जानें, कैसे मिला 27 साल के इंजीनियर शांतनु को रतन टाटा के साथ मनचाही नौकरी करने का मौका

सड़क पर कुत्तों को एक्सिडेंट से बचाने की खोज ने दिलाया रतन टाटा के साथ काम करने का मौका...

30th Oct 2019
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ड्रीम जॉब... यह शब्द कानों में पड़ते ही सभी के दिमाग के अलग-अलग छवि बनने लगती है। किसी का ड्रीम जॉब ज्यादा पैसों की नौकरी करना होता है तो किसी का अपना खुद का बिजनेस करना। किसी के दिमाग में जीवन में काफी कुछ सीखाने वाले काम की छवि बनती है तो कुछ लोगों का मन आराम की नौकरी करने का होता है। देखा जाए तो एक अच्छी नौकरी हर किसी का सपना होती है और 27 साल के शांतनु नायडू जैसी जॉब के लिए तो इंसान किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो सकता है।


हालांकि, शांतनु ने रतन टाटा के ऑफिस में सपने जैसी नौकरी पाने के लिए कोई खास योजना नहीं बनाई थी। शांतनु पिछले डेढ़ साल से दिग्गज बिजनेस लीडर, निवेशक, परोपकारी और टाटा ग्रुप के पूर्व चेयरमैन रतन टाटा के साथ काम कर रहे हैं। उनका काम रतन टाटा को स्टार्टअप निवेश में मदद करने के साथ एग्जिक्यूटिव असिस्टेंस (कार्यकारी सहायता) देना है।

 

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रतन टाटा के साथ शांतनु

एक नौजवान को इससे बेहतर सीखने का मौका भला और कहां मिलेगा? शांतनु ने कॉर्नेल विश्वविद्यालय से एमबीए किया है, लेकिन देखा जाए तो वह रतन टाटा की निगरानी में 'व्यवाहारिक पीएचडी' भी कर सकते हैं। यह अनुभव जिंदगी भर उनका साथ निभाएगा।


शांतनु कहते हैं,

'मिस्टर रतन टाटा के साथ काम करना सम्मान की बात है। इस तरह का मौका जिंदगी में एक ही बार मिलता है। उनके साथ रहकर हर दिन, हर मिनट कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता है।'

जैसा कि सबको पता है, देश के प्रतिष्ठित टाटा ग्रुप की अगुवाई कर चुके 81 साल के रतन टाटा का देश के स्टार्टअप इकोसिस्टम में गहरा विश्वास है। उन्होंने व्यक्तिगत और आधिकारिक यानी टाटा ग्रुप के तौर पर एक दर्जन से अधिक स्टार्टअप में निवेश किया है। जून 2016 में रतन टाटा की प्राइवेट इनवेस्टमेंट कंपनी RNT असोसिएट्स और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया ऑफ द रीजेंट्स (UC इनवेस्टमेंट्स) ने भारत में 'UC-RNT फंड्स' के रूप में नए स्टार्टअप, नई कंपनियों और अन्य उद्यमों को फंड देने के लिए हाथ मिलाया था। RNT असोसिएट्स ने तकरीबन उसी समय भारतीय उद्यमियों की मदद करने और स्टार्टअप इकोसिस्टम बनाने के लिए कई निवेश किए।


हालांकि, रतन टाटा के ज्यादातर निवेशों की रकम के बारे में जानकारी नहीं है लेकिन जो भी स्टार्टअप उन्हें अपने साथ लाने में सफल होते हैं, उन्हें वित्तीय मदद से हटकर रतन टाटा के अनुभव का खजाना मिल जाता है। इस बात से स्टार्टअप्स का जोश भी बढ़ जाता है।

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एक पब्लिक इवेंट के दौरान शांतनु रतन टाटा के साथ

ओला में रतन टाटा के निवेश की घोषणा के बाद सीईओ भाविश अग्रवाल ने कहा था,

'हमारे वक्त के सबसे सम्मानित बिजनेस लीडर्स में से एक ने हमें अपना सहयोग दिया है। इससे भारत में मोबिलिटी के भविष्य को लेकर ओला की प्रतिबद्धता झलकती है।'

इसमें हैरानी वाली कोई बात नहीं है कि शांतनु ने रतन टाटा के साथ बातचीत में कभी 'जेनरेशन गैप' जैसी बात महसूस नहीं की।


शांतनु कहते हैं,

'ऐसा इसलिए है क्योंकि वह टेक्नोलॉजी के साथ बाकी सभी लेटेस्ट ट्रेंड्स से भी वाकिफ रहते हैं। इस तरह के मौके काफी कम रहते हैं कि मैं उनके पास जाकर उन्हें कहूं कि आपको दिखाने के लिए मेरे पास कुछ नया है। उन्होंने शायद सब कुछ देख लिया है।'


शांतनु बताते हैं,

'मैं अपने युवा नजरिए को बहुत सी चीजों से जोड़ता हूं, जिसकी वह वास्तव में तारीफ करते हैं। हालांकि, इस रिश्ते से मुझे पता चला कि एक अच्छा कारोबारी, सुलझी शख्सियत और उदार इंसान कैसा दिखता है और उसका व्यवहार कैसा होता है।'
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रतन टाटा Motopaws की टीम के साथ

दया के भाव का काम

रतन टाटा के व्यवहार के बारे में इससे बेहतर उदाहरण क्या होगा कि किस तरह शांतनु उनके ऑफिस में काम करने के लिए आए। साल 2014 में शांतनु पुणे की टाटा एलेक्सी में एक ऑटोमोबाइल डिजाइन इंजीनियर के तौर पर काम करते थे। अपना काम खत्म करके वह देर रात को विमान नगर हाइवे से होकर घर जाते थे। अपने सफर के दौरान उन्होंने रास्ते में गाड़ियों की तेज रफ्तार की चपेट में आकर बहुत से कुत्तों को मरते देखा। इस रह की घटनाएं शांतनु को काफी परेशान करती थीं। फिर उन्होंने सोचा कि वह कैसे गली के कुत्तों की जान बचा सकते हैं। 


शांतुन बताते हैं,

'मैंने कुत्तों की जान बचाने का तरीका खोजने के लिए सबसे पहले उन लोगों से बात की, जिनकी गाड़ियों से कुत्ते टकराए थे। उन लोगों से बात करके मुझे पता चला कि गाड़ी चलाते वक्त सिर्फ कुत्तों को ना देख पाना घटनाओं का कारण नहीं था। समय रहते कुत्तों को नहीं देख पाना घटनाओं का बड़ा कारण था। इसलिए वह अपनी जिंदगी जोखिम में डाले बिना कुत्तों की जान बचाने का उपाय नहीं कर पाते। इसका अंजाम ऐक्सिडेंट के रूप में होता है, जिसमें मासूम कुत्तों की जान चली जाती है। चूंकि मैं एक ऑटोमोबाइल इंजीनियर था। इसलिए मेरे मन में तुरंत कुत्तों के लिए एक कॉलर बनाने का आइडिया आया। इससे ड्राइवर रात में स्ट्रीट लाइट के बगैर भी कुत्तों को दूर से देख सकेंगे और उनकी जान बचाई जा सकेगी।'


कई ट्रायल पूरे करने के बाद शांतुन ने कुत्तों के लिए एक कॉलर बनाई। यह कॉलर प्रयोग में लिए गए डेनिम बेड वाले इंडस्ट्री के बेस्ट ग्रेड रेस्ट्रो रिफ्लेक्टिव मैटेरियल यानी चमकदार मैटेरियल से बना था। यह मैटरियल एक डॉनेशन कैंपेन के जरिए शांतनु ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर इकठ्ठा किया था।


शांतनु ने बताया,

'उस वक्त मैं 23 साल का था। मेरे और मेरे दोस्तों के पास इस आइडिया को बड़े पैमाने पर ले जाने के लिए पैसा नहीं था।'

हालांकि, शांतनु की मोटोपॉज नाम की इस छोटी सी कोशिश ने काफी लोगों का ध्यान खींचा। रिफ्लेक्टिव यानी चमकने वाले कॉलर की वजह से स्ट्रीट डॉग्स की जान बच रही थी। बहुत से लोग शांतनु को फीडबैक दे रहे थे कि इस इनोवेशन की मदद से उन्हें अंधेरे में भी कुत्तों की जान बचाने में मदद मिली। इस छोटे से लेकिन महत्वपूर्ण काम के बारे में टाटा समूह की कंपनियों के न्यूजलेटर में लिखा गया था। फिर इस पर रतन टाटा की नजर पड़ी, जो खुद भी कुत्तों से काफी लगाव रखते हैं।


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Motopaws के पूणे वॉलेन्टियर्स और साथ में शांतनु

शांतनु कहते हैं,

'कई लोगों ने मुझे इस बारे में मि. टाटा को पत्र लिखने के लिए कहा था। मैंने पत्र लिखा लेकिन लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। मैं लेटर का जवाब न आने की वजह समझ गया था। मेरा मतलब है कि वह रतन टाटा हैं, जो दुनिया के दिग्गज उद्योगपतियों में शुमार हैं। वह हर किसी के पत्र का जवाब थोड़े न देंगे। हालांकि, मेरे पिता को जवाब आने का भरोसा था।'


रतन टाटा ने शांतनु के पिता भरोसे को टूटने भी नहीं दिया। एक दिन शांतनु को मुंबई में रतन टाटा से उनके ऑफिस में मिलने का न्योता मिला।


शांतनु कहते हैं,

'हम स्ट्रीट डॉग्स के लिए जो कुछ भी कर रहे थे, रतन टाटा ने उसकी काफी तारीफ की। फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि हम किस तरह की मदद चाहते हैं। मैंने कहा कि हम कोई मदद नहीं चाहते। हालांकि, हम स्टूडेंट्स थे तो उन्होंने जोर दिया और हमारी कोशिश में एक अघोषित निवेश किया।'
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शांतनु जब रतन टाटा से पहली बार मिले

काम ऐसा जिसे करने पर खुशी हो

मोटोपॉज में पैसा किसी मुनाफे की उम्मीद से नहीं लगाया गया था। रतन टाटा ने कुत्तों के प्रति अपने प्यार और गाड़ियों से उनकी जिंदगी बचाने के इनोवेटिव कॉन्सेप्ट की वजह से अपनी जेब से निवेश किया था। रतन टाटा के पैसा लगाने के बाद मोटोपॉज की पहुंच देश के 11 अलग-अलग शहरों तक हो गई है।


शांतनु कहते हैं,

'हमें हाल ही में नेपाल और मलेशिया से कॉलर की डिमांड मिली है। हमारे पास नेपाल में पहले से ही एक टीम है, जिसमें सभी महिलाएं हैं। हम गाय जैसे बड़े मवेशियों की भी तलाश कर रहे हैं, जो हाइवे पर भटकने के बाद जान गंवा देते हैं। इसके अलावा, मोटोपॉज अब अपने कैडर के वॉलनटियर्स को स्ट्रीट एनिमल्स के प्राथमिक उपचार की ट्रेनिंग भी दे रहा है।


मोटोपॉज एक महीने में 500 से 1,500 कॉलर बनाता है। पिछले दिनों इसके डिजाइन को अपडेट करके बेहतर बनाया गया है। यह नए बकलिंग सिस्टम के साथ वाटर और फंगस प्रूफ है। एनिमल वेलफेयर कमेटी से फीडबैक मिलने के बाद मोटोपॉज अपने कॉलर डिजाइन को पहले से और बेहतर करता रहता है। मोटोपॉज ने सभी 11 शहरों में उन वॉलनटियर्स को ट्रेनिंग दी है, जो कॉलर मुहिम में मदद करते हैं।


शांतनु कहते हैं,

'मोटोपॉज में वालंटियर बनने के लिए इंतजार करना पड़ता है और यह देखकर काफी खुशी होती है कि भारी तादाद में लोग इस मुहिम का हिस्सा बनना चाहते हैं।'

रतन टाटा के साथ इस जुड़ाव के बाद शांतनु उनके संपर्क में रहते थे। वह अक्सर रतन टाटा से सलाह भी मांगते थे।


शांतनु ने कहा,

'मैं अपने परिवार की पांचवी पीढ़ी हूं, जो टाटा ग्रुप में काम कर रही है। इनमें ज्यादातर इंजीनियर और टेक्निशियन के तौर पर काम करते थे। हम एग्जिक्यूटिव्स नहीं थे। इस वजह से कभी टाटा से नहीं मिले थे। इस तरह की उच्च नैतिकता और कॉर्पोरेट जिम्मेदारी वाले ग्रुप के साथ काम करने में खुशी होती है। मेरा हमेशा से टाटा ट्रस्ट जैसे बेहतरीन सामाजिक प्रभाव वाले संगठन में काम करने का सपना रहा है।'


वह आगे कहते हैं,

'रतन टाटा के निवेश के बाद मैं लगातार उनके संपर्क में रहा। उनसे अलग-अलग मुद्दों पर बातें करता था। इस तरह धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गहरी होती गई। एक दिन मैंने रतन टाटा को कॉर्नेल में एमबीए करने की योजना के बारे में बताया। मुझे जैसे कॉर्नेल में एडमिशन मिला, मैंने उन्हें बताया कि ग्रैजुएशन के बाद भारत लौटने पर मैं टाटा ट्रस्ट में योगदान देने का मौका खोजूंगा।'
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कुछ इस अंदाज़ में Motopaws टीम ने फंडिग के बाद रतन टाटा को धन्यवाद कहा

जीवन की सीख

कॉर्नेल में अपने सेकेंड ईयर के दौरान शांतनु का पूरा ध्यान उद्यमिता, निवेश, नए स्टार्टअप के साथ-साथ क्रेडिबल स्टार्टअप्स की खोज, इंटरेस्टिंग बिजनेस आइडियाज और मुख्य इंडस्ट्री ट्रेंड्स खोजने पर था।


शांतनु कहते हैं,

'कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के सिलेबस में उद्यमिता को लेकर कई आधारभूत प्रोग्राम हैं। साथ ही यहां पर आंत्रप्रन्योरशिप के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए ओरिएंटेशन प्रोग्राम भी चलाए जाते हैं। मैंने टाटा ट्रस्ट और मुंबई में जानवरों का एक हॉस्पिटल बनाने के लिए मि. टाटा पेट प्रॉजेक्ट के साथ इंटर्नशिप की। मुझे ग्रैजुएशन से पहले ही उस टीम में शामिल कर लिया गया, संयोग से जिसका फायदा मुझे आज मिल रहा है। जब तक मैं वापस आया, मेरे पास उद्यमिता जगत की वह सारी क्वॉलिफिकेशन थी जिसके बारे में बहतु ज्यादा पैशनेट था।'


जब शांतनु अपनी डिग्री के साथ वापस लौटे तो उम्मीद थी कि वह उसी वेटनरी प्रोजेक्ट पर काम करेंगे। इस पर शांतनु कहते हैं,

'मि. टाटा के पास कई और प्लान थे। साल 2018 की बात है, उन्होंने (रतन टाटा) मुझे अपना ऑफिस जॉइन करने के लिए कहा। और इसके बाद से मैं उनके ऑफिस में काम कर रहा हूं।'

शांतनु के लिए यह काफी गहन ट्रेनिंग रही। वह कहते हैं कि रतन टाटा को इतने करीब से देखना अपने आप में अलग अनुभव है। मुझे रतन टाटा की जो बात सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, वह सभ्य व्यक्तित्व है।


शांतनु कहते हैं,

'सभ्य व्यक्तित्व बहुत जरूरी होता है। कई निपुण लोग अपने जीवन से सीखा हुआ मोटिव, इंटेंशन और पैशन बाकियों को प्रेरित करने के लिए उनसे साझा करते हैं। रतन टाटा से आप कई चीजें सीख सकते हैं। इनमें अपने जूनियर्स को नई बातें सिखाना, उनकी खूबियों को चमकाना और उनकी कमियों को दूर करना शामिल है। ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो वह (रतन टाटा से) सीखते हैं। कई बार ये बातें एक बाय-प्रॉडक्ट के तौर पर काम करती हैं। यह अमूल्य है। मैं उनसे लगातार कुशलता, स्पष्टता और विश्लेषणात्मक सोच जैसी बातें सीखता हूं।'

शांतुन को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में वह रतन टाटा से सीखी हुई बातों की लिस्ट तैयार कर लेंगे। हालांकि अभी तक जो उन्होंने सीखा है, उसमें से कुछ यहां साझा करते हैं,


वह कहते हैं,

'मि. टाटा का दिमाग बहुत तेज है। उनके साथ रहना और देखना कि 'वह कैसे अपने निर्णय लेते हैं' यह अपने आप में एक शिक्षा है। सबसे अच्छी बात उनका मजाकिया और विनम्र स्वभाव है। वह आपको कभी यह महसूस नहीं होने देते कि आप रतन टाटा के साथ काम कर रहे हैं। वे कभी इस बात का अहसास नहीं होने देते कि आप एक आम इंसान हैं और वह रतन टाटा हैं। उन्होंने मुझे कुछ सिखाने के लिए ना तो कभी डांटा है और ना कभी धमकाया है। वह हमेशा सीखने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं। केवल मुझे ही नहीं बल्कि जो भी उनके साथ काम करते हैं, सभी को वह प्रोत्साहित करते हैं।'


शांतनु आगे कहते हैं,

'इन सबके बीच उनकी दोस्ती और उनके व्यवहार से बाकियों के साथ जो संबंध बनते हैं, वह हमेशा और गहरे होते हैं। यह कई सालों में बनते हैं। मैं तो कहूंगा कि जिसने भी उनके साथ काम किया है, वह उनका दोस्त है। यह रिश्ता इस बात को साबित करता है कि उनके साथ काम करना कितना आसान है।'




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