Epoch Elder Care: दीदा की अल्जाइमर से मिली सीख, नेहा सिन्हा ने शुरू किया बुजुर्गों की देखभाल का सफर
दीदा को अल्जाइमर से जूझते देख नेहा सिन्हा ने बुजुर्गों की देखभाल की चुनौतियों को करीब से समझा. इसी अनुभव से शुरू हुआ उनका सफर आज Epoch Elder Care तक पहुंचा है. जानिए उनकी कहानी और भारत में बढ़ती एल्डर केयर की जरूरत.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की जुलाई 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में 5.7 करोड़ लोग डिमेंशिया (dementia) के साथ जी रहे हैं और हर साल करीब 1 करोड़ नए मामले सामने आते हैं. डिमेंशिया अब दुनिया में मौत का सातवां प्रमुख कारण है और बुजुर्गों में विकलांगता तथा दूसरों पर निर्भरता की बड़ी वजहों में शामिल है. WHO की इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2019 में डिमेंशिया की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर करीब 1.3 ट्रिलियन डॉलर का बोझ पड़ा था.
भारत में भी बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के साथ देखभाल की जरूरत तेजी से बढ़ रही है. इसी बदलाव के बीच भारत का सीनियर लिविंग मार्केट अभी शुरुआती दौर में है. Colliers की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में इसका आकार करीब 2-3 अरब डॉलर था, जो 2030 तक करीब 12 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. लेकिन यह सिर्फ एक बाजार की कहानी नहीं है. इसके पीछे लाखों परिवारों की बदलती जरूरतें हैं. Epoch Elder Care की CEO और को-फाउंडर नेहा सिन्हा ने इसी चुनौती को करीब से देखा है.
दादू-दीदा के साथ बीता बचपन बना पहला सबक
कोलकाता में जन्मीं नेहा का बचपन राउरकेला में उनके दादू और दीदा के साथ बीता. वह उनकी इकलौती पोती थीं और दोनों के साथ उनका रिश्ता बेहद करीबी था.
उन्होंने क्लिनिकल साइकोलॉजी (clinical psychology) की पढ़ाई की और डिमेंशिया तथा पेलिएटिव केयर एथिक्स (palliative care ethics) में विशेषज्ञता हासिल की. करियर की शुरुआत उन्होंने एक नॉन-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन से की, जहां वह स्किजोफ्रेनिया (schizophrenia) के साथ जी रहे लोगों के लिए काम करती थीं. इस अनुभव ने उन्हें समझाया कि जटिल जरूरतों वाले लोगों की देखभाल में निरंतरता, धैर्य और गरिमा कितनी जरूरी है.
बाद में उनकी दीदा को अल्जाइमर (Alzheimer) हुआ. बीमारी के साथ उनके जीवन में आए बदलावों को करीब से देखना नेहा के लिए मुश्किल था. लेकिन इसी अनुभव ने उन्हें यह समझने में मदद की कि बुजुर्गों की देखभाल केवल दवा या निगरानी का विषय नहीं है.
YourStory से बात करते हुए नेहा सिन्हा बताती हैं, “जब मेरी दीदा को अल्जाइमर हुआ, तो उनकी स्थिति को करीब से देखना मेरे लिए बहुत मुश्किल था. लेकिन उसी अनुभव ने मुझे यह समझने में मदद की कि बुजुर्गों की देखभाल केवल दवा या निगरानी का विषय नहीं है. इसमें व्यक्ति की पहचान, उसकी गरिमा, उसकी भावनाएं और उसके परिवार की चिंता, सबको साथ लेकर चलना पड़ता है.”

Epoch Elder Care की CEO और को-फाउंडर नेहा सिन्हा
2012 में दिखी एक बड़ी कमी
2012 में जब नेहा ने भारत के एल्डर केयर सेक्टर को करीब से देखा, तो उन्हें यह व्यवस्था काफी बिखरी हुई लगी. एक तरफ सीनियर लिविंग से जुड़े रियल एस्टेट मॉडल थे, तो दूसरी ओर घर पर नर्स या डॉक्टर जैसी अलग-अलग सेवाएं. लेकिन ऐसी सेवाएं कम थीं, जो बुजुर्गों की मेडिकल, सामाजिक और भावनात्मक जरूरतों को एक साथ देख सकें.
यहीं से Epoch Elder Care की शुरुआत हुई. गुरुग्राम स्थित कंपनी ने समय के साथ होम केयर से रेजिडेंशियल केयर की ओर ध्यान बढ़ाया. नेहा के मुताबिक, डिमेंशिया, अल्जाइमर, पार्किंसन और सर्जरी के बाद रिकवरी जैसे मामलों में बुजुर्गों को केवल किसी व्यक्ति की मौजूदगी नहीं, बल्कि प्रशिक्षित और लगातार देखभाल की जरूरत होती है.
नेहा बताती हैं, “जब मैंने 2012 में भारत में एल्डर केयर को देखा, तो यह काफी असंगठित और बिखरा हुआ था. खासकर डिमेंशिया या किसी दूसरी न्यूरोकॉग्निटिव कंडीशन से जूझ रहे बुजुर्गों के लिए यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी.”
भरोसा बनाना सबसे बड़ी चुनौती
एल्डर केयर में ग्राहक केवल कोई सर्विस नहीं खरीदता. वह अपने माता-पिता या परिवार के किसी सदस्य की जिम्मेदारी किसी दूसरे व्यक्ति और संस्था को सौंपता है. इसलिए यहां भरोसा किसी सामान्य कारोबारी लेनदेन की तरह नहीं बनता.
भारत में असिस्टेड लिविंग को लेकर कई परिवारों में अब भी अपराधबोध है. माता-पिता को केयर फैसिलिटी में भेजने का फैसला कई लोगों के लिए भावनात्मक रूप से कठिन होता है. नेहा के अनुसार, परिवार को केयर प्रोसेस से अलग करने के बजाय उसमें शामिल रखना जरूरी है.
Epoch में अलग-अलग जरूरतों के आधार पर केयर प्लान बनाए जाते हैं. इनमें डिमेंशिया केयर, असिस्टेड लिविंग, रेस्पाइट केयर, रिहैबिलिटेशन, पोस्ट-ऑपरेटिव केयर, डेकेयर और पैलिएटिव केयर जैसी सेवाएं शामिल हैं.
नेहा कहती हैं, “एल्डर केयर में भरोसा किसी एडमिशन फॉर्म के साथ नहीं आता. उसे धीरे-धीरे कमाना पड़ता है. हमारा मानना है कि परिवार को केयर से दूर नहीं, बल्कि केयर जर्नी का हिस्सा होना चाहिए.”

Epoch Elder Care की टीम
बढ़ती उम्र के साथ बढ़ रही जरूरत
भारत में बुजुर्गों की संख्या बढ़ना इस पूरे सेक्टर की जरूरत को समझने का एक बड़ा आधार है. United Nations Population Fund (UNFPA) की India Ageing Report 2023 के मुताबिक, 2022 में भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के करीब 15.3 करोड़ लोग थे. यह संख्या 2050 तक बढ़कर करीब 34.7 करोड़ हो सकती है.
UNFPA की इसी रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक देश की कुल आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी 20% से अधिक हो सकती है. 80 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी में भी 2022 से 2050 के बीच करीब 279% वृद्धि का अनुमान है.
इस बदलती जनसांख्यिकी के साथ संगठित सीनियर लिविंग की मांग भी बढ़ रही है. Colliers की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में सीनियर हाउसिंग की मौजूदा मांग करीब 18-20 लाख यूनिट है, जबकि संगठित क्षेत्र में उपलब्धता करीब 20,000 यूनिट है. यानी मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है.
नेहा के मुताबिक, Epoch की शुरुआत करीब 7 करोड़ रुपये की शुरुआती पूंजी से हुई थी. कंपनी का मुख्य रेवेन्यू रेजिडेंशियल केयर से आता है. उनके अनुसार, कारोबार ने शुरुआत से करीब 30% सालाना की दर से वृद्धि की है.
कंपनी फिलहाल 240 बेड संचालित करती है और अगले दो-तीन वर्षों में इसे दोगुना करने की योजना है. करीब 500 बुजुर्गों को केयर देने की क्षमता बनाने का लक्ष्य भी रखा गया है.
नेहा के लिए यह विस्तार सिर्फ बिजनेस अपॉर्चुनिटी नहीं है. वह कहती हैं, “मेरे लिए एल्डर केयर में अवसर हमेशा जरूरत के बाद आता है. भारत में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है और परिवारों की संरचना भी बदल रही है. ऐसे में केयर को हर स्टेज पर बनाए रखना जरूरी होगा.”
बिजनेस से ज्यादा, क्वालिटी लाइफ का सवाल
एल्डर केयर सेक्टर के बढ़ने के साथ सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बड़े पैमाने पर काम करते हुए देखभाल की गुणवत्ता कैसे कायम रखी जाए. अलग-अलग फैसिलिटीज में समान स्टैंडर्ड बनाए रखना, केयरगिवर्स को प्रशिक्षित करना और घटनाओं की निगरानी करना इसके अहम हिस्से हैं.
लेकिन इस काम में केवल आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं बताते. परिवारों को ग्रिफ, गिल्ट और अनिश्चितता से भी गुजरना पड़ता है. इसलिए बुजुर्गों और उनके परिवारों से लगातार फीडबैक लेना भी जरूरी है.
WHO के मुताबिक, डिमेंशिया सिर्फ याददाश्त कमजोर होने तक सीमित नहीं है. यह व्यक्ति की सोचने, रोजमर्रा के काम करने और स्वतंत्र रूप से जीवन जीने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है. इसका असर परिवार और केयरगिवर्स पर भी पड़ता है.
इसीलिए नेहा के लिए एल्डर केयर का सवाल सिर्फ बढ़ते बाजार का सवाल नहीं है. वह ऐसा माहौल बनाना चाहती हैं, जहां बीमारी किसी व्यक्ति की पूरी पहचान न बन जाए.
अंत में Epoch Elder Care की CEO और को-फाउंडर नेहा सिन्हा कहती हैं, “डिमेंशिया या किसी दूसरी बीमारी के साथ जीने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि व्यक्ति की पहचान खत्म हो गई. हमारा लक्ष्य ऐसा वातावरण बनाना है जहां बुजुर्ग सम्मान के साथ रहें, किसी के पास बैठ सकें, बात कर सकें और अपनी जिंदगी में छोटी-छोटी खुशियों के पल महसूस कर सकें.”
यह कहानी ऐसे समय में सामने आती है, जब भारत तेजी से उम्रदराज आबादी की ओर बढ़ रहा है. नेहा का निजी अनुभव और इस बदलती जरूरत ने मिलकर उनके काम की दिशा तय की. अब चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि कंपनी कितने बेड तक पहुंचती है, बल्कि यह भी है कि बढ़ते पैमाने के साथ बुजुर्गों की देखभाल में संवेदनशीलता और गरिमा कितनी कायम रहती है.



