रामपुर के जीशान खान ने कैसे दर्ज़ी की दुकान से खड़ा किया बुर्क़ा मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस
रामपुर के युवा उद्यमी जीशान खान ने सिलाई की छोटी दुकान से बुर्क़ा मैन्युफैक्चरिंग यूनिट खड़ी की. उत्तर प्रदेश सरकार की ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास योजना’ के लोन से कारोबार को औपचारिक रूप मिला और सप्लाई नेटवर्क यूपी व उत्तराखंड तक फैला.
उत्तर प्रदेश के रामपुर में रहने वाले जीशान खान ने अपने हाथ के हुनर को स्थिर कारोबार में बदल दिया है. कपड़े सिलाई की एक छोटी सी दुकान से शुरू हुआ उनका सफर आज बुर्क़ा बनाने के बिजनेस में तब्दील हो चुका है. यह यूनिट अब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कई शहरों में खुदरा दुकानों को नियमित सप्लाई कर रही है.
जीशान खान ‘फेमस लेडीज़ टेलर’ के फाउंडर हैं. उनका कहना है कि यूपी सरकार की ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास योजना’ (CM Yuva Yojana) के तहत मिले लोन ने उनके बिजनेस को नई दिशा दी. उनके शब्दों में, यह बदलाव किसी एक शहर से दो ऑर्डर लेने से चार ऑर्डर पूरे भरोसे के साथ स्वीकार करने जैसा था.
हुनर से बिजनेस तक
इस कहानी की शुरुआत एक रिश्तेदार की दर्ज़ी की दुकान से होती है. जीशान ने वहीं बैठकर सिलाई, कटिंग और फिनिशिंग का काम देखा और सीखा. यह सीख किताबों से नहीं, रोज़मर्रा के अभ्यास से आई. उनके चाचा एक अनुभवी दर्ज़ी थे. उनके निधन के बाद जीशान ने उसी पते पर अपनी खुद की यूनिट शुरू की और इस हुनर को आगे बढ़ाया.
शुरुआत में उनके साथ सिर्फ दो सहायक थे. धीरे धीरे काम बढ़ा तो उन्होंने एक विशेषज्ञ मास्टर कटर को टीम में जोड़ा. समय के साथ टीम का आकार बढ़ता गया. जीशान की भूमिका भी बदली. अब वह खुद मशीन पर बैठने के बजाय कच्चा माल खरीदने, ऑर्डर लेने, डिलीवरी तय करने और भुगतान सुनिश्चित करने पर ज़्यादा ध्यान देते हैं. दुकान पर आने वाले ग्राहकों को संभालना भी उनकी रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारी है.
बढ़ता कारोबार
काम की पहचान धीरे धीरे बनने लगी. मुँहज़ुबानी प्रचार और समय पर डिलीवरी से मांग बढ़ती गई. आज यह यूनिट बरेली, मुरादाबाद, बहेड़ी और बदायूं के साथ साथ उत्तराखंड के रुद्रपुर और हल्द्वानी के खुदरा विक्रेताओं को सप्लाई करती है. जीशान बताते हैं कि उनके कारोबार की पहचान एक जैसे साइज, मज़बूत सिलाई और भरोसेमंद डिलीवरी से बनी है. यही वजह है कि ग्राहक बार बार ऑर्डर देते हैं.
उनका बिजनेस मॉडल सिंपल है. वह भारी स्टॉक नहीं रखते. खुदरा विक्रेताओं से मिलने वाली प्रतिक्रिया के आधार पर डिज़ाइन और उत्पादन में बदलाव कर लेते हैं. इससे जोखिम भी कम रहता है और मांग के हिसाब से काम करना आसान होता है.
बुर्क़ा कैसे बनता है?
बुर्क़ा बनाने की प्रक्रिया भी सरल और क्रमबद्ध है. कपड़ा मुख्य रूप से बरेली से मंगाया जाता है. रामपुर पहुँचने के बाद जरूरत के अनुसार हाथ का काम किया जाता है. इसके बाद मास्टर कटर कटिंग करता है. फिर सिलाई होती है. उसके बाद प्रेसिंग और पैकिंग की जाती है. तैयार खेप पर लेबल लगाए जाते हैं और परिवहन साझेदारों के ज़रिये दुकानों तक भेज दिया जाता है. जीशान कहते हैं कि इस प्रक्रिया से दोबारा काम की जरूरत कम होती है और हर चरण पर गुणवत्ता की जांच आसान रहती है.
CM Yuva Yojana से मिली रफ्तार
जैसे जैसे ऑर्डर बढ़े, वैसे वैसे वर्किंग कैपिटल की जरूरत भी बढ़ी. बेहतर मशीनों और ज्यादा कारीगरों की आवश्यकता महसूस हुई. इसी दौरान उन्हें मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास योजना के बारे में जानकारी मिली. उन्होंने बैंक के ज़रिये आवेदन किया. लोन मंजूर हुआ और मासिक किस्तें शुरू हो गईं. इस वित्तीय मदद से नकदी प्रवाह स्थिर हुआ.
लोन मिलने के बाद उन्होंने बुर्क़ा कैटेगरी में प्रोडक्ट रेंज बढ़ाई. नियमित ग्राहकों के लिए बैच साइज बड़ा किया. डिलीवरी का समय भी कम हुआ. इससे खुदरा विक्रेताओं का भरोसा और मजबूत हुआ.
आगे की योजना
अपने इस बिजनेस को लेकर जीशान की आगे की योजना साफ है. मौजूदा शहरों में वितरण को और मज़बूत करना और कुछ नए बाज़ार जोड़ना. वह कटिंग मास्टर और सिलाई कर्मियों की भर्ती और प्रशिक्षण पर भी काम करना चाहते हैं. बड़े स्तर पर गुणवत्ता बनाए रखने के लिए प्रक्रियाओं को और सख़्त किया जाएगा.
जीशान अन्य युवा उद्यमियों को सरकारी योजनाओं को गंभीरता से देखने की सलाह देते हैं. उनका मानना है कि औपचारिक ऋण किसी आजीविका को एक मज़बूत व्यवसाय में बदल सकता है. जब छोटे व्यवसाय आगे बढ़ते हैं तो रोज़गार पैदा होता है और देश भी आगे बढ़ता है.
Edited by रविकांत पारीक



