डिलीवरी करने वालों से लेकर लॉजिस्टिक्स और सामान की सप्लाई करने वाले पार्टनर तक शामिल हैं. जैसे-जैसे ये रिटेल नेटवर्क फैल रहे हैं, ये न केवल नौकरियां पैदा कर रहे हैं, बल्कि इस सेक्टर को ज्यादा ऑर्गेनाइज बनाकर लोकल इकोनॉमी को भी मजबूती दे रहे हैं.
आने वाले समय में, भारत के ग्रॉसरी ग्रोथ की कहानी मुख्य रूप से छोटे शहरों द्वारा ही लिखी जाएगी. जैसे-जैसे लोगों की जरूरतें और उम्मीदें बदल रही हैं, भविष्य में वही बिजनेस मॉडल सबसे ज्यादा कामयाब होंगे जो डिजिटल एफिशिएंसी के साथ-साथ ह्यूमन कनेक्शन को भी बनाए रखेंगे. असली सफलता उन मॉडलों को मिलेगी जो बड़े पैमाने पर मॉडर्न टेक्नोलॉजी और किफायती दामों के बीच सही तालमेल बिठाएंगे और लोकल लोगों की पसंद को ध्यान में रखकर इनोवेशन करेंगे.
भारत में ग्रॉसरी की यह कहानी अब सिर्फ मेट्रो सिटी या वेयरहाउस तक सीमित नहीं रह गई है. इसकी असली तस्वीर अब जिला कस्बों, रिहायशी इलाकों और लोकल मार्केट में साफ दिखाई दे रही है. यहां ट्रेडिशनल किराना दुकानें समय के साथ खुद को बदल रही हैं, जहां अब काउंटर पर होने वाली सेल के साथ-साथ 'ऑनलाइन क्लिक' (डिजिटल ऑर्डर) भी अपनी जगह बना रहे हैं. कुल मिलाकर छोटे शहर चुपचाप भारत के सबसे बड़े कंज्यूमर मार्केट में से एक के फ्यूचर को शेप दे रहे हैं.
(लेखक ‘BuyBuyCart’ के डायरेक्टर और को-फाउंडर हैं. आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं. YourStory का उनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है.)
Edited by Ravi Pareek



