कैसे बरेली की नीलम ने पति के साथ मिलकर घर से खड़ा किया फर्नीचर बिजनेस
बरेली की नीलम ने घर की पारंपरिक बेंत कारीगरी से कृष्णा एंटरप्राइजेज की शुरुआत की. पति और परिवार के साथ मिलकर उन्होंने फर्नीचर ब्रांड खड़ा किया. यूपी सरकार की CM YUVA योजना के तहत मिली आर्थिक मदद से आज ब्रांड अन्य राज्यों में भी बांस से बने प्रोडक्ट सप्लाई करता है और महिलाओं को भी रोजगार दे रहा है.
उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के एक छोटे से घर में बेंत से कुर्सियां और झूले बनते थे. यह काम पीढ़ियों से परिवार में चलता आ रहा था. तब किसी ने नहीं सोचा था कि यही हुनर एक दिन फर्नीचर ब्रांड की पहचान बनेगा. नीलम ने अपने पति के साथ मिलकर इसी पारंपरिक कारीगरी को आगे बढ़ाया.
घर से शुरू हुआ यह काम आज कृष्णा एंटरप्राइजेज के नाम से जाना जाता है और यूपी के अलावा अन्य राज्यों में फर्नीचर बेचा जा रहा है.
नीलम कहती हैं कि उन्होंने कोई बड़ा प्लान बनाकर शुरुआत नहीं की थी. पिछले 14 सालों में जो भी सीखा, काम करते हुए ही सीखा. ऑर्डर कैसे संभालने हैं. कारीगरों से कैसे बात करनी है. खर्च और कमाई का हिसाब कैसे रखना है. और सबसे जरूरी, परिवार से मिली बेंत कारीगरी की तकनीकों को कैसे संभाल कर रखना है. धीरे धीरे भरोसा बना और काम आगे बढ़ता गया.
जब घर का काम बिजनेस बनने लगा
एक समय ऐसा आया जब बाहर से, खासकर पंजाब से ऑर्डर आने लगे. यहीं नीलम को लगा कि अब काम को थोड़ा व्यवस्थित करना जरूरी है. सिर्फ घर से काम करने के बजाय इसे एक सही पहचान देनी होगी. उन्होंने जिला उद्योग केंद्र (DIC) से संपर्क किया. मोबाइल पर राज्य सरकार की युवा उद्यमी ऋण योजना के बारे में पढ़ा. फिर आवेदन करने का फैसला किया.
DIC के अधिकारियों ने फाइल तैयार कराने में मदद की. बैंक मैनेजर ने पूरी प्रक्रिया समझाई और आगे बढ़ाई. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चलाई जा रही ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान’ योजना (CM Yuva Yojana) के तहत उन्हें 5 लाख रुपये का लोन मिला.
नीलम बताती हैं कि जरूरी दस्तावेज और मार्जिन मनी सबसे अहम थे. यह पूरा होते ही बाकी चीजें अपने आप आसान हो गईं.
पूरा परिवार मिलकर करता है काम
कृष्णा एंटरप्राइजेज आज भी एक पारिवारिक काम है. परिवार के 8-10 लोग और रिश्तेदार इसमें जुड़े हैं. नीलम यूनिट की सीईओ हैं, लेकिन वह खुद को सिर्फ मैनेजर नहीं मानतीं. वह ग्राहकों से बात करती हैं. ऑर्डर लेती हैं. बिल बनाती हैं. फिर तय करती हैं कि क्या काम होगा और कैसे होगा.
उनके पति उत्पादन संभालते हैं. एक चाचा बेंत के लैंप की लाइन देखते हैं. हर किसी की अपनी जिम्मेदारी है. यूनिट का नाम भी परिवार की आस्था से जुड़ा है, कृष्णा एंटरप्राइजेज. ऐसा नाम जो सादा है और आसानी से याद रह जाता है.
बेंत से बना मजबूत और टिकाऊ फर्नीचर
यहां बेंत से बने कई तरह के प्रोडक्ट (उत्पाद) तैयार होते हैं जैसे कुर्सियां, डाइनिंग सेट, झूले, स्टूल, जूते रखने की रैक, स्टोरेज रैक और हाथ से बने खूबसूरत बेंत के लैंप.
नीलम बताती हैं कि बेंत की खासियत उसकी मजबूती है. इस पर दीमक का असर नहीं होता. यही वजह है कि यह फर्नीचर लंबे समय तक चलता है और घरों के लिए भरोसेमंद माना जाता है.
बेंत की छड़ें आमतौर पर असम से आती हैं. पहले इन्हें साफ किया जाता है. फिर गर्म किया जाता है ताकि इन्हें मोड़ा जा सके. आग की हल्की आंच पर कुर्सी, झूला या मेज का ढांचा तैयार किया जाता है. ढांचा बनने के बाद बुनाई होती है. फिर फिनिशिंग की जाती है. अंत में फिटिंग और गुणवत्ता जांच के बाद प्रोडक्ट्स शिपिंग के लिए तैयार होते हैं.
हर चरण में हाथ का काम होता है. यही वजह है कि हर पीस में मेहनत साफ दिखाई देती है.
महिलाओं को साथ लेकर आगे बढ़ने की सोच
नीलम सिर्फ अपने बिजनेस तक सीमित नहीं रहना चाहतीं. वह चाहती हैं कि उनके साथ और महिलाएं भी आगे बढ़ें. इसके लिए वह दस महिलाओं का एक समूह तैयार कर रही हैं. उन्हें बुनाई और असेंबली सिखाई जा रही है. आगे चलकर वह और यूनिट्स खोलने की योजना भी बना रही हैं.
नीलम कहती हैं कि अगर वह आगे बढ़ती हैं, तो उनके साथ 2-4 और महिलाएं भी आगे बढ़नी चाहिए. उनका मानना है कि जब युवा और महिलाएं सरकारी योजनाओं को अपनाते हैं, तो रोजगार और जागरूकता अपने आप बढ़ती है.
आगे का रास्ता
अब कृष्णा एंटरप्राइजेज का लक्ष्य साफ है, हाथ से बनी गुणवत्ता को बनाए रखना. उत्तर प्रदेश के अलावा दूसरे राज्यों के ग्राहकों तक पहुंचना और पूंजी का सही और अनुशासित इस्तेमाल करना.
नीलम की कहानी यह दिखाती है कि घर का हुनर भी बड़ा कारोबार बन सकता है. जरूरत है धैर्य की. सीखने की इच्छा की. और सही समय पर सही फैसले लेने की.
Edited by रविकांत पारीक



