कैसे स्टार्टअप Shop Culture बदल रहा है ई-कॉमर्स का खेल? जानिए
Shop Culture की फाउंडर और ग्लोबल CEO सुबर्ना मुखर्जी मानती हैं कि असली ग्रोथ वही है जो टिकाऊ हो. सुबर्ना कहती हैं, “डिजिटल कॉमर्स स्ट्रैटेजी, टेक्नोलॉजी और स्टोरीटेलिंग का संगम है. मुझे हमेशा यही मिलन सबसे ज्यादा आकर्षित करता था.”
डिजिटल कॉमर्स की दुनिया तेज़ी से बदल रही है. हर दिन नए ब्रांड सामने आ रहे हैं. नए प्लेटफॉर्म बन रहे हैं. लेकिन इस तेज़ रफ्तार में कई ब्रांड दिशा खो देते हैं. ऐसे समय में कोलकाता से शुरू हुई एक कंपनी ने अलग रास्ता चुना. नाम है Shop Culture. इसकी शुरुआत साल 2023 में हुई.
यह सिर्फ एक बिजनेस की कहानी नहीं है. यह सोच की कहानी है. यह उस सफर की कहानी है जहां विस्तार से ज्यादा समझ को अहमियत दी गई. Shop Culture की फाउंडर और ग्लोबल CEO सुबर्ना मुखर्जी (Subarna Mukherjee) मानती हैं कि असली ग्रोथ वही है जो टिकाऊ हो.
सुबर्ना कहती हैं, “डिजिटल कॉमर्स स्ट्रैटेजी, टेक्नोलॉजी और स्टोरीटेलिंग का संगम है. मुझे हमेशा यही मिलन सबसे ज्यादा आकर्षित करता था.”
यही सोच Shop Culture की नींव बनी.
सुबर्ना मुखर्जी की पढ़ाई और शुरुआती करियर ने उन्हें अलग नजरिया दिया. उन्होंने मुंबई के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज से स्टैटिस्टिक्स की पढ़ाई की. इसके बाद IIFT दिल्ली से इंटरनेशनल बिजनेस में एमबीए किया.
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत फ्लिपकार्ट से की, जो उस दौर में तेजी से बढ़ रहा थी. वहां उन्होंने करीब से देखा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म कैसे लोगों की खरीदारी की आदत बदल रहे हैं. बाद में अमेज़न इंडिया और यूरोप में काम करते हुए उन्होंने कैटेगरी मैनेजमेंट और कस्टमर एक्सपीरियंस पर काम किया. आईटीसी में रहते हुए उन्होंने पारंपरिक एफएमसीजी इकोसिस्टम को समझा.
इन अनुभवों ने उन्हें एक बड़ा सच दिखाया. ब्रांड तेजी से बढ़ना चाहते थे, लेकिन कई बार प्रॉफिट और लॉन्ग टर्म स्ट्रैटेजी पीछे छूट जाती थी.
सुबर्ना कहती हैं, “मैंने देखा कि कई ब्रांड सिर्फ ऐड्स और नंबरों के पीछे भाग रहे थे, लेकिन प्रॉफिटेबिलिटी और क्लैरिटी की कमी थी.”
यहीं से Shop Culture की शुरुआत का विचार पैदा हुआ.
ई-कॉमर्स तेजी से बदल रहा था. प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम बदल रहे थे. आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) का असर बढ़ रहा था. लेकिन बहुत से ब्रांड तैयार नहीं थे. एजेंसियां अलग अलग हिस्सों में काम कर रही थीं. कोई सिर्फ परफॉर्मेंस मार्केटिंग देख रहा था, तो कोई सिर्फ SEO (Search Engine Optimization).
ब्रांड को ऐसे पार्टनर की जरूरत थी जो पूरी तस्वीर समझे. स्ट्रैटेजी भी दे और एग्जीक्यूशन भी.
सुबर्ना कहती हैं, “Shop Culture का मकसद सिर्फ स्केल नहीं था. हमारा फोकस प्रॉफिटेबल और सस्टेनेबल ग्रोथ पर था.”
शुरुआत एक सोलो कंसल्टिंग इनिशिएटिव के तौर पर हुई. शुरुआत में छोटा सेटअप था, लेकिन सोच साफ थी. हर ब्रांड की असली समस्या को समझकर समाधान देना.
धीरे धीरे क्लाइंट्स का भरोसा बढ़ा. टीम बनी. स्ट्रैटेजी, कंटेंट, परफॉर्मेंस और ऑपरेशंस जैसे हिस्सों में एक्सपर्ट जुड़े. कंपनी ने इंडिया के साथ साथ यूएस, यूके और यूरोप में भी काम शुरू किया.
यह विस्तार जल्दबाजी में नहीं हुआ. क्लाइंट की जरूरत के साथ आगे बढ़ता गया.
Shop Culture की एक खास बात यह रही कि इसे बिना किसी बाहरी फंडिंग के शुरू किया गया. शुरुआती निवेश फाउंडर ने खुद किया था. डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, रिसर्च टूल्स और एक छोटी लेकिन मजबूत टीम पर ध्यान दिया गया.
सुबर्ना कहती हैं, “हमने शुरुआत से प्रॉफिट फर्स्ट माइंडसेट रखा. इससे हर फैसला सोच समझकर लिया गया.”
कंपनी का रेवेन्यू मॉडल भी अलग है. यह प्रोजेक्ट बेस्ड एजेंसी नहीं बनना चाहती थी. इसलिए रिटेनर मॉडल अपनाया गया. इससे Shop Culture क्लाइंट की इंटरनल टीम का हिस्सा बन पाई. कुछ पार्टनरशिप परफॉर्मेंस लिंक्ड भी हैं, ताकि ग्रोथ के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी रहे.
ग्लोबल मार्केट में काम करना आसान नहीं था. यूरोप में कंप्लायंस और सस्टेनेबिलिटी पर ज्यादा ध्यान देना पड़ता है. यूएस मार्केट में प्रतिस्पर्धा बहुत तेज है. इंडिया में प्राइस सेंसिटिविटी और स्केल दोनों जरूरी हैं.
सुबर्ना मानती हैं कि असली चुनौती स्ट्रैटेजी को एक रखना और एग्जीक्यूशन को लोकल बनाना है. उनके शब्दों में, “ग्लोबल माइंडसेट जरूरी है, लेकिन एग्जीक्यूशन हमेशा लोकल होना चाहिए.”
अब Shop Culture अपने अगले चरण की तैयारी कर रही है. कंपनी एआई ड्रिवन और सास टूल्स पर काम कर रही है. इनका मकसद ब्रांड की बड़ी समस्याओं को हल करना है. जैसे इन्वेंट्री प्लानिंग, कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और प्रॉफिटेबिलिटी ट्रैकिंग.
सुबर्ना कहती हैं, “टेक्नोलॉजी स्ट्रैटेजी को रिप्लेस नहीं करती, बल्कि उसे और मजबूत बनाती है.”
इन टूल्स की मदद से ब्रांड रिएक्टिव फैसलों से आगे बढ़कर फोरसाइट बेस्ड फैसले ले सकेंगे. डेटा रियल टाइम में मदद करेगा. एक्सपेरिमेंट जल्दी होंगे. रिस्क कम होगा.
अगले दो सालों में Shop Culture ब्यूटी, वेलनेस, पेट केयर और होम कैटेगरी में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है. इंडिया को इनोवेशन हब की तरह विकसित किया जा रहा है, जबकि यूएस और यूरोप में मौजूदगी को और गहरा किया जाएगा.
सुबर्ना का फोकस साफ है. एजेंसी से आगे बढ़कर लॉन्ग टर्म कॉमर्स पार्टनर बनना. Shop Culture का सफर अभी शुरू हुआ है, लेकिन दिशा साफ दिखती है. यह कहानी उस दौर की है जहां ग्रोथ सिर्फ नंबर नहीं है. ग्रोथ मतलब क्लैरिटी, सस्टेनेबिलिटी और लॉन्ग टर्म वैल्यू है.
सुबर्ना मुखर्जी ने अपने अनुभव, डेटा ड्रिवन सोच और इंसानी समझ को मिलाकर ऐसा मॉडल बनाया है जो डिजिटल कॉमर्स को नए नजरिए से देखता है. उनकी एक बात इस पूरी कहानी का सार बन जाती है — “ग्रोथ वही है जो बिजनेस को मजबूत बनाए, सिर्फ बड़ा नहीं.” यही सोच आने वाले समय में डिजिटल कॉमर्स की नई पहचान बन सकती है.



