SOMANY Ceramics: 1968 में हुई शुरुआत, आज 80 देशों में फैला 2600 करोड़ रुपये का कारोबार
1968 में शुरू हुई SOMANY Ceramics की कहानी भारतीय सिरेमिक उद्योग के विकास, शुरुआती सरकारी नियंत्रण, तकनीकी चुनौतियों और बदलती उपभोक्ता सोच को दर्शाती है.
भारत में टाइल और सिरेमिक उद्योग आज जिस स्तर पर पहुंच चुका है, वहां तक पहुंचना आसान नहीं था. आज यह क्षेत्र आधुनिक तकनीक, डिजाइन और बड़े पैमाने के उत्पादन से जुड़ा दिखाई देता है, लेकिन 1960 और 1970 के दशक में स्थिति बिल्कुल अलग थी. उस समय निर्माण सामग्री (बिल्डिंग मैटेरियल) को लेकर विकल्प सीमित थे, गुणवत्ता में एकरूपता नहीं थी और उपभोक्ता की अपेक्षाएं भी बहुत बुनियादी थीं. टाइल्स को सौंदर्य से ज्यादा मजबूरी के तौर पर देखा जाता था.
इसी दौर में 1968 में SOMANY Ceramics की शुरुआत हुई. यह वह समय था जब भारत का औद्योगिक ढांचा धीरे धीरे आकार ले रहा था और कई उद्योग सरकारी नियंत्रण और लाइसेंस प्रणाली के तहत काम कर रहे थे. सिरेमिक उद्योग भी इन्हीं सीमाओं में बंधा हुआ था. तकनीक तक पहुंच आसान नहीं थी और अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाना एक लंबी प्रक्रिया थी.
नोएडा, उत्तर प्रदेश में स्थित अपने मुख्यालय के साथ SOMANY Ceramics ने समय के साथ खुद को बदला और उद्योग के बदलावों का हिस्सा बनी. यह कहानी सिर्फ एक कंपनी के विस्तार की नहीं है, बल्कि उस दौर की है, जब भारतीय निर्माण उद्योग पहचान बना रहा था और उन लोगों की है, जिन्होंने धैर्य और निरंतरता के साथ काम किया. आज इस कंपनी का नेतृत्व अभिषेक सोमानी (Abhishek Somany) कर रहे हैं, जो इस लंबे सफर को अनुभव और संतुलन के साथ आगे बढ़ा रहे हैं.
SOMANY Ceramics की नींव स्वर्गीय एच एल सोमानी (H. L. Somany) ने रखी थी. उस समय कंपनी Somany Pilkington Ltd के नाम से जानी जाती थी और ब्रिटेन की Pilkington Tiles के साथ तकनीकी सहयोग में काम कर रही थी. यह सहयोग ऐसे समय में हुआ, जब भारत में टाइल निर्माण का तकनीकी ज्ञान सीमित था और आधुनिक मशीनें दुर्लभ थीं.
YourStory हिंदी से बात करते हुए, SOMANY Ceramics के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO अभिषेक सोमानी बताते हैं, “शुरुआत में कोई बड़ा सपना नहीं था, बस यह साफ सोच थी कि भारत में बेहतर और भरोसेमंद निर्माण सामग्री बननी चाहिए.” उस दौर में बाजार छोटा था और उपभोक्ता ज्यादा विकल्पों की मांग नहीं करता था. ऐसे माहौल में गुणवत्ता पर टिके रहना ही सबसे बड़ी चुनौती थी.
1971 में हरियाणा के कासर में कंपनी का पहला मैन्युफैक्चरिंग प्लांट शुरू हुआ. इसके बाद धीरे धीरे उत्पादन क्षमता बढ़ाई गई और गुजरात जैसे राज्यों में विस्तार किया गया. हर कदम सोच समझकर उठाया गया क्योंकि गलती सुधारने की गुंजाइश बहुत कम थी.
सिरेमिक उद्योग लंबे समय तक लाइसेंस प्रणाली के तहत काम करता रहा. हर नए प्लांट, हर नई भट्टी और हर विस्तार के लिए सरकारी अनुमति जरूरी थी. कई बार मंजूरी मिलने में सालों लग जाते थे. मशीनें आयात करना भी आसान नहीं था क्योंकि विदेशी मुद्रा और आयात लाइसेंस से जुड़े नियम सख्त थे.
बिजली की समस्या भी गंभीर थी. कई इलाकों में रोजाना घंटों बिजली कटौती होती थी, जिससे उत्पादन प्रभावित होता था. कच्चा माल सीमित क्षेत्रों में उपलब्ध था और वहां तक पहुंचने में लागत और समय दोनों लगते थे. टैक्स व्यवस्था भी जटिल थी, जिससे राज्यों के बीच कीमतों में अंतर पैदा हो जाता था.
अभिषेक सोमानी कहते हैं, “उस समय तेजी से बढ़ना संभव नहीं था. हमें स्थिर रहना सीखना पड़ा.” इन हालात में कंपनी ने छोटे लेकिन जरूरी सुधारों पर ध्यान दिया. डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को धीरे धीरे मजबूत किया गया और बाजार की जरूरतों को समझने की कोशिश की गई.
इन्हीं वर्षों में एक अहम फैसला लिया गया. कंपनी ने अपेक्षाकृत जल्दी नई तकनीकों में निवेश करना शुरू किया. यह कदम जोखिम भरा था, लेकिन इसी ने आगे चलकर कंपनी को बदलते समय के साथ चलने में मदद की.
समय के साथ भारत में शहरीकरण बढ़ा. घरों की बनावट बदली और लोगों की सोच भी. अब टाइल्स सिर्फ टिकाऊ होने तक सीमित नहीं रहीं. उनकी बनावट, रंग और डिजाइन भी मायने रखने लगे.
इस बदलाव ने पूरी इंडस्ट्री को प्रभावित किया. SOMANY Ceramics ने भी अपने प्रोडक्ट्स में डिजाइन और फिनिश पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया. डिजिटल प्रिंटिंग, बड़े फॉर्मेट की टाइल्स और अलग अलग टेक्सचर जैसे प्रयोग इसी दौर में सामने आए.
अभिषेक सोमानी मानते हैं, “आज का ग्राहक ज्यादा जागरूक है. वह सवाल करता है और तुलना भी करता है.” इस बदली हुई सोच के साथ कंपनी ने टाइल्स के अलावा सैनिटरीवेयर और बाथ फिटिंग्स जैसे सेगमेंट में भी कदम रखा.
यह विस्तार केवल प्रोडक्ट बढ़ाने के लिए नहीं था. विचार यह था कि घर के अलग अलग हिस्सों में एक जैसी कार्यक्षमता और अनुभव मिले. समय के साथ यह दृष्टिकोण कंपनी की रणनीति का हिस्सा बन गया.
पिछले एक दशक में सिरेमिक उद्योग ने कई बड़े झटके देखे. सस्ते आयात, कच्चे माल और ऊर्जा की बढ़ती कीमतें, कोविड के दौरान ठप पड़ी सप्लाई चेन और वैश्विक स्तर पर बदलते व्यापार समीकरणों ने पूरे सेक्टर को प्रभावित किया.
अभिषेक सोमानी कहते हैं, “हर संकट ने हमें अपने काम करने के तरीके पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया.” कभी लागत पर नियंत्रण जरूरी हुआ, तो कभी नए बाजार तलाशने पड़े. इन अनुभवों ने कंपनी और उसके नेतृत्व दोनों को ज्यादा सतर्क और व्यावहारिक बनाया.
वित्त वर्ष 2024–25 में कंपनी का रेवेन्यू करीब 2600 करोड़ रुपये रहा. कंपनी के पास इस समय 525 फ्रेंचाइज़्ड शोरूम और 12,000 डीलर व सब-डीलर हैं. देशभर में इसका डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क फैला हुआ है और यह 80 से ज्यादा देशों में निर्यात (एक्सपोर्ट) करती है. हालांकि, मौजूदा दौर में फोकस सिर्फ विस्तार पर नहीं है.
पर्यावरण से जुड़े मुद्दे अब रणनीति का हिस्सा हैं. पानी के पुनः उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन और सौर ऊर्जा जैसे कदम उद्योग में बदलती जिम्मेदारियों को दिखाते हैं.
अभिषेक सोमानी का मानना है, “आज सफलता का मतलब सिर्फ आंकड़े नहीं हैं. निरंतर प्रासंगिक बने रहना ज्यादा अहम है.” युवा उद्यमियों के लिए उनकी सलाह सीधी है. जल्दबाजी से बचें. अपने प्रोडक्ट को समझें और भरोसा बनाने में समय लगने दें.
SOMANY Ceramics की यह यात्रा दिखाती है कि किसी भी उद्योग में टिके रहने के लिए धैर्य, सीखने की इच्छा और बदलाव को स्वीकार करने की क्षमता कितनी जरूरी होती है. यह कहानी किसी एक ब्रांड की नहीं, बल्कि उस निरंतरता की है, जो समय के साथ चलना सिखाती है.



