पद्मश्री चामी मुर्मू: 500 गांवों में 30 लाख पेड़ लगाने वाली झारखंड की ‘लेडी टार्ज़न’
झारखंड की पद्मश्री सम्मानित ‘लेडी टार्ज़न’ चामी मुर्मू की प्रेरक कहानी, जिन्होंने संघर्षों के बावजूद 500 गांवों में 30 लाख पेड़ लगाए, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया और पर्यावरण संरक्षण को जन-आंदोलन बना दिया.
भारत की मिट्टी ने हमेशा ऐसे सपूत और बेटियां पैदा की हैं जिन्होंने अपने जीवन को दूसरों के लिए समर्पित कर दिया. आज जब हम पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब झारखंड की एक साधारण सी दिखने वाली महिला ने असाधारण काम कर दिखाया.
यह कहानी है चामी मुर्मू (Chami Murmu) की—एक ऐसी आदिवासी महिला की, जिसने गरीबी, संघर्ष और सामाजिक विरोध के बीच भी हार नहीं मानी और अपने दम पर लाखों पेड़ लगाकर धरती को फिर से हरा-भरा कर दिया. उन्होंने अपने प्रयासों से साबित किया कि परिवर्तन केवल बड़े शहरों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे गांवों से भी शुरू हो सकता है.
साल 2024 में जब उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया, तो यह न सिर्फ उनकी जीत थी, बल्कि पूरे झारखंड और भारत की आदिवासी परंपरा की जीत थी.
संघर्षों से भरा बचपन
चामी मुर्मू का जन्म 1973 में झारखंड के सेराइकेला-खरसावां जिले के बगरसाई गांव में हुआ. यह एक छोटा सा गांव था जहां ज्यादातर लोग खेती-बाड़ी और मजदूरी पर निर्भर रहते थे. बचपन में ही पिता और बड़े भाई का निधन हो गया. मां बीमार थीं और छोटे भाई-बहनों की परवरिश की जिम्मेदारी उन पर आ गई. गरीब परिवार में जन्म लेने के कारण शिक्षा पाना भी आसान नहीं था. दसवीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी और खेतों व ईंट-भट्टों पर काम करना पड़ा.
लेकिन इन तमाम मुश्किलों के बीच भी उनका दिल हमेशा प्रकृति और जंगलों से जुड़ा रहा. वे अक्सर सोचतीं कि अगर हमारे जंगल सुरक्षित रहते तो गांव की हालत भी सुधर जाती.
पेड़ लगाने से मिली नई दिशा
साल 1988 में उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने सबकुछ बदल दिया. एक पर्यावरण कार्यकर्ता से मुलाकात ने उन्हें पेड़ लगाने और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने का महत्व समझाया. उन्हें अहसास हुआ कि पेड़ सिर्फ हरियाली नहीं देते, बल्कि पानी, छाया, हवा और आजीविका का सबसे बड़ा सहारा हैं. इसी सोच से उन्होंने अपने गांव में छोटे-छोटे स्तर पर पेड़ लगाने का काम शुरू किया.
शुरुआत में लोग इसे मामूली समझकर हंसते थे, लेकिन चामी के भीतर यह बीज गहरे जम चुका था. उन्होंने ठान लिया कि चाहे अकेले ही क्यों न करना पड़े, वे अपने इलाके को फिर से हरा-भरा करेंगी.
महिलाओं की ताकत से शुरू हुआ आंदोलन
1996 में चामी ने गांव की औरतों को साथ जोड़कर ‘सहयोगी महिला बगरसाई’ (Sahayogi Mahila Bagraisai) संगठन की नींव रखी. शुरुआत में सिर्फ 11 महिलाएं जुड़ीं, जिनमें ज्यादातर गरीब मजदूर और किसान थीं. इन औरतों के पास पैसे नहीं थे, लेकिन हौसला था. चामी ने उन्हें समझाया कि यदि वे एकजुट होकर काम करेंगी तो कोई ताकत उन्हें रोक नहीं पाएगी.
धीरे-धीरे संगठन बढ़ता गया और आज यह 3,000 से ज्यादा महिलाओं का मजबूत नेटवर्क है. इस संगठन का मकसद था पेड़ लगाना, पानी बचाना, जैविक खेती को बढ़ावा देना और औरतों को आत्मनिर्भर बनाना. चामी ने साबित किया कि जब औरतें संगठित होती हैं, तो वे पूरे समाज की तस्वीर बदल सकती हैं.
विरोध और धमकियों के बीच हौसले की जीत
गांव के कई पुरुषों ने उनका विरोध किया. वे मानते थे कि यह औरतों का काम नहीं है. कई बार उन्हें अपमानित किया गया. लकड़ी माफिया ने धमकियां दीं क्योंकि उनके हितों को नुकसान हो रहा था. लेकिन चामी ने हार नहीं मानी. वह दिन-रात औरतों को साथ लेकर पेड़ लगातीं और जंगल की रखवाली करतीं.
कई बार उन्होंने औरतों के साथ मिलकर लकड़ी चोरों और माफियाओं को रोका. उन्होंने कहा कि पेड़ लगाना सिर्फ प्रकृति को बचाना नहीं है, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को जीवन देने जैसा है. धीरे-धीरे समाज का नज़रिया बदलने लगा और लोग उनके साथ खड़े होने लगे.
30 लाख पेड़ और 500 गांवों में हरियाली
आज चामी मुर्मू और उनकी टीम ने 500 से अधिक गांवों में 30 लाख से ज्यादा पेड़ लगाए हैं. यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि इन पेड़ों ने गांवों की जिंदगी बदल दी है. जहां कभी सूखा और बंजर जमीन थी, वहां अब खेत लहलहा रहे हैं. जिन नदियों और तालाबों में पानी सूख चुका था, उनमें अब पानी भरने लगा है. पक्षियों और जानवरों की चहचहाहट लौट आई है.
गांव के लोग पहले पलायन के लिए मजबूर होते थे, लेकिन अब खेती और जंगल से उनकी आजीविका चल रही है.
औरतों को दिया आत्मनिर्भरता का हक
चामी मानती हैं कि असली बदलाव तभी संभव है जब महिलाएं सशक्त हों. उन्होंने गांव की हजारों औरतों को सेल्फ-हेल्प ग्रुप से जोड़ा. इन समूहों ने औरतों को छोटी बचत से लेकर जैविक खेती, जल संरक्षण और पर्यावरण की रक्षा करने के तरीके सिखाए. इनसे जुड़ी महिलाएं अब अपने पैरों पर खड़ी हैं. वे न सिर्फ अपने परिवार को बेहतर जीवन दे रही हैं बल्कि समाज में अपनी पहचान भी बना रही हैं.
आज उनके संगठन से जुड़ी 30,000 से अधिक महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं और नई पीढ़ी के लिए मिसाल पेश कर रही हैं.
संघर्ष से सम्मान तक
उनके काम को देश और दुनिया में सराहा गया. 1996 में उन्हें इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार (Indira Priyadarshini Vrikshamitra Award) मिला. 2019 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द के हाथों नारी शक्ति पुरस्कार (Nari Shakti Puraskar) से नवाज़ा गया. इन सम्मानों ने उन्हें और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी.
अंततः 2024 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. यह पल उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी. जिस महिला ने मजदूरी करते हुए अपने भाई-बहनों का पेट पाला था, उसी महिला को आज देश ने पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण की सबसे बड़ी योद्धा के रूप में मान्यता दी.
‘लेडी टार्ज़न’ की विरासत
लोग उन्हें प्यार से “लेडी टार्ज़न ऑफ झारखंड” (The Lady Tarzan of Jharkhand) कहते हैं. यह नाम उनके साहस और जंगलों के प्रति उनके प्रेम का प्रतीक है. उन्होंने दिखाया कि असली योद्धा हथियार नहीं उठाते, बल्कि पेड़ लगाकर, औरतों को सशक्त बनाकर और समाज को जोड़कर लड़ते हैं. उनके काम ने यह साबित कर दिया कि प्रकृति की रक्षा करना ही असली इंसानियत है.
चामी मुर्मू की जिंदगी हमें यह सिखाती है कि पर्यावरण बचाना सिर्फ पेड़ लगाने तक सीमित नहीं है. यह समाज को जागरूक करने, लोगों को जोड़ने और औरतों को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान है. उनकी प्रेरणा हर भारतीय को यह संदेश देती है कि अगर आप सच में बदलाव चाहते हैं, तो शुरुआत खुद से करनी होगी. एक अकेला इंसान भी पूरी दुनिया बदल सकता है.



